यह कथा केवल एक महान कवि की नहीं, बल्कि एक ऐसे संत की भी है, जिनकी वाणी आज भी हर भक्त के हृदय में गूंजती है। माना जाता है कि सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में रुणकता या सीही गाँव में सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
सूरदास जन्म से नेत्रहीन थे। सूरदास के पिता का नाम रामदास था, जो एक गायक और भगवत उपासक थे और उनकी माता धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। सूरदास के पूर्वज मूलतः राजस्थान के सारस्वत ब्राह्मण थे, जिन्होंने भक्ति परंपरा के प्रसार में विशेष योगदान दिया था। सूरदास ने विवाह नहीं किया। उनके ब्रह्मचारी जीवन का उल्लेख ‘भक्तमाल’, ‘चैतन्य चरितामृत’ और वल्लभ संप्रदाय के साहित्य में मिलता है। किसी प्रकार की संतान या पत्नी का कोई ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त नहीं होता।
सूरदास का बचपन अत्यन्त संघर्षपूर्ण था। नेत्रहीनता के कारण समाज में उन्हें तिरस्कार का सामना करना पड़ा जिससे वे बाल्यकाल से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहने लगे थे। उनका परिवार आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त साधारण था। उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए बहुत कम आयु में घर छोड़ना पड़ा और वे गऊघाट आ गये। उनका आध्यात्मिक जीवन गौघाट, मथुरा और पारसोली के क्षेत्र में बीता। जहाँ इनका सम्पर्क वैष्णव सन्तों से हुआ फिर ये सन्त वल्लभाचार्य जी से मिले। उनसे मिलने के बाद ही सूरदास के जीवन की दिशा ही बदल गयी।
उनके प्रमुख सहयोगी और संरक्षक वल्लभाचार्य से उन्हें आध्यात्मिक दीक्षा मिली। वल्लभाचार्य ने सूरदास को पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया और श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तनाचार्य के रूप में नियुक्त किया। सूरदास का सामाजिक जीवन अत्यन्त सीमित था किन्तु श्री वल्लभाचार्य के शिष्य मंडल—जिसमें विट्ठलनाथ (वल्लभाचार्य के पुत्र), कृष्णदास, चित्तस्वामी एवं परमानंददास जैसे संत सम्मिलित थे—उस मंडल के वे प्रमुख सदस्य रहे।
सूरदास का साहित्यिक जीवन भारतीय भक्ति आन्दोलन की सगुण भक्ति शाखा का एक महान स्तम्भ रहा है। उन्होंने कृष्ण भक्ति को केन्द्र बनाकर जो साहित्य रचा, वह केवल काव्य नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना की पराकाष्ठा है। उनकी रचनाओं में बालकृष्ण की लीलाएँ, वात्सल्य रस, श्रृंगार रस, भक्ति भाव और माधुर्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है। सूरदास की सबसे प्रसिद्ध कृति ‘सूरसागर’ है, जिसे हिन्दी साहित्य का अमूल्य ग्रन्थ माना जाता है। ‘सूरसागर’ में लगभग एक लाख पद होने का उल्लेख मिलता है किन्तु वर्तमान में लगभग 7000 पद ही उपलब्ध हैं। सूरदास ने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में की। ‘सूरसागर’ में कृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर रासलीला और भगवत दर्शन तक का विस्तृत वर्णन मिलता है।
उनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ ‘सूरसारावली’ और ‘साहित्य लहरी’ हैं। ‘सूरसारावली’ में भक्ति रस को लगभग 500 पदों के माध्यम से व्यक्त किया गया है, जबकि ‘साहित्य लहरी’ में 118 पद हैं, जिनमें काव्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से अलंकार, रस और भाषा की सुन्दरता का उत्कृष्ट उदाहरण मिलता है।
इतिहासकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानना है कि सूरदास की भाषा साहित्यिक ब्रज की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। विंटरनिट्ज़ ने लिखा है—“Surdas poetry is a sublime bridge between devotional mysticism and literary excellence।” सूरदास केवल एक भक्त नहीं, बल्कि भाषा, भाव और भक्ति का त्रिवेणी संगम थे। उनकी काव्य शैली में अनुप्रास, उपमा, दृष्टांत और भाव-प्रवणता का अद्भुत समन्वय है। उनकी रचनाओं में अलंकार केवल सजावट नहीं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन जाते हैं। सूरदास की रचनाओं का प्रभाव मुगल काल में भी पड़ा। अकबर के दरबार तक उनकी ख्याति पहुँची थी। यद्यपि सूरदास स्वयं किसी राजनीतिक सत्ता से नहीं जुड़े फिर भी मुगलकालीन धार्मिक सहिष्णुता की नीति के कारण भक्ति काव्य को प्रोत्साहन मिला।
सूरदास के पद आज भी वृंदावन, मथुरा और अन्य तीर्थस्थलों पर भजनों के रूप में गाए जाते हैं। श्रीनाथ जी मंदिर, नाथद्वारा और पुष्टिमार्गीय मंदिरों में उनके रचित कीर्तन आज भी पूजा विधि का अभिन्न अंग हैं। सूरदास का अंतिम जीवन वृंदावन में बीता, जहाँ उन्होंने श्रीनाथ जी की सेवा, कीर्तन और रचना कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया। वृंदावन के गौघाट क्षेत्र में उनका एक छोटा सा निवास स्थल आज भी स्मारक के रूप में विद्यमान है।
इतिहासकारों के अनुसार सूरदास की मृत्यु 1583 ईस्वी में वृंदावन में हुई। उनका देहांत अत्यंत शांति और साधना की अवस्था में हुआ। उनकी समाधि गौघाट के पास स्थित है, जो आज भक्ति मार्ग के अनुयायियों के लिए एक तीर्थस्थल बन चुकी है। सूरदास का उत्तराधिकारी उनका साहित्य और भक्ति परम्परा है। उनके पदों को उनके शिष्यों और पुष्टिमार्ग के संतों ने संकलित किया। वल्लभाचार्य के पुत्र श्री विट्ठलनाथ ने उनके पदों को लिपिबद्ध करवाकर पुष्टिमार्ग के ग्रन्थों में सम्मिलित किया।
इतिहासकार डॉ. शुक्ल ने सूरदास को हिन्दी साहित्य का ‘आदि गुरु’ कहा है। उनकी साहित्यिक विरासत ने तुलसीदास, मीराबाई, रहीम और रसखान जैसे अनेक भक्त कवियों को प्रेरणा दी। सूरदास का काव्य केवल भक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का सजीव चित्रण है। उन्होंने जनसामान्य की भाषा में ईश्वर को साक्षात् अनुभव कराया। ब्रजभाषा को साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाने में उनका योगदान सर्वोपरि है। भारत सरकार और विभिन्न साहित्यिक संस्थानों ने सूरदास की स्मृति में अनेक सम्मान और स्मारक स्थापित किए हैं। उनकी रचनाएँ आज भी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं।