गीधराज जटायु की भव्य सौवर्ण प्रतिमा
चरित्र केवल कथा नहीं है, यह दैनन्दिन क्रिया है। ऐसी क्रिया जिसमें रक्त के एक-एक बिन्दु, आयु के एक-एक क्षण एवं जीवन के एक-एक श्वास का होम करना पड़ता है।
श्रीराम जन्मभूमि परिसर में अवस्थित कुबेर टीला अत्यन्त प्राचीन पौराणिक स्थल है। अयोध्या माहात्म्य में श्रीराम कोट के तीर्थों का वर्णन करते हुए नवरत्न के नाम से कुबेर टीले का उल्लेख प्राप्त होता है – “सुषेणो वानरश्रेष्ठो नवरत्नस्य पूर्वतः। नवरत्नादुत्तरे तु गवाक्षो नाम वानर:॥”
इसी नवरत्नकूट अर्थात् कुबेर टीले पर स्थापित है गीधराज जटायु की भव्य सौवर्ण प्रतिमा।

अधुनातन सन्दर्भों में उद्भासित होती अयोध्या अपने सनातन मूल्यों के चिह्न प्रकट कर रही है। उन्हीं मूल्य-प्रतीकों में एक हैं गीधराज जटायु। चक्रवर्ती महाराज दशरथ के मित्र और भगवती जानकी की रक्षा हेतु जीवन न्यौछावर करके परोपकार की असाधारण शिक्षा देने वाले जटायु। जिन्होंने श्रीराम की गोद में शरीर त्यागा और जिनकी अन्त्येष्टि स्वयं अपने करकमलों से श्रीराम ने की ऐसे जटायु। जिनको अश्रु विगलित श्रीराम पिता कहकर सम्बोधित करते हैं – “मेरे जान तात कछुक दिन जीजै। लीजै आप सुवन सेवा सुख मोहिं पितु को सुख दीजै।”
कुबेर टीले पर दृश्यमान स्वर्णाभ जटायु भारत के इतिहास पुराण में स्वर्णाक्षरों से अंकित हैं। आदि काव्य में महर्षि वाल्मीकि उनका चरित कहते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं- ‘धन्य जटायू सम कोउ नहीं। ‘ भोजपुरी को अपनी असाधारण रचनाशीलता से समृद्ध करने वाले महाकवि चंद्रशेखर मिश्र ने अपने द्रोपदी खण्डकाव्य में जटायु के प्रसंग से अत्यन्त मार्मिक बात कही है कि इस देश को क्या हो गया है। कहाँचले गए वो लोग जो किसी निर्बल की पुकार को अनसुना नहीं कर सकते थे। यही देश है जिसमें एक स्त्री की आर्त्त पुकार सुनकर उसके रक्षार्थ एक गीध ने अपने प्राण दे दिए थे –
सीय के रोवत देखि अकास में,
आँखी के आगे ना पाप सहइलें।
रावन – गीध में का समता
पर पाँखि औ चोंचन से लड़ि गइलें।
देस उहै सब लोग उहै पर,
उ दिनवाँ कहवाँ चलि गइलें।
लाज बचावे बदे पर नारी कऽ
भारत में गिधवउ मरि गइलें।
वही गीध जटायु श्रीराम मन्दिर परिसर में पधराए गए हैं। यह स्थापना उन मूल्यों की स्थापना है जिनके प्रतिनिधि श्रीराम हैं। यह केवल देवालय नहीं अपितु मनुष्यों के संस्कार का सनातन विद्यालय उभर रहा है।

