आज बिना इन्टरनेट और कृत्रिम बुद्धि के जीवन की कल्पना करना असम्भव है। इन दोनों ने मिलकर सामान्य जीवन को पहले की तुलना में सरल कर दिया है। पहले जिन कामों में घण्टों लगा करते थे, वे अब एक क्लिक में हो जाते हैं। दैनिक जीवन की आवश्यकताओं, नागरिक प्रशासन, शिक्षा, व्यवसाय, चिकित्सा, न्यायिक प्रक्रिया, फैशन, मनोरंजन ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है, जो इससे अछूता हो।
जीवन को सरल बनाने और गति देने वाले इन्टरनेट और कृत्रिम बुद्धि के दूसरे पहलू भी हैं, जो साइबर अपराध, स्वास्थ्य दुष्प्रभाव, राजनैतिक उठापटक, सामाजिक मर्यादाओं के गिरावट बढ़ा रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग तथा व्यवस्थाएँ इनके मकड़जाल में फँसकर छटपटा रहे हैं। जिस तीव्रता से इन्टरनेट और कृत्रिम बुद्धि का सामान्य जीवन में दखल बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से इसके नकारात्मक प्रभाव समाज को अपनी चपेट में ले रहे हैं।
भारत में स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की संख्या 70 करोड़ से ज्यादा है, जो विश्व में दूसरे स्थान पर है, जहाँ 85% से ज़्यादा घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है। युवाओं (15-29 आयु वर्ग) में इसकी पहुँच लगभग सार्वभौमिक है। 2026 तक यह संख्या बढ़कर 1 अरब तक पहुँचने का अनुमान है। भारत में इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2024 में लगभग 88.6 करोड़ तक पहुँच गयी थी। 2025 में 90 करोड़ पार करने का अनुमान है। स्वाभाविक रूप से यह एक बड़ी जनसँख्या है, जो किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी सक्रिय है। जिसका उपयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों में किया जा सकता है और किया भी जा रहा है।
भारत में ही शिक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यवसाय, नागरिक प्रशासन की दक्षता में विकास से लेकर समाज में अश्लीलता और अनुशासनहीनता फैलाने, धरना-प्रदर्शन करने, दंगे भड़काने, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों और विचारों को भड़काने तक इन्टरनेट, एआई और सोशल मीडिया का सकारात्मक और नकारात्मक उपयोग देखा जा रहा है। यह एक दुधारी तलवार है, जो अब घातक होती जा रही है।
इण्टरनेट मीडिया और ओटीटी प्लेटफार्म पर अभद्रता, फेक न्यूज, हेट स्पीच, अश्लीलता, राष्ट्र विरोधी कन्टेट स्ट्रीमिंग की बाढ़ सी आ गयी है। ओटीटी पर ऐसे-ऐसे कन्टेट परोसे जा रहे हैं जो भारत की सनातन संस्कृति की छवि को आघात पहुँचाने के साथ में इनसे जुड़े महानुभावों की छवि भी बिगाड़ रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व नेत्रहीन सन्त रामभद्राचार्य जी के विरुद्ध आपत्तिजनक कन्टेट प्रसारित किया जा रहे था जिसे हाईकोर्ट के आदेश के बाद हटाया गया। राजनैतिक दल और उनके अनुयायी एक दूसरे की छवि खराब करने के लिये भी एआई जेनरेटड वीडियो बड़ी संख्या में प्रसारित करवा रहे है। विगत दिनों हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भी एआई जनरेटेड आपत्तिजनक वीडियो पोस्ट की गयी थी। दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र के निधन सम्बन्धी एआई जनरेटेड वीडियो बनायी गयी।
कृषि कानूनों के विरोध में हुए किसान आन्दोलन के दौरान सोशल मीडिया का दुरुपयोग करके जनमानस को भड़काने का प्रयास किया गया। शाहीन बाग के धरने और दिल्ली दंगों में सोशल मीडिया ने प्रमुख भूमिका निभायी। आई लव मोहम्मद के प्रदर्शनों के पीछे भी सोशल मीडिया रहा। इस पूरी प्रक्रिया में डीपफेक आदि का भरपूर उपयोग होता है। सोशल मीडिया-ऐसे कंटेट से भरा पड़ा है जो धर्मान्तरण और लव जिहाद के लिये प्रयोग किया जा रहा है। जिसके पास स्मार्ट फोन है वो अपना यू-ट्यूब चैनल चला सकता है और कुछ भी बकवास कर सकता है।
ओटीटी पर महिलाओं और बच्चों का उपयोग करके अत्यन्त असंवेदनशील सामग्री परोसी जा रही है। कुछ दिन पूर्व ही सुप्रीम कोर्ट ने कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को कड़ी फटकार लगाकर अपत्तिजनक सामग्री को इंटरनेट से हटाने का आदेश दिया था। अपराधी प्रवृत्ति के लोग जमकर इन्टरनेट, एआई और सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं। अपराधी सोशल मीडिया व अन्य साइट से वीडियो चोरी करते हैं और एआई की मदद से उसमें मिक्सिंग कर अपराध में सहायक वीडिओ विकसित कर लेते हैं। इन्हें रोकने में पुलिस विभाग की तकनीक भी नाकाम हो रही है। यदि यह तकनीक सही दिशा में नहीं की गयी तो, मानवता का विनाश सुनिश्चित है।
एआई के दुरुपयोग से न्यायपालिका भी परेशान –
पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने अपने कार्यकाल के दौरान एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि जज भी एआई जनरेटेड तस्वीरों के शिकार हो रहे हैं। अब समय आ गया हे कि एआई को नियंत्रित करने की पहल हो। उन्होंने कहा कि आज समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग किसी न किसी रूप से एआई के दुरुपयोग से परेशानी अनुभव कर रहा है। उनका था कि एआई को नियंत्रित करना एक नीतिगत मामला है इस पर कार्यपालिका को कार्य करने की आवश्यकता है।
इंटरनेट मीडिया के लिए स्वतंत्र नियामक अपरिहार्य : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकान्त की खंडपीठ ने एक मामले कि सुनवाई करते हुए कहा कि आनलाइन प्लेटफार्म पर अश्लील, आपत्तिजनक या अवैध सामग्री को नियंत्रित करने के लिए एक तटस्थ, स्वतंत्र और स्वायत्त नियामक की आवश्यकता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अदालत को बताया कि दिव्यांग व्यक्तियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों और उनका मजाक उड़ाने वाले जैसे मामलो से निपटने के लिए कुछ दिशा निर्देश तैयार किए जा रहे हैं। अदालत ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से कहा कि वह दिशा निर्देशो को चर्चा के लिए सार्वजनिक करे।
ऑनलाइन स्पेस में दिव्यांगों की गरिमा की रक्षा के लिए एक कड़े कानून की आवश्यकता पर बल देते हुए अदालत ने कहा कि वह दिव्यांगो और दुर्लभ आनुवांशिक विकारो से ग्रस्त व्यक्तियों का मजाक उड़ाने वाली टिप्पणियों को दंडनीय अपराध बनाएं जैसा कि एससी-एसटी अधिनियम के तहत किया गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि एससी-एसटी अधिनियम में जातिसूचक टिप्प्णयों को अपराध माना गया है और सजा का प्रावधान है।