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स्वयंसेवक कौन – सेवा जब स्वभाव बन जाए

स्वयंसेवक कौन – सेवा जब स्वभाव बन जाए

एक बार एक वृद्ध व्यक्ति और एक युवक सड़क के किनारे बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी वहाँ एक अंधा व्यक्ति आया। उसे सड़क पार करनी थी, लेकिन तेज यातायात के कारण वह सड़क पार नहीं कर पा रहा था।

पहली स्थिति में वृद्ध व्यक्ति ने युवक से कहा, “बेटा, इन्हें सड़क पार करा दो।” युवक ने प्रसन्नता से उनकी बात मानी और उस अंधे व्यक्ति को सुरक्षित सड़क पार करा दी। यह एक अच्छा कार्य था, परंतु उसने यह कार्य किसी के कहने पर किया था।

अब उसी घटना को दूसरी दृष्टि से देखें।

एक बार एक वृद्ध व्यक्ति और एक युवक सड़क के किनारे बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी वहाँ एक अंधा व्यक्ति आया। उसे सड़क पार करनी थी, लेकिन तेज यातायात के कारण वह सड़क पार नहीं कर पा रहा था।

युवक ने यह देखा और बिना किसी के कहे स्वयं आगे बढ़ा। उसने उस व्यक्ति का हाथ थामा और उसे सुरक्षित सड़क पार करा दी। उस व्यक्ति के चेहरे पर संतोष देखकर युवक के मन में भी आनंद और तृप्ति का भाव उमड़ आया।

दोनों परिस्थितियों में कार्य एक ही था—एक असहाय व्यक्ति को सड़क पार कराना। किंतु दोनों में एक सूक्ष्म अंतर था। पहली बार युवक ने प्रेरणा बाहर से प्राप्त की थी, जबकि दूसरी बार प्रेरणा उसके भीतर से जागी थी। यही अंतर एक सामान्य व्यक्ति और स्वयंसेवक के बीच होता है।

स्वयंसेवक वह नहीं है जो केवल किसी के आदेश पर सेवा करता है। स्वयंसेवक वह है, जिसके भीतर समाज के प्रति संवेदना जागृत हो, जो आवश्यकता को स्वयं पहचाने, बिना किसी अपेक्षा और बिना किसी निर्देश के आगे बढ़कर अपना कर्तव्य निभाए।

सेवा उसके लिए कोई कार्य नहीं, बल्कि उसका स्वभाव होती है और समाज का दुःख उसे अपना दुःख प्रतीत होता है।

इसीलिए कहा जाता है—

“जहाँ किसी के कहने की आवश्यकता समाप्त हो जाए और कर्तव्य का भाव स्वयं जागृत हो जाए, वहीं से स्वयंसेवक का जन्म होता है।”

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