श्रीरामजन्मभूमि : तपस्वी पीढ़ियों की पुण्यकथा
अयोध्या चर्चा में है, सदा रहती आयी है। मानवेन्द्र महाराज मनु-निर्मिता यह नगरी कभी अप्रासंगिक नहीं होती। सन्दर्भ-प्रसंग कोई हो, पर अयोध्या उल्लेखनीय बनी रहती है। वास्तव में यह उल्लेखनीयता इसके महत्त्व का सहज प्रमाण ही है। किस प्रकार धर्म के बल से, खोये हुए को पुनः पाया जाता है, अयोध्या इसका उदाहरण है। लोकोत्तर बल, विश्वास एवं वैभव की राजधानी ही मर्यादापुरुषोत्तम की राजधानी है। एक भौतिक नगर की सामान्य पहचान से बढ़कर अयोध्यापुरी भारतीय जीवन की चिराचरित आस्था, सांस्कृतिक उत्तराधिकार तथा आध्यात्मिकता का मानबिन्दु बनकर स्थित है। इसकी स्थिति मात्र भौगोलिक नहीं अपितु चिन्मयी है। आर्ष प्रमाण कहते हैं कि यह श्रीहरि के सुदर्शन चक्र पर अवस्थित है। इस नगरी के माहात्म्य-कथन इसमें निहित तात्तविक विशिष्टता को रेखांकित करते हैं। आज पुनर्निर्माण, विस्तार तथा भौतिक विकास से पहचानी जाती अयोध्या की इस यात्रा का इतिहास यद्यपि युगों पुराना है तथापि बीती पाँच शताब्दियों के सन्दर्भ में यह विशेष उल्लेखनीय रहा है।
मूल्यनिष्ठ व्यवस्था :
अयोध्या के व्याज से हम भारत को ही देखते-पहचानते हैं। अतः यह देखना स्वाभाविक है कि भारत देश पर हुए विदेशी-विधर्मी आघात केवल व्यवस्था की हानि तक ही सीमित नहीं रहे। अपितु वे संस्थाओं एवं विशेष रूप से आस्थाओं को क्षति पहुँचाने पर केन्दि्रत हुए। थोड़ा धैर्यपूर्वक देखेंगे तो यह बात स्पष्ट होगी कि जीवन आस्था से चलता है। आस्था ही इसे दिशा देती है, बल देती है और फल देती है। यह आस्था व्यष्टि से समष्टि-पर्यन्त प्रवाहित रहे इसके लिये व्यवस्थाएँ निर्मित होती हैं और फिर ये व्यवस्थाएँ ही संस्था का रूप लेती हैं। संस्था का उद्देश्य व्यवस्थाओं को ऐसे प्रबन्धित रखना होता है, जिससे अन्तर्निहित आस्था एवं तज्जन्य मूल्यबोध लुप्त न होने पाये। अयोध्या इसी आस्था की प्रथम राजधानी है। ऐसी राजधानी जो भोग में संयम, राज्य में नीति, समृद्धि में त्याग, सामर्थ्य में उदारता और ज्ञान में मौन की प्रतिष्ठा करती है। यह भी समझना कम रोचक नहीं है कि पाँच सौ वर्ष पूर्व सोए हुए भारत को इसकी अस्मिता में जगाते हुए सांस्कृतिक सूर्य गोस्वामी तुलसीदास और उपनिवेश के कठिन कुचक्र में पड़े भारत को उबारते हुए गांधी जी ने जिन श्रीराम के नाम को आधार बनाया था। हमारे वर्तमान में भी भारत एक बार फिर उन्हीं श्रीराम के नाम से जगा है।
आधुकिता में प्रासंगिक हुआ रामत्व :
श्रीजन्मभूमिमन्दिर-निर्माण का संघर्ष भारत के स्वातन्त्रयोत्तर काल का सबसे बड़ा और सफल संघर्ष है। हालाँकि, यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि श्रीरामजन्मभूमि आन्दोलन की जड़ें गहरी हैं और यह स्वाधीनता-संग्राम से भी पुराना है। मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाने की दुर्नियति और इससे उपजे संघर्ष के अनेक पृष्ठ हमारे इतिहास-बोध में अनुपस्थित से हैं। 1857 की जिस घटना को भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाता है, श्रीरामजन्मभूमि-मुक्ति का संघर्ष उससे भी अधिक पुराना है। 1858 में निहंग सिखों द्वारा श्रीजन्मभूमिमन्दिर की मुक्ति के हेतु किया गया संघर्ष इसका उदाहरण है। इसे ऐसे भी देखा जाना चाहिये कि विधर्मी आक्रमणकारी सत्ता द्वारा जन्मभूमि-मन्दिर का विध्वंस किये जाने के बाद से इसकी मुक्ति एवं पुनर्प्रतिष्ठा का भाव भारतीय आस्था को सदा उद्वेलित करता रहा। पाँच शताब्दियों के सुदीर्घ काल में यह उद्वेलन रूप-आकार लेता रहा, कथा-कविता बनकर यह व्यथा मुखर होती रही। परन्तु, जब-तक यह संघर्ष एक मन्दिर-प्रसाद पर केन्दि्रत रहा तबतक इसको वाञ्छित बल प्राप्त नहीं हो सका। जब इसे एक भवन से आगे निकालकर रामत्व की व्यञ्जना में परिभाषित किया गया तो सम्पूर्ण प्राय भारत इससे हृदयतः जुड़ गया। यह एक रोचक बात है, इसे ठीक से समझा जाना चाहिये। हम श्रीराम का मन्दिर बनाकर उनकी पूजा करते हैं। परन्तु हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना ने श्रीराम की प्रभुता को कभी मन्दिर-मात्र में सीमित नहीं किया। हम मन्दिर में विराजमान श्रीराम के सम्मुख भी सदा दुहराते रहे- ‘जय जय अबिनासी सब घट बासी व्यापक परमानन्दा।’ हमारी आस्था, व्यवस्थाओं का और उनके लिए संस्थाओं का निर्माण करते हुए भी स्वयं उनमें जड़ नहीं हुई। अतः, जब श्रीराममन्दिर का संघर्ष, श्रीराम के नाम का-उनके स्मरण का संघर्ष बना तब बृहत्तर भारत और भारत-भूमि के बाहर बैठे भारतीय भी एकाग्र हो गये। यह संघर्ष किसी मन्दिर मात्र के संघर्ष से अधिक अर्थवान् हो उठा। यह धार्मिक उत्तरदायित्व की-सांस्कृतिक साझेदारी का संघर्ष बन गया। भले ही यह यात्रा कभी सरल नहीं रही, फिर भी इसकी सफलता का सन्देह निवृत्त हो गया। एक मन-प्राण हुए देश ने इसे आशा से विश्वास में बदल दिया। साधुओं ने बलिदान दिए, धार्मिक योद्धाओं ने संघर्ष किए और शताब्दियों का ज्वार रह-रहकर उमड़ता रहा। समय बीतता गया, अनेक प्रसंग आये जिसमें स्वतन्त्रता-संग्राम भी एक है। देश स्वाधीन हुआ और इस क्रम में स्वतन्त्र होने से पूर्व ही विभाजित हो गया, सामुदायिक संघर्ष के नये अध्याय खुल गये।
रामलला का अर्चावतार :
स्वाधीन भारत को जिस आत्मवत्ता में पुनर्जीवित होना था, वह धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ गयी। बहुसंख्य समाज अपने एकमात्र अधिष्ठान भारतवर्ष में राजनैतिक तुष्टीकरण के छद्म से घिर गया। इन सबके बाद भी वर्ष 1949 जाते-जाते श्रीरामजन्मभूमि-आन्दोलन के बहुआयामी संघर्ष को एक प्रस्थान-बिन्दु दे गया। इस वर्ष के बाईस-तेईस दिसम्बर की रात, मन्दिर ध्वस्त करके बनाये गये तीन गुम्बद वाले ढाँचे के भीतर रामलला प्रकट हो गये। चाहने वालों ने इसे दैवी चमत्कार कहा, न चाहने वालों ने कब्जेदारी का षड्यन्त्र। हुआ यह कि बाईस दिसम्बर की रात पहरेदार विवादित ढाँचे की अपनी नियमित सेवा पर थे और तेईस दिसम्बर की सुबह ढाँचे में रामलला को विराजमान पाया गया। साधु-सन्तों का समाज प्रभु के प्राकट्य का उत्सव मनाने वहाँ पहुँच गया। विरोध हुआ और थाने में मुकदमा लिखा गया, उसके अनुसार कुछ लोगों ने रात्रि में बलपूर्वक घुसकर विवादित ढाँचे के मध्य कक्ष में मूर्त्तियाँ रख दी थीं। यद्यपि रात्रि में पहरेदारी पर रहे मुस्लिम सिपाही ने बयान दिया कि उसने रात्रि में बारह बजे एक अद्भुत प्रकाश देखा, जिसके बाद उसने पाया कि मन्दिर में मूर्त्तियाँ विराजमान हैं। इस आकस्मिक परिस्थिति ने राजनैतिक उथल-पुथल मचा दी। तत्कालीन केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सत्ता ने मूर्त्तियाँ हटाने का आदेश दिया, जिसे स्थानीय प्रशासन ने नहीं माना। प्रशासन ने कहा कि ऐसा कोई भी कार्य साम्प्रदायिक संघर्ष को इतना उग्र कर देगा जिसे सँभालना कठिन हो जायेगा। इस प्राकट्य-प्रसंग से रामलला ने हिन्दू आस्था से छिनी हुई आधार-भूमि लौटा दी।
प्राच्य वैभव का पुनःस्थापन :
वे लौटा देते हैं, यही श्रीराम का यश है, वे खोया हुआ वापस लौटा देते हैं – गयी बहोर गरीब नवाजू। पर, यह एक पड़ाव भर था, आगे दुर्गम चढ़ाइयाँ थीं। ताला बन्द होना, ताला खुलना, पूजा का अधिकार, न्यायालय और वाद-प्रतिवाद के प्रसंगों ने इस अपराजिता पुरी को विवाद का लाञ्छन दे दिया। देश के चित्त में एक असन्तोष व्याप्त रहा। सन्त-महात्मा जप-तप, जागरण-अनुष्ठान के साथ अपनी प्रतिबद्धता को दुहराते रहे। एक समय आया, जब सन्त-समाज की यह पीड़ा सर्व-समाज को स्पर्श करने लगी। नब्बे के दशक में सन्तों की धर्मसंसद ने एक निर्णायक मोड़ लिया। विश्व हिन्दू परिषद् ने श्रीरामजन्मभूमि-मुक्ति के संकल्प से स्वयं को जोड़ा। देशव्यापी जन-जागरण अभियान चला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यशैली ने इस आन्दोलन को समग्रता दी, देवालय से न्यायालय तक सर्वत्र प्रार्थनाओं का स्वर साधा गया। मनस्वी एवं तपस्वी नायकों ने जीवन-अर्पण व्रत लिया। अगणित प्रयोग प्रारम्भ हुए, व्यापक तैयारियाँ हुई। राजनैतिक पेचबाजियों से असन्तुष्ट समाज, क्रान्ति की बैचैनी से भर उठा। कारसेवा का विकल्प उभरा और समस्तप्राय देश से लाखों श्रद्धालु अयोध्या आ पहुँचे। नवम्बर 1990 में मन्दिर-निर्माण के आह्वान पर अयोध्या आये कारसेवकों पर पुलिस ने गोली चलायी, अनेक कारसेवकों के प्राण चले गये। यह सब हिन्दुस्थान कहलाने वाले देश भारत के बहुसंख्य हिन्दू समाज के साथ हुआ। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने मन्दिर-आन्दोलन को एक अलग तेवर दे दिया। वही तेवर था जिसका परिणाम दिसम्बर 1992 में सामने आया। श्रीराममन्दिर तोड़कर सैकड़ों वर्ष पूर्व बनाये गये ढाँचे को लाखों कारसेवकों के विशाल समूह ने धराशायी कर दिया। यह अप्रत्याशित था पर अभूतपूर्व नहीं था। राजशाही में विधर्मी सत्ता ने जो मन्दिर गिराकर ढाँचा खड़ा किया था, लोकशाही में जनता ने उस ढाँचे को ध्वस्त कर दिया। इस घटना पर बहुत आँधी-तूफान खड़ा हुआ, राजनीति के समीकरण बने-बिगड़े, पर इसी घटना ने जैसे विचार का मार्ग प्रशस्त कर दिया। अव्याख्येय हो चली स्थितियों की व्याख्या प्रारम्भ हो गयी। न्यायालय का चिन्तन प्रारम्भ हुआ और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के न्यायाधीश धार्मिक वाद का निर्णय करने को बाध्य हुए। पुराण-इतिहास-पुरातत्त्व सब प्रासंगिक हो उठे, सबकी छानबीन की जाने लगी। सही होने की विमर्शहीन घोषणा को चुनौती मिल चुकी थी, इतिहास अपना परिष्कार करने को आतुर था। उच्चतर न्यायालय से और फिर उच्चतम न्यायालय से अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर को मान्यता मिली। श्रीरामजन्मभूमि को पुनः निर्विवाद देवालय की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। न्यायालय के निर्देशानुसार ट्रस्ट का गठन हुआ और मन्दिर-निर्माण का उपक्रम प्रारम्भ हुआ। मन्दिर-निर्माण हेतु विपुल धनराशि देशवासियों ने समर्पित की। प्रधानमन्त्री श्रीनरेन्द्र मोदी ने अयोध्या आकर मन्दिर का भूमिपूजन किया। निर्माण प्रारम्भ हुआ, यह केवल मन्दिर-निर्माण नहीं था, यह एक मानस-निर्माण था, भारतीय जन-मानस का निर्माण। युग करवट ले रहा था, अपनी अस्मिता, अपनी आस्था एवं अपने खोये हुए आत्मविश्वास को पुनः पाने का अनूठा प्रसंग था यह। कहाँ का पत्थर, कहाँ की लकड़ी, कहाँ का शिल्प, कहाँ का श्रम, ऐसा लगता था जैसे भारत-पुरुष प्रबुद्ध होकर अपने कृतित्व को निखार रहा हो। अगस्त 2020 में भूमिपूजन करने आये प्रधानमन्त्री, जनवरी 2024 में श्रीरामलला के प्राण-प्रतिष्ठा-महोत्सव में पुनः अयोध्या आये। सम्पूर्ण भारत प्रातिनिधिक रूप में इस अद्वितीय महोत्सव का अंग बना। इस अवसर पर प्रधानमन्त्री श्रीनरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘यह नये कालचक्र का प्रवर्तन है। यह राम से राष्ट्र एवं देव से देश की चेतना का विस्तार है।’
राष्ट्र में प्राणवत्ता की प्रतिष्ठा :
अयोध्या में मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के जन्मस्थान पर एक बार फिर से भव्य मन्दिर में श्रीरामलला विराजमान हुए। यह प्रतिष्ठा कोई साधारण प्रतिष्ठा नहीं है, यह भारत में भारत की प्राणवत्ता की प्रतिष्ठा है। इसने इतिहास की धूल से ढँकी अयोध्या को फिर से उद्भासित कर दिया है। नवनिर्मित विमानतल, उच्चीकृत रेलवे स्टेशन, प्रशस्त मार्ग और अन्य अनेक आयामों ने इस ग्राम्याञ्चल को सर्वथा नये अर्थतन्त्र से जोड़ दिया है। सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं व्यावसायिक सन्दर्भों में अयोध्या पुनर्भाषित हो रही है। यह पुनर्नवा आस्था के अभिनव पृष्ठों का उद्घाटन है। अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि की पुनर्प्रतिष्ठा हमारी पूर्वज पीढ़ियों की दुश्चर तपस्या की पावन कथा है। यह कथा आगे की शताब्दियों को उजाला देगी, उनका मार्ग आलोकित करेगी, उन्हें विश्वास दिलायेगी कि हमारे इतिहास में केवल मन्दिर तोड़े ही नहीं गये, उन्हें पुनः बनाया भी गया है। यह कथा हमारे नायकों के पुण्य-प्रसंगों का मंगलगान बन गयी है। पूज्य सन्तों के असाधारण सत्त्व बल से, विश्व हिन्दू परिषद् के सतत संघर्ष से, राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के राष्ट्रव्यापी उपक्रमों से, कारसेवकों के चिरस्मरणीय बलिदान से और अशेष भारतीय जन के एकात्म अनुष्ठान से यह कथा अपूर्व हो गयी है। यह कथा छल-कपट की राजनीति में चुनावी घोषणा के पूरे होने का भी प्रमाण बनी है। भारतीय जनता पार्टी ने इसका श्रेय पाया है।
कोविदार ध्वज का आरोहण :
पाँच सौ वर्षों के त्रासद इतिहास से उबरकर पाँच वर्षों के भीतर हमने भूमिपूजन से शिखर-पूजन तक का दर्शन किया है। श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के स्वर्णाभ शिखर पर लहराते केसरिया ध्वज का दर्शन हमें सुलभ है। यह लहराता हुआ ध्वज मात्र आस्तिकता का नहीं अपितु, भारत की सम्प्रभुता, इस देश की नैतिकता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का भी वैश्विक उद्घोष करता है।
स्थिर हो पवित्रता :
सरयू के तट पर बसी हुई भारतीय आख्यानों की प्रथम पुरी कहलाने वाली अयोध्या ने समय के विविध रंग देखे हैं। सूर्यवंशी राजाओं का बल-वैभव, उनका तप-त्याग और वैकुण्ठपति भगवान्ा् का अवतरण अयोध्या ने देखा है। त्रेता में, इसी अयोध्या में नारियों की आदर्शभूता जगज्जननी श्रीजानकी ने कुलवधू होकर चरण रखे। इस अयोध्या ने श्रीराम को श्रीजानकी एवं श्रीलक्ष्मण के साथ वनगमन करते और सत्यसन्ध महाराज दशरथ को प्राणत्याग करते देखा है। परन्तु, यह पुरी जिसका एक नाम सत्या भी है, यह अपने सत्ा् से कभी विचलित नहीं हुई। वनवास की अवधि पूरी कर श्रीराम वापस अयोध्या आये, श्रीभरत के आँसू पोछे और राज्यारूढ़ हुए। अयोध्या ने विश्वभर को रामराज्य का आदर्श दिया है। तथापि, कलियुग की इस छठीं सहस्राब्दी तक आते-आते मानव-समाज अयोध्या भाव को समझने की क्षमता से चूकने लगा है। हमारी पुण्य कथाएँ हमारे ही विश्वास से बाहर जाने को विवश सी प्रतीत होती हैं। विश्व में आधुनिक वैचारिकी के नाम पर जो उन्माद जगा है, उसने मनुष्य को मानो इसकी कक्षा से ही विस्थापित कर दिया है। संशय, आत्महीनता और आक्षेपों के बीच सच जैसे कहीं मुख छिपाकर खड़ा हो। श्रीरामजन्मभूमि के पुनर्निर्माण की यह गाथा हमें अपने स्वरूप-बोध के लिये, अपने विश्वासों में से फिर से खड़े होने के लिए और मन्थराओं की कपट-युक्तियों को पहचानने के लिये भी प्रेरित करती है। दूसरे हम पर विश्वास करें, इससे पूर्व हमें स्वयं पर विश्वास करना होगा। अयोध्या की भूमि पर विराजमान श्रीरामजन्भूमि मन्दिर का दर्शन करते हुए, हमें अपनी भावभूमि पर भी इस देवालय का चिन्मय रूप दिखायी पड़ना चाहिये। भारत योगक्षेम को निरूपित करने वाला देश है। प्राप्ति को संरक्षण की अपेक्षा होती है, बहुमूल्य प्राप्तियों का बहुविध संरक्षण करना होता है।
यही समय है जब हमें प्राप्तियों को सँभालने का अभ्यास करना है। माँगने में अभाव कारक हो सकता है, किन्तु प्राप्ति को सहेजने में स्वभाव की परीक्षा होती है। हमने मन्दिर बना लिया है, श्रीरामलला विराजमान हो गये हैं, अब मन्दिर की संस्कृति, धार्मिकता के अनुशासन और उपासना की पवित्रता को स्थिर करना हमारा दायित्व है।
प्रत्येक कथा का एक देवासुर-सन्दर्भ होता है, इसका भी है। असुर समुद्र-मन्थन से पाया हुआ अमृत-कलश छीन ले जाते हैं, यह हमारी कथाओं का सच है। हमें इस सच के साथ जीने का अभ्यास करना है। विकास में मूल्यबोध, उत्थान में विनयशीलता और अनुकूलता में संयम का व्रत ही हमारा पाथेय बन सकता है। श्रीराममन्दिर की प्रतिष्ठा का उत्सव मनाते हुए हमें नित्य अपने भीतर रामत्व का अनुसन्धान करना होगा। अपनी भावभूमि का शोधन करना होगा और इस प्राप्ति का पुण्यफल आगामी पीढ़ियों के लिये सुरक्षित करना होगा।l

