पण्डित दीनदयाल उपाध्याय भारत के एक महान विचारक, दार्शनिक और राजनेता थे, जिन्होंने दुनिया को एकात्म मानववाद का एक बेहद अनूठा और गहरा सिद्धांत दिया। उनके इस दर्शन में व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ईश्वर को अलग-अलग टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक ही श्रृंखला के अभिन्न हिस्से के रूप में देखा गया है। उनके इसी चिंतन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय आता है, जिसे उन्होंने चिति का नाम दिया है। अगर हम बिल्कुल सामान्य भाषा में समझें, तो दीनदयाल जी के पूरे दर्शन और उनके राष्ट्र सम्बन्धी विचारों को गहरायी से समझने के लिये चिति के इस विचार को समझना सबसे ज़रूरी है। यह एक ऐसा विचार है जो किसी भी देश की बुनियाद को स्पष्ट करता है। जिस तरह दुनिया में हर इंसान की अपनी एक अलग पहचान, अपना एक खास स्वभाव और अपनी एक आत्मा होती है, ठीक वैसे ही हर राष्ट्र या देश की भी अपनी एक सामूहिक आत्मा व एक मूल स्वभाव होता है। राष्ट्र की इसी अन्तर्निहित आत्मा को पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी ने चिति कहा है।
इस विचार को और बेहतर ढंग से समझने के लिये यह जानना बहुत आवश्यक है कि दीनदयाल जी राष्ट्र और राज्य को दो बिल्कुल अलग-अलग इकाइयाँ मानते थे। पश्चिमी देशों की राजनीतिक सोच के अनुसार, राष्ट्र का मतलब आमतौर पर ज़मीन का एक निश्चित टुकड़ा और उस पर शासन करने वाली सरकार या कानून से होता है। लेकिन, दीनदयाल जी का स्पष्ट मानना था कि कोई भी राष्ट्र सिर्फ ज़मीन, जंगल, नदी या पहाड़ के भौतिक स्वरूप से नहीं बनता। एक राष्ट्र का सच्चा निर्माण तब होता है, जब वहाँ रहने वाले लोगों का जीवन के प्रति एक समान लक्ष्य हो और उनकी एक साझा संस्कृति हो। इसी साझा संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की जो सबसे गहरी जड़ है, वह चिति है। सत्ताएँ बदल सकती हैं, सरकारें आ और जा सकती हैं, लेकिन राष्ट्र की चिति हमेशा जीवित रहती है।
दीनदयाल उपाध्याय जी के अनुसार, किसी भी राष्ट्र की चिति से ही उस राष्ट्र का धर्म तय होता है। यहाँ यह स्पष्ट करना बहुत आवश्यक है कि उनके दर्शन में धर्म का मतलब पूजा-पाठ के तरीके, कर्मकाण्ड या किसी विशेष सम्प्रदाय जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिख या ईसाई से बिल्कुल नहीं है। यहाँ धर्म का व्यापक अर्थ है कर्तव्य, नैतिक नियम और जीवन जीने का सही तरीका। जो नियम, कानून और व्यवस्थाएँ राष्ट्र की चिति यानी उसकी मूल आत्मा के अनुकूल होते हैं, वही उस राष्ट्र का सच्चा धर्म कहलाते हैं। इसके विपरीत, अगर कोई सरकार या समाज ऐसे कानून बनाता है जो राष्ट्र की चिति के खिलाफ हों, तो वह समाज में कभी भी स्थायी शान्ति, सन्तुष्टि और वास्तविक विकास नहीं ला सकता।
राष्ट्र की चिति
हर व्यक्ति की पसन्द, नापसन्द और सोचने का तरीका अलग होता है; कोई स्वभाव से बहुत शान्त होता है, तो कोई बहुत ऊर्जावान। इसी प्रकार, विश्व के हर देश की अपनी एक अलग और विशिष्ट प्रकृति होती है। यह प्रकृति कोई एक दिन में नहीं बनती, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों के हजारों सालों के इतिहास, उनके जीवन के अनुभवों, उनके सामूहिक सुख-दुख, उनकी गहरी मान्यताओं और उनके जीवन मूल्यों से मिलकर धीरे-धीरे आकार लेती है। राष्ट्र के जन्म से लेकर निरन्तर निर्माण तक, जो एक स्थायी भाव समाज के भीतर हमेशा जीवित रहता है, वहीं असल में उस राष्ट्र की चिति है।
अगर कोई व्यक्ति अपने मूल स्वभाव के खिलाफ जाकर कोई काम करने की कोशिश करता है, तो वह भीतर से कभी खुश या शान्त नहीं रह सकता। ठीक इसी तरह, अगर कोई देश अपनी चिति को भूलकर, उसे दबाकर या उसे कमतर आँककर दूसरे देशों की अन्धी नकल करने लगता है, तो उसका पतन निश्चित है। दीनदयाल जी का दृढ़ विश्वास था कि आधुनिक भारत की बहुत सी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का मुख्य कारण यही है कि हमने अपनी चिति को भुलाकर पश्चिमी देशों के विकास मॉडल को ज्यों का त्यों अपने ऊपर थोपने की कोशिश की। जो कपड़े किसी और के नाप के सिले गये हैं, वे हमारे शरीर पर कैसे पूरी तरह फिट हो सकते हैं? हमें अपने विकास के रास्ते, अपनी नीतियाँ और अपनी शिक्षा व्यवस्था अपनी चिति के अनुसार खुद तय करनी होगी।
अगर हम इस बात पर गहरायी से विचार करें कि भारत की आत्मा या भारत की चिति आखिर क्या है, तो हमें भारतीय संस्कृति के मूल दर्शन की ओर देखना होगा। भारत की चिति में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना रची-बसी है, जिसका अर्थ है कि हम पूरी दुनिया को ही अपना एक बड़ा परिवार मानते हैं। सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये नहीं, बल्कि दूसरों के लिये त्याग और सेवा का भाव रखना हमारी चिति का हिस्सा है। अनेकता में एकता देखना, हर प्रकार की विविधता का सम्मान करना और सबको साथ लेकर चलना भारतीय स्वभाव है। इसके अलावा, प्रकृति से असीम प्रेम करना और पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों में भी ईश्वर का वास देखना हमारी चिति का अहम अंग है। अगर भारत दुनिया की देखा-देखी सिर्फ पैसे, स्वार्थ और अत्यधिक भौतिकवाद को अपना अन्तिम लक्ष्य मान ले, तो यह सीधे तौर पर भारत की चिति के खिलाफ जाना होगा।
दीनदयाल जी ने अपने दर्शन में चिति के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसे उन्होंने विराट कहा है। अगर चिति राष्ट्र की आत्मा है, तो विराट उस राष्ट्र की वह प्राण-शक्ति या ऊर्जा है, जो उस आत्मा को जगाती है और राष्ट्र की हर संकट से रक्षा करती है। जिस तरह एक मानव शरीर में आत्मा होने के बावजूद प्राण या ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसी तरह किसी भी राष्ट्र के पास महान चिति या श्रेष्ठ संस्कृति होने के साथ-साथ विराट यानी सामूहिक शक्ति और ऊर्जा का होना भी बेहद ज़रूरी है, ताकि वह राष्ट्र दुनिया में सुरक्षित, स्वतंत्र और मजबूत बना रहे। l