गलती के लिए प्रायश्चित जरूरी
अपूर्ण संसार की उपज होने के नाते हम सभी अपूर्ण हैं। हम सबने कोई-न-कोई गलती की है। कुछ बातों का हमें पश्चाताप होता है- वे काम जो हमने किए हैं या वे काम जो हमने नहीं किए। प्रायश्चित की सच्ची भावना के साथ अपनी गलतियों को स्वीकार करना हमें जीवन में सन्मार्ग पर चलने और जब भी संभव हो, अपनी गलतियों को सुधारने तथा भविष्य को ठीक करने के लिए प्रेरित करता है। यदि हम प्रायश्चित के भाव को विकृत हो जाने दें, तो वह ग्लानि में बदल जाता है और फिर अतीत में की गई गलतियों की यादें ताजा रहती हैं। इससे आत्म-निंदा व आत्म-द्वेष का भाव लगातार बना रहता है। इससे हम स्वयं को सजा देने और पीड़ा पहुंचाने का कारण बनने के अतिरिक्त कुछ नहीं करते।
मैं कभी-कभी सोचता हूं कि क्या आत्म-विध्वंसक ग्लानि में डूबे बिना जीने की कला आंशिक रूप से सांस्कृतिक होती है। अंग्रेजी के ‘गिल्ट’ (ग्लानि) शब्द के लिए तिब्बती भाषा में कोई समतुल्य शब्द ही नहीं है। हालांकि, उसमें ‘अफसोस’ या ‘पछतावा’ या ‘खेद’ का अर्थ देने वाले शब्द अवश्य हैं। इनमें ‘भविष्य में सुधार’ करने का भाव नजर आता है। इसका सांस्कृतिक पहलू कुछ भी हो, मेरा यह मानना है कि अपनी पारंपरिक विचारधारा को चुनौती देकर तथा भिन्न मानसिक दृष्टिकोण विकसित करने से हम में से कोई भी बिना ग्लानि भाव के, जिसके कारण हमें जीवन में अनावश्यक कष्ट होते हैं, जीना सीख सकता है।
ग्लानि तब होती है, जब हम अपने मन को इस बात के लिए राजी कर लेते हैं कि हमने कोई ऐसी भूल कर दी है, जिसे सुधारा नहीं जा सकता। ग्लानि का असली कष्ट यह सोचने से होता है कि हमारी समस्या स्थायी है। चूंकि ऐसा कुछ नहीं, जो बदलता नहीं है, उसी तरह पीड़ा भी शांत हो जाती है। समस्या भी स्थायी रूप से नहीं रहती। यह बदलाव का सकारात्मक पहलू है। इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि हम जीवन के लगभग हर क्षेत्र में बदलाव का विरोध करते हैं। कष्ट से मुक्त होने की शुरुआत जिस मुख्य कारण की जांच से होती है, वह है- बदलाव का विरोध।
कष्ट के कारणों का पता लगाना जरूरी
कष्ट के कारणों व उसके स्रोत का पता लगाना बहुत जरूरी होता है। इसकी शुरुआत जीवन की अस्थायी एवं नश्वर प्रकृति को समझने से होती है। सब चीजें, घटनाएं, परिवर्तनशील हैं और हर पल बदलती हैं। कोई भी चीज स्थिर नहीं है। अपने रक्त प्रवाह के बारे में सोचने से यह बात अधिक स्पष्ट हो जाएगी। हमारा रक्त हमेशा प्रवाहित होता रहता है और कभी एक जगह नहीं रुकता। यह हर पल बदलने वाली चीज हमारे भीतर की आंतरिक प्रणाली है।
चूंकि हर चीज प्रतिपल बदलती रहती है, इससे यह पता चलता है कि चीजों में सहन करने और स्थायी बने रहने की क्षमता का अभाव होता है। इस कारण कोई वस्तु स्थायी स्थिति में नहीं रह सकती और अपनी स्वतंत्र शक्ति के साथ भी उसके लिए एक-सी स्थिति में रहना संभव नहीं है। इस तरह प्रत्येक वस्तु किन्हीं अन्य कारणों के प्रभाव में रहती है, इसलिए आपका अनुभव, कभी भी, चाहे वह कितना भी अच्छा व सुखद क्यों न हो, अधिक समय नहीं टिक सकता।
गलती के लिए प्रायश्चित जरूरी
परम पावन दलाई लामा

