शंकराचार्य के जीवन का प्रधान लक्ष्य वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा तथा प्रचार था। उन्होंने अपने प्रखर व्यक्तित्व के बल पर इन समस्त अवैदिक अथवा अर्धवैदिक तथा नास्तिक सिद्धान्तों को जन सामान्य में अलोकप्रिय बना दिया और उनकी निःसारता प्रमाणित कर दी तथा वेद-प्रतिपाद्य अद्वैतमत का विपुल सृजन कर वैदिक धर्म को लोकप्रिय बना दिया। यही कारण है कि उन्हें साक्षात् भगवान शिव का अवतार मानता गया है। अपनी विलक्षण दार्शनिक प्रतिभा के द्वारा शंकराचार्य ने एक ऐसे दार्शनिक सिद्धान्त की स्थापना की है जो न एकदम भौतिकवाद है, न कोरा कर्मवाद और न शुष्क ज्ञानवाद। उनका अद्वैतवाद भक्ति, कर्म और ज्ञान, स्थूल और सूक्ष्म का समन्वयभूत सिद्धान्त है।
वैदिक ग्रंथ दुरुह तथा क्लिष्ट संस्कृत प्रधान होने के कारण जनसामान्य के लिए उपेक्षित बने हुए थे। आचार्य शंकर ने उपनिषदों की विशदव्याख्या कर जिस साहित्य की सृजना की वह भारतीय चिरन्तन संस्कृति की अमूल्यनिधि है। ब्रह्मसूत्र और गीता पर उन्होंने अपने सुबोध भाष्यों का प्रणयन किया। वेदान्त-दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन का उनका प्रयास सर्वप्रथम तथा सर्वोत्तम है। आज जिन रामानुज आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तों की तुलना शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धान्तों से की जाती है उनको भी भाष्य रचना की प्रेरणा आचार्य शंकर से प्राप्त हुई है। इस प्रकार वेदान्त दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन परम्परा के मूल प्रवर्तक हैं।
साधारण लोगों के लिए उन्होंने प्रकरण ग्रन्थों की रचना कर अपने सिद्धान्त को बोधगम्य भाषा में सरल, सरस श्लोकों के द्वारा अभिव्यक्त किया है। इतना ही नहीं, वेदान्त शास्त्र के सिद्धान्तों के विपुल प्रचार की अभिलाषा से उन्होने अपने भाष्य ग्रन्थों पर वृत्ति तथा वार्तिक लिखने के लिए विद्वानों को प्रोत्साहित किया। शिष्यों के हृदय में उनकी प्रेरणा प्रभावशालिनी सिद्ध हुई। उन लोगों ने आचार्य से प्रेरणा ग्रहण कर जिस विपुल ग्रन्थ राशि का अद्वैत-प्रतिपादन के लिए प्रणयन किया है, उसकी रचना की प्रेरणा का मूलस्रोत आचार्य के ग्रन्थों में प्रवाहित हो रहा है। इस प्रकार अद्वैत साहित्य को जन्म देकर शंकर ने ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि जिससे समग्र देश की जनता उनके द्वारा प्रचारित धर्म का मर्म समझे और कोई भी अद्वैत तत्त्व के उपदेश से वंचित न रह जाय। अत: शंकराचार्य न केवल एक महान् नेता है बल्कि वह जन भावनाओं को अधिगृहीत करते हुए प्रतीत होते हैं।
धर्म-संस्थापन कार्य को स्थायी बनाने के लिए शंकर ने सन्यासियों को संघबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अपनी शिक्षा-दीक्षा, उपासना तथा निवृत्ति के कारण सन्यासी समाज ही भलीभाँति उपदेशक हो सकता है। आचार्य ने इसीलिए उसे संघबद्ध करने का सफल प्रयास किया। वस्तुत: विरक्त पुरुष ही धर्म का सच्चा उपदेश दे सकता है तथा अपना जीवन वैदिक धर्म के अभ्युदय एवं विकास में लगा सकता है। शंकर ने इस विरक्त सन्यासी वर्ग को एकत्र कर एक संघ के रूप में संगठित कर वैदिक धर्म के भविष्यगत कल्याण के लिए महान् कार्य किया। सन्यासी संघ की स्थापना राष्ट्र एवं धर्म के हित में शंकर का अत्यन्त गौरवशाली कार्य है।

चार मठों की स्थापना
आचार्य शंकराचार्य ने भारतवर्ष की धार्मिक व्यवस्था को अक्षुण्य बनाये रखने के लिये प्रख्यात तीर्थ-स्थानों में मठों की स्थापना की। चारों धाम के पास आचार्य ने चार विख्यात मठों की स्थापना की।
- गोवर्धनमठ : भारत के पूर्वी भाग में जगन्नाथ पुरी में प्रतिष्ठापित है।
- ज्योतिर्मठ : (प्रचलित नाम जोशी मठ) बदरिकाश्रम के पास उत्तर में स्थित है।
- शारदामठ : काठियावाड में द्वारिकापुरी में वर्तमान है।
- श्रृंगेरीमठ : मैसूर में दक्षिण भारत में है।
उसी दक्षिण भारत में सप्तमोक्षपुरियों में अन्यतम श्रीकाच्ची में भी मठ प्रतिष्ठापित है तथा तुङ्गभद्रा के नीर में कुडलि मठ स्थित है।
इसी तरह अन्यान्य स्थानों में भी कई मठ स्थापित हैं। इन पीठो के अधिपतियों का मुख्य कर्त्तव्य अंतर्भुक्त प्रान्तों के निवासियों को धर्मोपदेश करना तथा वैदिक मार्ग के ऊपर सुचारु रूप से चलने की व्यवस्था करना था। प्रत्येक मठ का कार्यक्षेत्र पृथक्-पृथक् रखा गया था, परन्तु पारस्परिक सहयोग खूब था। मठ के अध्यक्षों का आज भी यह प्रधान कार्य है। अपने क्षेत्र के अंतर्गत वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों में धर्म की प्रतिष्ठा को दृढ़ रखना तथा तदनुकूल उपदेश देना, ये अध्यक्ष आचार्य शंकर के प्रतिनिधि रूप हैं। इसी कारण ये भी शंकराचार्य कहलाते हैं। मठों की स्थापना के अनन्तर आचार्य ने अपने चारों पट्ट-शिष्यो को इनका अध्यक्ष नियुक्त किया, यह सर्वसम्मत बात है।
मठों के आदि आचार्य और उनकी नियुक्ति
वैदिक सम्प्रदाय सें वेदों का सम्बन्ध भिन्न-भिन्न दिशाओं के साथ माना जाता है। ऋग्वेद का सम्बन्ध पूर्व दिशा से है, यजुर्वेद का दक्षिण दिशा से, सामवेद का पश्चिम से तथा अथर्ववेद का उत्तर से है। योगानुष्ठान के अवसर पर यही पद्धति प्रचलित है। शंकराचार्य ने शिष्यों की नियुक्ति मनमाने ढंग से नहीं की किन्तु इस चुनाव में उन्होंने एक विशिष्ट वैदिक नियम का पालन किया है। जिस शिष्य का जो वेद था, उसकी नियुक्ति उसी वेद से संबद्ध दिशा से की गयी। आचार्य पद्मपाद काश्यपगोत्रीय ऋग्वेदी ब्राह्मण थे, अतः आचार्य ने उनकी प्रतिष्ठा ऋग्वेद से संबद्ध पूर्व दिशा के गोवर्धन मठ के अध्पक्ष पद पर की।
दक्षिण के श्रृंगेरी मठ में सुरेश्वराचार्य की नियुक्ति प्रमाण-सम्मत प्रतीत होती है। इस कारण नहीं कि प्रधान पीठ पर सर्वप्रधान शिष्य को रखना न्याय संगत था, बल्कि उनके वेद के कारण ही। सुरेशवर शुक्ल यजुर्वेद के अन्तर्गत शाखाध्यायी ब्राह्मण थे। आचार्य शंकराचार्य ने सुरेश्वर को दो उपनिषद् भाष्यों पर वार्तिक लिखने का आदेश दिया था–एक तैतीरीय उपनिषद भाष्य पर, क्योंकि शंकराचार्य की अपनी शाखा तैत्तीरीय थी, दूसरी बृहदारण्यक भाष्य पर, क्योंकि सुरेश्वर की शाखा काण्व शाखा थी और वृहदारएयक उपनिषद् इसी यजुर्वेद शाखा से संबद्ध है। यजुर्वेद से संबद्ध दिशा दक्षिण है। इसीलिये आचार्य ने काण्व शाखीय यजुर्वेदीय सुरेश्वर को श्रृंगेरी मठ का अध्यक्ष बनाया।
तोटकाचार्य उत्तर दिशा में स्थित ज्योतिर्मठ के अध्यक्ष बनाये गए थे। यह चुनाव इनके अथर्ववेदी होने के कारण किया गया था।
ये मठ आज भी भारत की आध्यात्मिक एकता के प्रतीक हैं। समस्त देश को धार्मिक दृष्टि से विभाजित कर उन्हें इन्हीं पीठों के अध्यक्षों के अधीन कर दिया था, जिससे समस्त भारतीय जनता में सदैव धार्मिक जागृति समान रूप से बनी रहे। पीठ के प्रधान आचार्य अद्यपर्यन्त शंकराचार्य ही कहलाते हैं और जो कि घूम घृमकर लोगों में धार्मिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं। इस प्रकार उनके द्वारा स्थापित चारों पीठों की भूमिका धर्म संस्कृति तथा शिक्षा का प्रसार करने वाले विश्वविद्यालय के समान रही है। वास्तव में आचार्य शंकर का यह पीठ-स्थापन-कार्य जनशिक्षा की दृष्टि से विश्व-शिक्षा के इतिहास में अद्वितीय उदाहरण है।
आदिगुरु शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा
आदि शंकराचार्य को भारतीय संस्कृति में ‘एकता के देवदूत’ के रूप में देखा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने विचारों, यात्राओं और कार्यों के माध्यम से पूरे भारत को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। आचार्य ने भारतवर्ष में सर्वत्र अद्वैत मत के प्रचार करने का संकल्प लिया और सम्पूर्ण भारत-भ्रमण किया विरोधियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें परास्त लिया एवं सर्वत्र अद्वैत वेदांत की वैजयंती फहराई।
आचार्य शंकर के साथ उनके भक्त शिष्यों की एक वृहत मंडली थी। साथ ही साथ वैदिक धर्म के परम हितेषी राजा सुधन्वा भी आकस्मिक आपत्तियों से बचाने के लिए इस मंडली के साथ थे। इस प्रकार यह मंडली भारतवर्ष के प्रधान तीर्थ तथा धर्म क्षेत्र में जाती, विरोधियों की युक्तियों को आचार्य खंडन करते और अपने अद्वैत मत में दीक्षित करते। आचार्य शंकर का यह तीर्थ भ्रमण दिग्विजय के नाम से प्रख्यात है। शंकर के चरितग्रंथों में इसी का विशेष रूप से वर्णन रहता था। इसीलिए वे शंकर दिग्विजय के नाम से प्रख्यात होते आए हैं।
आदिगुरु शंकराचार्य का प्रवास (मुख्य स्थान)

काशी : इस पुण्यमयी विश्वनाथपुरी के साथ शंकराचार्य का बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। आचार्य को अपने लक्ष्य की सिद्धि में काशीवास से बहुत ही लाभ हुआ। माधव के कथनानुसार भगवान् विश्वनाथ की स्पष्ट आज्ञा से शंकर ने ब्रह्मसूत्रों पर भाष्य लिखने का संकल्प किया जिसे उन्होंने ‘उत्तर काशी’ में जाकर पूरा किया। आनन्दगिरि तो काशी को ही भाष्यों के प्रणयन का स्थान मानते हैं । यहीं रहते समय वेदव्यास से शंकराचार्य का साक्षात्कार हुआ था। यहीं आचार्य ने कर्म, चन्द्र, ग्रह, क्षपणक, पितृ, गरुड, शेष, सिद्ध-आदि नाना मतों के सिद्धान्तो का खण्डन कर वैदिक मार्ग की प्रतिष्ठा की थी। काशी में मणिकर्णिका घाट के ऊपर हो आचार्य का निवास था।

उज्जैनी : यह स्थान आज भी धार्मिक महत्व रखता है। यह मालवा प्रांत का प्रधान नगर है। भारत की सप्तपुरियों में यह अन्यतम नगरी रही है। आचार्य के समय में यहां का कापालिक मत का विशेष प्रचार था। यहां उन्होंने दो महीने तक निवास किया। आनंद गिरि के कथन अनुसार उम्मत भैरव नामक शूद्र जाति का कापालिक यही रहता था। वह अपनी सिद्धि के सामने किसी को न तो उपासक ही मानता था न ही पंडित। उसे भी शंकर के हाथों पराजय स्वीकार करने पड़ी।

इंद्रप्रस्थपुर : यह स्थान प्राचीन इंद्रप्रस्थ अर्थात आधुनिक दिल्ली है। शंकराचार्य के समय में यहां इंद्र के महत्व का प्रतिपादन करने वाले धार्मिक संप्रदाय का बोलबाला था। आचार्य के साथ इन लोगों का संघर्ष हुआ था। पराजित होकर उन्होंने अद्वैत मत को अंगीकार कर लिया। इसके साथ ही शंकराचार्य जी अयोध्या भी पधारे थे परन्तु इस स्थल की किसी भी घटना का उल्लेख नहीं है।

जगन्नाथ : सप्तपुरियों में यह अन्यतम पुरी है। उड़ीसा देश में समुद्र तट पर यह अवस्थित है। यह पुरी के ही नाम से विख्यात है यही कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की काष्ठ से बनी प्रतिमाएं हैं। शंकराचार्य जी के चार धामों में यह भी प्रधान धाम है। शंकराचार्य ने यहां पर अपना गोवर्धन पीठ स्थापित किया।

द्वारका : भारत के पश्चिमी समुद्र के तीर पर द्वारकापुरी विराजमान है। यहां आचार्य ने अपना पीठ स्थापित किया जो शारदा पीठ के नाम से विख्यात है।

पंढरपुर : इस स्थान पर पांडुरंग की प्रसिद्ध प्रतिमा है। महाराष्ट्र देश में यह सबसे अधिक विख्यात वैष्णव क्षेत्र है। यहां का प्रसिद्ध मंत्र है पुंडरीक वरदे विट्ठल। विट्ठलनाथ कृष्ण के ही रूप है। शंकर ने पांडुरंग की स्तुति में एक स्तोत्र भी लिखा है।

प्रयाग : माधव ने त्रिवेणी के तट पर मीमांसक कुमारिल भट्ट के साथ शंकर के भेंट करने की बात लिखी है। आनंद गिरि ने वरुण वायु आदि के उपासक शून्यवादी बराहमतानुयायी, लोक-गुण-सांख्य-योग तथा वह वैशेषिक मतवादियों के साथ शास्त्रार्थ करने की घटना का उल्लेख मिलता है।

मायापुरी : इस स्थान को वर्तमान में हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। इस स्थान से शंकराचार्य का विशेष संबंध रहा है। बद्रीनाथ जाते समय शंकराचार्य इधर से ही गए थे। ऐसी मान्यता है कि विष्णु की प्रतिमा को डाकुओं के डर से पुजारी लोगों ने गंगा के प्रवाह में डाल दिया था। शंकर ने इस प्रतिमा का उद्धार कर फिर इसकी प्रतिष्ठा की।
श्रीपर्वत : आजकल यह स्थान मद्रास प्रांत के कर्नूल जिले का प्रसिद्ध देवस्थान है। यहां का शिव मंदिर बड़ा विशाल तथा भव्य है। प्राचीन काल में यह सिद्ध क्षेत्र माना जाता था। शंकराचार्य के समय में यह मुख्य केंद्र प्रतीत होता है। शंकराचार्य का उग्रभैरव के साथ यहीं पर संघर्ष हुआ था।
वस्तुतः ये सभी स्थान धार्मिक महत्त्व के हैं, अतः शंकराचार्य का इन स्थानों में जाना तथा विरोधीमत वालों को परास्त करना स्वाभाविक प्रतीत होता है। द्वारिका, जगन्नाथपुरी, बदरी तथा रामेश्वर के पास तो उन्होंने मठों की स्थापना की।
नेपाल में शंकराचार्य
नेपाल से आदिगुरु शंकराचार्य का घनिष्ठ संबंध रहा है। नेपाल में पशुपतिनाथ की पूजा यथार्थ रूप से नहीं हो रही थी। नेपाल बौद्ध धर्म का प्रधान केंद्र माना जाता है। यहां के निवासी अधिकांश बौद्ध मत को मानने वाले थे अतः पशुपतिनाथ की वैदिक पूजा की उपेक्षा करना नितांत स्वाभाविक था। पशुपतिनाथ का अष्टमूर्ति शंकर में अन्यतम स्थान है। वे यजमान मूर्ति के प्रतिनिधि हैं। इसलिए उनकी मूर्ति मनुष्य आकृति है। यह स्थान प्राचीन काल से ही बड़ा पवित्र तथा गौरवशाली माना जाता था। यह पवित्रता आज भी अक्षुण्ण रूप से बनी हुई है। परंतु आदिगुरु शंकराचार्य के समय में बौद्ध धर्म के बहुत प्रचार के कारण पशुपतिनाथ की पूजा में शैथिल्य आ गया था इसी को दूर करने के लिए आदिगुरु शंकराचार्य अपने शिष्य मंडली के साथ नेपाल में पहुंचे। उस समय नेपाल में ठाकुर वंश के राजा राज्य करते थे। तत्कालीन राजा का नाम शिवदेव था। ये नरेंद्र देव वर्मा के पुत्र थे। उस समय नेपाल और चीन का घनिष्ठ राजनीतिक संबंध था। चीन के सम्राट ने नरेंद्रदेव को नेपाल का राजा स्वीकृत किया था। नेपाल नरेश ने आदिगुरु शंकराचार्य जी की बड़ी अभ्यर्थना की और आचार्य चरण के आगमन से अपने देश को धन्य माना। आचार्य ने बौद्ध को परास्त कर उस स्थान को उनके प्रभाव से मुक्त कर दिया। पशुपतिनाथ की वैदिक पूजा की व्यवस्था उन्होंने ठीक ढंग से कर दी। आज भी पशुपतिनाथ के मंदिर के पास ही आदिगुरु शंकराचार्य का मठ है और थोड़ी ही दूरी पर आदिगुरु शंकराचार्य तथा दत्तात्रेय की मूर्तियां आज भी श्रद्धा तथा भक्ति से पूजी जाती है।
बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण