गुरु के रूप में मार्गदर्शन करता है ‘भगवा ध्वज’
डॉ. लोकेन्द्र सिंह
लेखक, वरिष्ठ स्तम्भकार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा ध्वज को जो स्थान दिया गया है, वह इस संगठन की विशिष्टता को दर्शाता है। संघ के लिए भगवा केवल ध्वज मात्र नहीं है, अपितु यह उसके प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बिन्दु है। संघ में भगवा ध्वज को ‘गुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। सामान्यतौर पर यही देखने में आता है कि किसी सांस्कृतिक/धार्मिक संगठन का संस्थापक ही उस संगठन के अनुसरणकर्ताओं के लिए गुरु के रूप में सम्मानित होता है। परंतु संघ इस सामान्य परंपरा से अलग लकीर खींचता दिखायी देता है। जिस प्रकार किसी संस्था से सम्बद्ध लोग गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज से प्रेरणा प्राप्त कर सामाजिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ में गुरु के रूप में भगवा ध्वज को मान्यता दिए जाने का प्रसंग बहुत प्रेरक है। यह एक प्रसंग ही संघ के ध्येय, उसकी कार्यपद्धति और महानता को बताने के लिए पर्याप्त है।
विजयादशमी के पर्व पर 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब इसके संबंध में बहुत बातें तय नहीं की गई। बस हिन्दुओं का संगठन करना है, हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र कराना है और उसे परम वैभव पर पहुंचाना है, इसी संकल्प के साथ डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ शुरू कर दिया था। संघ कार्य बढ़ने के साथ ही उसके स्थायित्व एवं दृढ़ीकरण के संबंध में डॉक्टर साहब ने अनेक प्रकार से विचार करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने विचार किया कि संगठन को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए। अर्थ के लिए किसी पर आश्रित रहने पर यह संगठन अपने ध्येय पथ पर आगे नहीं बढ़ पाएगा। इस संबंध में डॉक्टर साहब ने उस समय के स्वयंसेवकों के साथ गहन विचार-विमर्श किया। स्वयंसेवकों ने अनेक प्रकार से अपने मत को प्रकट किया, किसी ने चंदा लेने का सुझाव दिया, किसी ने सदस्यता शुल्क, किसी ने दान तो किसी ने अपने ही खर्च से कटौती कर कुछ राशि संघ कार्य के लिए देने का सुझाव दिया। सबके विचार सुनने के बाद दूरदृष्टा डॉ. हेडगेवार ने संघ को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘गुरु पूजन एवं समर्पण’ की अभिनव पद्धति की संकल्पना स्वयंसेवकों के सामने रखी और आग्रह किया कि हम भी संघ कार्य के लिए अर्थ पूर्ति के लिए इस पद्धति को स्वीकार करें।
समाज में गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है। गुरु पूजन के साथ ही लोग अपने गुरु के सामने समर्पण करते हैं। हम भी संघ कार्य के लिए गुरु दक्षिणा करेंगे। डॉक्टरजी की इस संकल्पना से सभी स्वर्षसेवकों के विचार को एक नयी दिशा मिली और विशुद्ध भावना से ‘गुरुदक्षिणा’ समर्पण का विचार सभी स्वयंसेवकों के हृदय में बस गया। दो दिन बाद ही व्यास पूर्णिमा थी। इसलिए डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों तक सूचना पहुंचाई कि व्यास पूर्णिमा के दिन सुबह ही स्नान आदि विधि पूर्णकर हम सारे स्वयंसेवक एकत्रित आयेंगे और श्री गुरुपूर्णिमा एवं श्री गुरुदक्षिणा का उत्सव मनाएंगे। डॉक्टरजी की यह सूचना पाते ही स्वभाविक रूप से ही स्वयंसेवकों के मन में विचार चलने लगा कि हम गुरु के नाते किसको पूजा करेंगे? स्वयंसेवकों का गुरु कौन होगा ? सबके मन में यह विचार आया कि डॉक्टरजी के सिवा हमारा गुरु कौन हो सकता है? उन्होंने ही इस संगठन को शुरू किया है। इसलिए उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने का यह महान अवसर हमें मिला है। हम गुरुपूजन उत्सव में उन्हीं का पूजन करेंगे। कुछ स्वयंसेवकों के विचार में, राष्ट्रगुरु तो समर्थ रामदास स्वामी हैं। प्रार्थना के बाद नित्य हम उनकी जय जयकार करते हैं। उस समय प्रार्थना के बाद समर्थ रामदास स्वामी का जयकारा लगाया जाता था। इस तरह के अनेक विचार स्वयंसेवकों के मन में आ रहे थे। यह स्वभाविक ही था।
आखिर वह दिन आ गया, जब संघ का पहला गुरु पूजन उत्सव मनाने के लिए स्वयंसेवक एकत्र आए। सबके मन में अपार हर्ष और उत्साह था। परंतु जैसे ही डॉक्टर हेडगेवार ने अपने भाषण में कहा कि- ‘गुरु के रूप में हम परम पवित्र भगवा ध्वज का पूजन समर्पण करेंगे’ तो स्वयंसेवक अचंभित रह गए। भगवा ध्वजको ही गुरु के रूप में मनाने का विचार क्यों बना, इसको स्पष्ट करते हुए डॉक्टरजी नेकहा- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी व्यक्ति को गुरु न मानकर परम पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु मानता है। व्यक्ति कितना भी महान हो फिर भी उसमें अपूर्णता रह सकती है। इसके अतिरिक्त नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति सदैव ही अडिग रहेगा।
तत्त्व सदा अटल रहता है। उस तत्त्व का प्रतीक भगवा ध्वज भी अटल है। इस ध्वज को देखते ही राष्ट्र का सम्पूर्ण इतिहास, संस्कृति और परम्परा हमारी आंखों के सामने आ जाती है। जिस ध्वन को देखकर मन में स्फूर्ति का संचार होता है वह अपना भगवा ध्वज ही अपने तत्त्व के प्रतीक के नाते हमारे गुरु-स्थान पर है। संघ इसलिए किसी भी व्यक्ति को गुरु-स्थान पर रखना नहीं चाहता’। भाषण के उपरान्त सर्वप्रथम डॉक्टरजी ने स्वयं गुरु पूजन किया। तदनन्तर समवेत स्वयंसेवकों ने एक-एक करके पूजा की। इस तरह 1928 में नागपुर में हुए पहले गुरु पूर्णिमा उत्सव में केवल 84 रुपये और कुछ आने ही गुरु दक्षिणा आई। आज भी संघ कार्य का व्यय गुरु दक्षिणा की राशि से ही होता है।
एक समय जब कुछ लोगों ने डॉक्टरजी के सम्मुख यह सुझाव रखा कि संघ के ध्वज का आकार बदलकर उसमें कुछ अभिनवता लानी चाहिए, तब डॉक्टरजी ने इस सुझाव का जो उत्तर दिया उससे प्रकट होता है कि ध्वज के सम्बन्ध में उनके मन में कितनी निश्चित और स्पष्ट कल्पना थी। उन्होंने कहा- ‘भगवा ध्वज का इतिहास तीन सौ वर्ष का न होकर बहुत पुराना है। कम-से-कम आद्य शंकराचार्य ने तो अपनी दिग्विजय इसी ध्वज की छत्रछाया में की थी। इस विषय में किसी को शंका होने का कारण नहीं है। उससे भी कितने पहले तक इस ध्वज का इतिहास जा सकता है इसका विचार संशोधकों को अवश्य करना चाहिए। हिन्दू राष्ट्र अति पुराना राष्ट्र है। अतः उसका ध्वज भगवा ध्वज भी उतना ही पुरातन है’। कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, तात्विक, आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण ही उसे अपने गुरु के स्थान पर सुशोभित किया है।

