उस समय कलकत्ता क्रान्तिकारी आन्दोलन का केन्द्र था। केशवराव हेडगेवार का नागपुर में ही क्रान्तिकारियों से सम्पर्क हो गया था। वह क्रान्तिकारियों के विश्वस्त मण्डल के सदस्य थे। कलकत्ता में क्रान्तिकारियों की संस्था ‘अनुशीलन समिति’ नाम से सुविख्यात थी। केशव हेडगेवार के कलकत्ता पहुंचने पर स्वाभाविक रूप से अनुशीलन समिति में उनका प्रवेश हुआ।
केशव हेडगेवार ने डॉक्टर बनने के लिए कलकत्ता के नेशनल मेडिकल कालेज में प्रवेश लिया। उनकी डाक्टरी और क्रान्तिकारी ऐसी दोहरी शिक्षा प्रारम्भ हुई।
सन् 1916 में केशव हेडगेवार, डॉक्टर केशवराव हेडगेवार बन कर नागपुर पहुंचे किन्तु उन्होंने डाक्टरी का व्यवसाय नहीं किया। गृहस्थी खड़ी नहीं की। कलकत्ता वे इसलिए नहीं गए थे क्योंकि उस समय यूरोप महाद्वीप में महायुद्ध चल रहा था। इंग्लैण्ड युद्ध में फंसा था। उसके इस संकट का लाभ उठाते हुए विप्लव का दावानल पैदा करने का क्रान्तिकारियों का विचार था किन्तु वह सफल नहीं हुआ।
सन् 1918 में महायुद्ध समाप्त हुआ। इंग्लैण्ड विजयी हुआ। इंग्लैण्ड अधिक शक्तिशाली बना। उससे शस्त्रों की सहायता से लड़ना सम्भव नहीं रहा। यह भी स्पष्ट हुआ कि मुट्ठी भर लोगों के बलिदान से हिन्दुस्थान जैसे विशाल देश को आजाद कराना सम्भव नहीं।
स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए जनता में जागृति निर्माण करना आवश्यक है। कांग्रेस नाम से एकमेव राजनैतिक संस्था उस समय अस्तित्व में थी। उस संस्था का प्रारम्भ अंग्रेज सरकार से कुछ अधिकार प्राप्त करने के लिए किया गया था। कांग्रेस के अधिवेशन में सर्वप्रथम अंग्रेजी सत्ता के लिए एकनिष्ठा का प्रस्ताव पारित करते हुए फिर अधिकार सम्बन्धी मांगों के प्रस्ताव पारित होते थे।
लेकिन लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस में अलग विचार चलाया। हमें केवल अधिकार ही नहीं स्वराज्य चाहिए, यह घोषणा उन्होंने की। ‘स्वराज्य यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ उनकी इस घोषणा से कांग्रेस का वायुमंडल ही बदल गया और जनता में एक नवीन उत्साह का संचार हुआ किन्तु इसके साथ ही कांग्रेस में दो गुट बने। एक गुट था नरम दल तथा दूसरा था गरम दल। कांग्रेस में नरम दल वालों की संख्या अधिक थी।
उनकी राजनीति अंग्रेज सरकार के अनुकूल थी किन्तु जनसाधारण का आकर्षण गरम दल की ओर था। लोकमान्य तिलक उनकी गरम राजनीति के कारण सच्चे अर्थ में, जनता में, लोगों में मान्य थे। उनकी जनप्रियता अंग्रेज सरकार को सहन नहीं हुई। समाचार पत्र में लिखे लेखों को निमित्त बनाकर अंग्रेज सरकार ने उन पर मुकद्दमा चलाया और छह वर्ष के कारावास की सजा देकर उन्हें ब्रह्मदेश (म्यांमार) के माण्डले कारावास में भेज दिया।
सन् 1914 में लोकमान्य तिलक की कारावास से रिहाई हुई। लेकिन इन छह वर्षों में गरम दल की राजनीति ठण्डी पड़ गई थी। लोकमान्य तिलक ने ‘पुनश्च हरि ओम्’ कहते हुए कार्य आरम्भकिया। उस समय उन्हें जो युवक वर्ग सहायतार्थ मिला, उसमें नागपुर प्रान्त के डॉक्टर हेडगेवार प्रमुख थे।
इस तरह डॉक्टर हेडगेवार कांग्रेस के नेता बने। डॉक्टर मुंजे, बैरिस्टर अभ्यंकर आदि का एक ‘राष्ट्रीय मण्डल’ नागपुर में था। डॉक्टर हेडगेवार भी इस राष्ट्रीय मण्डल में आ गए। इस मण्डल के सदस्यों में वे उम्र में सबसे छोटे थे।
सन् 1920 के दिसम्बर मास में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में कराने का निश्चय किया गया। डॉक्टर हेडगेवार के जिम्मे इस अधिवेशन की व्यवस्था का दायित्व था। नागपुर के राष्ट्रीय मण्डल की इच्छा थी कि लोकमान्य तिलक अध्यक्ष बनें। यह इच्छा पूर्ण भी हो जाती, किन्तु दुर्भाग्य से 1 अगस्त, 1920 के दिन लोकमान्य तिलक का निधन हो गया।
अब कांग्रेस नेतृत्व के सूत्र महात्मा गांधी के पास आए। अंग्रेज सरकार से असहयोग और ‘स्वदेशी’ का ही उपयोग, इन दो कार्यक्रमों से सम्पूर्ण देश कांग्रेस की ओर आकर्षित हुआ। डॉक्टर जी ने भी इस कार्य में स्वयं को झोंक दिया।
जनमन में स्वराज्य की आकांक्षा उत्पन्न करने हेतु गांव-गांव प्रवास करते हुए वे भाषण करने लग गए। उनके भाषणों से अंग्रेज सरकार चिढ़ गई और उसने डॉक्टर जी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। उन्हें एक वर्ष के कारावास की सजा हुई। 12 जुलाई, 1922 के दिन वे कारावास से मुक्त हुए।
अंग्रेजी सत्ता से असहयोग और स्वदेशी, महात्मा जी के इन कार्यक्रमों से डॉक्टर जी ने स्वयं को जोड़ लिया था, किन्तु मुसलमानों के सम्बन्ध में महात्मा जी की नीति डॉक्टर जी को मान्य नहीं थी। हिन्दुस्थान की आजादी के लिए हिन्दू-मुसलमान में एकता रहनी चाहिए, यह जब महात्मा जी ने आग्रह से प्रतिपादित करना आरम्भ किया, तब डॉक्टर जी ने प्रत्यक्ष महात्मा जी से भेंट करते हुए उनसे पूछा कि हिन्दुस्थान में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि अनेक धर्मों के लोग रहते हैं, तब आप केवल हिन्दू-मुसलमान एकता की बात क्यों करते हैं? हिन्दु-मुसलमान एकता शब्द प्रचार में आने से पूर्व से ही अनेक मुसलमान कांग्रेस में आते हुए स्वराज्य के लिए कार्य कर रहे हैं। महात्मा जी ने उत्तर दिया कि हिन्दू-मुसलमान एकता की बात करते हुए मैं मुसलमानों के मन में देश के लिए आत्मीयता और प्रेम निर्माण कर रहा हूं। डॉक्टर जी को यह उत्तर जंचा नहीं, फिर भी वे कांग्रेस में कार्य करते रहे।
सन् 1918 में महायुद्ध समाप्त हुआ। जर्मनी का साथ देने वाले तुर्की की पराजय हुई। तुर्की के कई टुकड़े हुए। तुर्की का सम्राट मुसलमानों का सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरु रहता था। उसे खलीफा कहते थे। सम्राट पद समाप्त होते ही खलीफा पद भी समाप्त हो गया। तुर्कीमें नया राज्य बना। कमाल पाशा उस राज्य का प्रमुख बना। उसने खलीफा पद समाप्त कर दिया। इस कारण कट्टरपन्थी मुसलमानों ने अंग्रेजों और कमाल पाशा का विरोध करना आरम्भ किया। यहां तक सब ठीक था। किन्तु मुसलमानों को स्वराज्य-आन्दोलन में खींचने सम्मिलित करने के विचार से महात्मा जी ने खलीफा पद की पुनः स्थापना के लिए सम्पूर्ण हिन्दुस्थान में आन्दोलन चलाया। इसी को ‘खिलाफत का आन्दोलन’ कहा जाता है।
इस आन्दोलन की सफलता सम्भव ही नहीं थी। कारण तुर्की के मुसलमान स्वयं ‘खलीफा’ नहीं चाहते थे। यह आन्दोलन असफल होने से हिन्दुस्थान में उल्टा परिणाम हुआ। हिन्दुस्थान के मुसलमानों को दूसरे देश अधिक निकट लगने लगे। मुसलमानों की कट्टरता
को खाद्-पानी मिला, इतना कि जब ‘खिलाफत आन्दोलन’ असफल हुआ, तब भारत के मुसलमानों ने बदले के रूप में उल्टे हिन्दुओं पर ही हमले चालू कर दिए।
केरल का मोपला विद्रोह इन हमलों का एक अति क्रूर अध्याय है। मोपलों के इस विद्रोह में मुसलमानों ने 1500 से अधिक हिन्दुओं की हत्या की और बीस हजार से अधिक को जबरदस्ती से धर्मान्तरित किया, मुसलमान बनाया। असंख्य महिलाओं ने अपने सतीत्व की रक्षा हेतु कुओं में छलांग लगाकर प्राण विसर्जित किए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का परिचय
मा. गो. वैद्य