भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक चेतनत्त्व के पटल पर भगवान वामन का स्वरूप केवल दशावतार रूपी परम्परा में एक धार्मिक दृष्टि तक ग्रहण करना उनके व्यक्तित्व की व्यापकता एवं विराटता को सीमित कर देना प्रतीत होता है। वामन अनुकृति के अन्तर्गत भारतीय मनीषियों ने स्व मेधा से सत्ता, सामर्थ्य, विनम्रता, आत्मसंयम एवं लोककल्याण के ऐसे गहनतं जीवन-मूल्यों को कार्यान्वित किया है, जिनकी प्रासंगिकता वर्तमान राष्ट्र और समाज के सन्दर्भ में उतनी ही महत्ता बनाये हुए हैं, जितनी पुराकाल में। इस प्रासंगितकता में अत्यन्त विचारणीय तथ्य यह है कि जो सत्ता मूलतः विराटत्व लिये है, वहीं आवश्यकता पड़ने पर स्वयं को अत्यन्त लघु रूप में अभिव्यक्त करती है। यही व्यतिक्रम विराट् का लघु होना एवं लघु का विराट् में परिणत हो जाना, वामनावतार का दार्शनिक रहस्य है।
‘त्रिविक्रम’ स्वरूप
भारतीय ज्ञान परम्परा में विष्णु के ‘त्रिविक्रम’ स्वरूप एवं उनके तीन पगों का उल्लेख मिलता है, कालान्तर में यही प्राचीन दृष्टान्त वामन-अवतार की व्यापक धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक अवधारणा में विकसित हुआ है। भगवान वामन का मूलभूत सामाजिक सन्देश सामर्थ्य और प्रदर्शन के बीच का विभेद है। साम्प्रतिक समाज में शक्ति का मूल्य प्रायः उसके प्रदर्शन से निर्धारित किया जाता है। व्यक्ति, संस्था एवं राष्ट्र अपने सामर्थ्य को जितना अधिक प्रदर्शित करता है, उतना ही उसे प्रभावशाली माना जाता है। इसके विपरीत वामन का व्यक्तित्व यह दर्शाता है कि वास्तविक शक्ति को निरन्तर प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं होती है। जब कोई भी विराट् सत्ता वामन रूप धारण करती है, तब वह सन्देश देती है कि विनय शक्ति का निषेध नहीं, अपितु शक्ति का संस्कार है। इनका यह लघुस्वरूप दुर्बलता का प्रतीक नहीं, वरन नियन्ित्रत, संयमित एवं उद्देश्यपूर्ण शक्ति का द्योतक है। प्राचीन साहित्य में वामन का वर्णन दण्ड, छत्र, कमण्डलु, जटा और ब्रह्मतेज से सम्पन्न तपस्वी रूप में हुआ है। “ब्रह्माण्डच्छत्रदण्डः शतधृतिभवनाम्भोरुहो नालदण्डः….. दशकुमारचरितम्ा्। भारतीय चिन्तन परम्परा में आकार एवं महत्त्व को कभी पूर्णतः समभाव से नहीं देखा गया है। वस्तुतः बीज आकार की दृष्टि से छोटा होता है, परन्तु उसके भीतर विशाल वृक्ष की सम्भावना विद्यमान रहती है, तथैव वामन का छोटा शरीर इस ओर ध्यान इंगित करता है कि किसी व्यक्ति एवं राष्ट्र का वास्तविक मूल्य उसके बाह्य विस्तार से नहीं, अपितु उसमें अन्तर्निहित सामर्थ्य, चरित्र तथा उद्देश्य से निर्धारित होता है। अतः वामनावतार आधुनिक समाज के उस मनोविज्ञान के लिये एक सशक्त प्रत्युत्तर हैं, जिसमें बाह्य वैभव को आन्तरिक मूल्य से अधिक महत्ता दी जाती है।
आत्मसंयम और मर्यादा
भगवान वामन के स्वरूप का दूसरा महत्त्वपूर्ण आयाम आत्मसंयम और मर्यादा है। शक्ति, पराक्रम यदि मर्यादित न रहे तो वह संरक्षण की जगह पर प्रभुत्व का साधन बन सकती है। भारतीय सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक चिन्तन में धर्म का एक प्रमुख अभिप्राय इसी शक्ति को मर्यादित करना रहा है। वामनावतार की अवधारणा में सामर्थ्य स्वयं को धर्मानुकूल मर्यादा में नियोजित करना रहा है। यही शाश्वत सिद्धान्त आज के राष्ट्र एवं उसके प्रत्येक नागरिक के जीवन के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल आर्थिक उत्पादन, सैन्य प्राकर्म तथा तकनीकी प्रगति से निर्धारित नहीं की जानी चाहिये, अपितु उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा इस बात में निहित होनी चाहिये कि वह राष्ट्र अपनी शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिये कर रहा है। क्योंकि शक्ति का नैतिकीकरण ही राष्ट्र को सभ्यता का वैभव प्रदान कर सकता है।
व्यापकता से वामनावतार का सांस्कृतिक, सामाजिक व्यक्तित्व व्यक्ति एवं राष्ट्र को विनयशील आचरण, मर्यादित शक्ति तथा सामर्थ्य, उत्तरदायी नेतृत्व एवं लोककल्याण की दिशा प्रदान करता है। उनका यह लघुरूप दर्शाता है कि आकार नहीं, आचरण महत्त्वपूर्ण होता है। उनकी विराट् सत्ता यह दिखती है कि वास्तविक सामर्थ्य देश, काल, परिस्थिति में पूर्णता प्रकट करती है। इसीलिये भगवान विष्णु का वह वामन स्वरूप केवल अतीत की धार्मिक स्मृति नहीं, अपितु वर्तमान एवं भविष्य के लिये एक जीवित सांस्कृतिक, सामाजिक प्रतिमान हैं। उस स्वरूप की प्रेरणा यही है कि विराटता की आकांक्षा रखने वाला प्राणी पहले अपने अन्तःकरण में विनय का वामन उत्पन्न करे। जब शक्ति में विनय, ज्ञान में उत्तरदायित्व और सामर्थ्य में लोककल्याण की भावना निहित हो, तभी व्यक्ति एवं राष्ट्र सुसंस्कृत बनते हैं। यही इस स्वरूप की मूल प्रेरणा है। l
(लेखक बीबीएयू, लखनऊ के शोध छात्र हैं)