जगद्गुरु आचार्य पुष्टिमार्ग वल्लभ सम्प्रदाय, भक्ति परम्परा तथा वेदान्त दर्शन के संस्थापक श्री वल्लभाचार्य जी वेदव्यास विष्णु स्वामी सम्प्रदाय के जगद्गुरु आचार्य तथा पारम्परिक वैष्णव सम्प्रदायों में से एक रुद्र सम्प्रदाय के भी प्रमुख आचार्य हैं। इन्हें अग्निदेव का अवतार भी माना जाता है।
वैदिक तेलगुतैलंग वेलनाड ब्राह्मण परिवार में जन्मे वल्लभाचार्य जी ने मात्र 11 वर्ष की अवस्था में ही वेदों, स्मृतियों, वेदाङ्गों, उपवेदों, उपनिषदों, पुराणों और षट दर्शनों, वेदान्त, आगमों, वैष्णव तंत्रों, जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि विचारों तथा काव्य साहित्य तथा विविध कलाओं का अध्ययन आरम्भ कर दिया था। व्यापक अध्ययन करने के बाद तीर्थाटन के लिये चले गये। वल्लभाचार्य ने। विजयनगर के राजा कृष्णदेव की सभा में उपस्थित होकर बड़े बड़े विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। वहीं, इन्हें वैष्णवाचार्य की उपाधि प्राप्त हुई। राजा कृष्णदेव ने सोने के सिंहासन पर बैठाकर इनका पूजन किया और पुरस्कार में बहुत सी स्वर्ण मुद्राएँ दीं। उन स्वर्ण मुद्राओं को वल्लभाचार्य ने वहाँ के विद्वान ब्राह्मणों को वितरित करा दिया। विजयनगर से श्री वल्लभाचार्य उज्जैन आये और शिप्रा के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे साधना की। यह स्थान आज भी बैठक नाम से प्रसिद्ध ! है। इन्होंने वृन्दावन, गिरिराज आदि अनेक स्थानों पर रहकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना की। इन्हें भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हुए तथा उनके जीवनकाल में अनेक चमत्कारिक घटनाएँ भी घटीं। भगवान श्रीकृष्ण ही इनके यहाँ विठ्ठल के रूप में पुत्र बनकर प्रकट हुए थे। श्री वल्लभाचार्य ने लोक कल्याण के उद्देश्य से अनेक ग्रंथों की रचना की जिन्हें षोडश ग्रंथ के नाम से जाना जाता है। श्री वल्लभाचार्य जी ने ही मधुराष्टक जैसे सुन्दर स्तोत्र की रचना की और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप माधुर्य को मधुर शब्दों में निरूपित किया।
श्री वल्लभाचार्यजी ने अपने ज्ञान के माध्यम से तपस्या, वैराग्य और संन्यास जीवन से हटकर भगवान श्रीकृष्ण! के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति के माध्यम से कोई मोक्ष, भगवद कृपा, गोलोक में भगवान सेवा और भगवदधाम को प्राप्त करने का मन्त्र दिया। उनके विचार पूरे भारत में प्रभावशाली हुए।