राष्ट्रीय एकता के अनथक साधक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
भारतीय राजनीति के इतिहास में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम उन नेताओं में लिया जाता है जिन्होंने सत्ता से अधिक सिद्धान्तों को महत्व दिया। वे स्वतंत्र भारत के उन विरले व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक अस्मिता और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया। शिक्षाविद्, सांसद, केंद्रीय मंत्री और वैचारिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उनका योगदान भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण धारा का आधार बना, जिसका प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से दिखायी देता है।
बंगाल की पहचान को सुरक्षित रखा
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व और पश्चात का कालखण्ड भारत के लिये अत्यन्त चुनौतीपूर्ण था। विभाजन की त्रासदी, विस्थापन और साम्प्रदायिक तनावों के बीच डॉ. मुखर्जी ने बंगाल के हिन्दू बहुल क्षेत्रों को भारत में बनाये रखने के लिये महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। राष्ट्रवादी विचारधारा में यह माना जाता है कि उस दौर में उनके हस्तक्षेप ने पश्चिम बंगाल की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके लिए राष्ट्र केवल राजनीतिक सत्ता का विषय नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों की ऐतिहासिक स्मृतियों, सांस्कृतिक परम्पराओं और सामूहिक चेतना का जीवन्त स्वरूप था।
सत्ता से पहले सिद्धान्त
स्वतंत्रता के बाद वे पण्डित जवाहरलाल नेहरू की मंत्रिपरिषद में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने। यह उस समय की लोकतांत्रिक उदारता का भी प्रमाण था कि भिन्न विचारधाराओं के लोग एक साथ राष्ट्र निर्माण में सहभागी बने। किन्तु जब राष्ट्रीय हित से जुड़े विषयों पर गम्भीर मतभेद सामने आये, विशेष रूप से पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर, तब उन्होंने मंत्री पद से त्यागपत्र देना उचित समझा। यह निर्णय उनके व्यक्तित्व की उस विशेषता को रेखांकित करता है जिसमें सिद्धान्त सत्ता से ऊपर थे।
जनसंघ की स्थापना
1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय सिद्ध हुई। उस समय कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व लगभग निर्विवाद था, किन्तु डॉ. मुखर्जी ने एक ऐसे वैकल्पिक राजनीतिक मंच की आवश्यकता महसूस की जो भारत की सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को केन्द्र में रखकर राजनीति करे। जनसंघ की स्थापना केवल एक राजनीतिक दल का गठन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र भारत में राष्ट्रवादी राजनीतिक विमर्श को संगठित स्वरूप प्रदान करने का प्रयास थी।
दो विधान…दो निशान नहीं चलेंगे
डॉ. मुखर्जी का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक संघर्ष जम्मू-कश्मीर के प्रश्न से जुड़ा है। उनका मानना था कि किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र में नागरिक अधिकारों और संवैधानिक व्यवस्थाओं में स्थायी असमानता राष्ट्रीय एकता के लिये चुनौती बन सकती है। इसी सन्दर्भ में उनका उद्घोष ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ भारतीय राजनीति के इतिहास में एक स्थायी स्थान प्राप्त कर चुका है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय एकीकरण की उनकी अवधारणा का सार था।
1953 में जब जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट व्यवस्था लागू थी, तब उन्होंने इसका विरोध किया। उनका प्रश्न सीधा था कि यदि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, तो किसी भारतीय नागरिक को वहाँ जाने के लिये विशेष अनुमति की आवश्यकता क्यों होनी चाहिये। इसी विचार के साथ उन्होंने बिना परमिट कश्मीर जाने का निर्णय लिया। उन्हें गिरफ्तार किया गया और हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को उनका निधन हो गया। राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से उनकी यह यात्रा केवल एक राजनीतिक आन्दोलन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिये किये गये त्याग और संकल्प का प्रतीक मानी जाती है।
राष्ट्र प्रथम की भावना
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीति का मूल तत्व राष्ट्र प्रथम की भावना थी। वे मानते थे कि लोकतंत्र तभी सशक्त हो सकता है जब उसके केन्द्र में राष्ट्रीय हित, सांस्कृतिक आत्मबोध और नागरिक उत्तरदायित्व उपस्थित हों। उन्होंने भारतीयता को किसी संकीर्ण पहचान के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे ऐसी सांस्कृतिक चेतना माना जो देश की विविधताओं को एक सूत्र में बाँधती है। यही कारण है कि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रमुख विचारकों और प्रवक्ताओं में गिने जाते हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद उनके उस लम्बे वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष की चर्चा व्यापक रूप से होने लगी, जिसे उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रारम्भिक वर्षों में उठाया था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि इतिहास केवल सत्ता में रहने वालों से नहीं बनता, बल्कि उन लोगों से भी बनता है जो अपने विचारों के प्रति निष्ठावान रहते हुए राष्ट्रीय हित के प्रश्नों पर स्पष्ट और साहसिक पक्ष लेते हैं। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि उस राष्ट्रवादी चेतना के प्रतिनिधि थे जो भारत को सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी, राजनीतिक रूप से एकीकृत और लोकतांत्रिक रूप से सशक्त राष्ट्र के रूप में देखना चाहती थी। इसी कारण उनका जीवन भारतीय सार्वजनिक जीवन में प्रेरणा, वैचारिक दृढ़ता और राष्ट्रनिष्ठा के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा।
शिक्षा राष्ट्र निर्माण का माध्यम
6 जुलाई 1901 को कोलकाता में जन्मे डॉ. मुखर्जी ऐसे परिवार से थे जहाँ शिक्षा और राष्ट्रचिन्तन दोनों का गहरा वातावरण था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी भारतीय शिक्षा जगत के प्रतिष्ठित नामों में गिने जाते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कम आयु में ही अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया और मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। उस समय वे भारत के सबसे युवा कुलपतियों में से एक थे। उनका विश्वास था कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का माध्यम है। यही कारण था कि उनके चिन्तन में शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण एक-दूसरे के पूरक दिखायी देते हैं।
सोनी सिंह

