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‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका के जल-विशेषांक में परंपरा, नीति और जमीनी प्रयोगों का संगम

डॉ. लोकेन्द्र सिंह

भारतीय विचार परंपरा में प्रकृति और मनुष्य के संबंध को कभी एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा गया। हमारे पुरखों ने जल को केवल उपभोग्य वस्तु या प्राकृतिक संसाधन नहीं माना, बल्कि उसे जीवन, लोकमंगल और देवत्व के रूप में प्रतिष्ठा दी। आज जब गिरते भूजल स्तर, सूखती नदियों और अनियंत्रित दोहन के कारण जल-संकट पूरी मानवता के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है, तब लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ का ‘जल है तो कल है’ विशेषांक, प्रत्येक संवेदनशील पाठक के लिए एक अनिवार्य और संग्रहणीय दस्तावेज है।

श्रद्धेय के. एस. सुदर्शन जी की स्मृति को समर्पित नवंबर-2026 का यह विशेषांक केवल समस्याओं का रोना नहीं रोता, बल्कि समाधान की सनातन और व्यावहारिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध जल योद्धा उमाशंकर पाण्डेय के कुशल अतिथि सम्पादन में तैयार यह अंक नीति, शास्त्र, इतिहास और आधुनिक जमीनी प्रयोगों का अद्भुत संगम है।

सम्पादकीय टिप्पणी में उमाशंकर पाण्डेय जी ने स्मरण कराया है कि मनुष्य का अस्तित्व गर्भाशय के जल से लेकर अंत्येष्टि के गंगाजल तक जल की दो बूँदों के मध्य सिमटा हुआ है। वे लिखते हैं – “चिता की राख जब पानी में मिले, उससे पहले जीवन जीते जी पानी का कर्ज चुकाना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है”। यह विशेषांक इसी कर्ज को चुकाने का एक सशक्त आह्वान है।

इस अंक में सच्चिदानन्द मिश्र अपने आलेख ‘जल देवता-पूजन परम्पराओं का अध्ययन’ में मीमांसा दर्शन का उल्लेख करते हुए स्पष्ट करते हैं कि देवता वह है, जिसके प्रति मनुष्य का कर्तव्य और त्याग का भाव हो। जल को पूजने का अर्थ ही यह है कि उसका मनमाना शोषण नहीं किया जा सकता। वहीं सुप्रसिद्ध साहित्यकार इन्दुशेखर तत्पुरुष ‘संस्कृत साहित्य में जल-जीवन सौंदर्य’ के अंतर्गत वेदों से लेकर महाकवि कालिदास और भर्तृहरि तक के जल-विमर्श को सामने लाते हैं। वे रहीम खानखाना के ‘गंगाष्टकम्’ का सुंदर उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं कि नदियों के प्रति आदर इस देश की साझी और सर्वसमावेशी चेतना का अभिन्न अंग रहा है।

‘छत्रपति शिवाजी महाराज से सीखें जल-प्रबंधन’, आलेख में छत्रपति शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था के जल प्रबंधन की भी चर्चा है। सह्याद्रि के गिरिदुर्गों से लेकर सिंधुदुर्ग जैसे जलदुर्गों की जल संरचनाओं की चर्चा आलेख में है। शिवाजी महाराज दुर्ग निर्माण से पहले वहाँ जल स्रोतों, कुओं, बावड़ियों और वर्षाजल संचयन (टैंकों) की व्यवस्था सुनिश्चित करते थे; उनका स्पष्ट मत था कि जल के प्राकृतिक भंडार पर ही राज्य की सुरक्षा और स्वावलंबन टिका है। भारत का रक्षा और शासन कौशल प्रकृति के तालमेल के बिना अधूरा था, और शिवाजी महाराज का जल-दर्शन आज के आधुनिक नगर-नियोजकों एवं नीति-निर्माताओं के लिए भी उतना ही प्रासंगिक व अनुकरणीय है।

यह विशेषांक केवल अतीत की गौरवगाथा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समकालीन संकटों पर तथ्यात्मक और खरी बात करता है। रामाशीष अपने आलेख ‘अविरल और निर्मल गंगा’ में गंगा बेसिन के विस्तार और उस पर मँडराते खतरों का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। वे 1916 के महामना मदन मोहन मालवीय के ऐतिहासिक ‘गंगा-रक्षा समझौते’ की याद दिलाते हुए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह और अनुपचारित सीवेज के शून्य निर्वहन पर बल देते हैं। इसी क्रम में श्याम सुन्दर पाठक उत्तर प्रदेश की नदियों की व्यथा को उजागर करते हुए बताते हैं कि कैसे अनियोजित विकास ने हिंडन, गोमती, काली और कुकरैल जैसी जीवनदायिनी धाराओं को गंदे नालों में तब्दील कर दिया है। विश्वनाथ खेमका और अनुराग पाण्डेय गोमती बेसिन के 26 प्रमुख वेटलैंड्स को प्राकृतिक जल-बैंक के रूप में पुनर्जीवित करने का ठोस वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं।

राष्ट्रधर्म के विशेषांक की सर्वाधिक प्रासंगिक और पठनीय विशेषता है – सरकारी नीतियों का निष्पक्ष एवं संतुलित मूल्यांकन। डॉ. अंकुश त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेश में सिंचाई क्षमता के विस्तार, नलकूपों के जीर्णोद्धार और बुंदेलखंड की जल योजनाओं का ब्योरा देते हुए यह रेखांकित किया है कि विकास केवल नए प्रोजेक्ट खड़े करने में नहीं, पुरानी जल संरचनाओं को जीवित रखने में भी है। वहीं डॉ. अनूप चतुर्वेदी अपने समीक्षात्मक आलेख ‘केवल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं’ में जल जीवन मिशन, अमृत 2.0, और नमामि गंगे जैसी बड़ी योजनाओं की जमीनी हकीकत का मूल्यांकन करते हैं। वे आंकड़ों के साथ आगाह करते हैं कि यदि नलों तक पानी पहुँचाने के साथ-साथ गिरते भूजल को रिचार्ज नहीं किया गया और लीकेज नहीं रोके गए, तो योजना का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

इस अंक का सबसे ओजस्वी और आशा जगाने वाला हिस्सा वे जमीनी अनुभव हैं, जिन्हें वास्तविक जल योद्धाओं ने स्वयं अपनी लेखनी से प्रस्तुत किया है। पद्मश्री लक्ष्मण सिंह लापोडिया ने राजस्थान के लापोडिया गाँव में ग्रामीणों के साथ मिलकर ‘फूलसागर’, ‘देवसागर’ और ‘अन्नसागर’ जैसे तालाबों के निर्माण और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का प्रेरक संस्मरण साझा किया है। पद्मश्री महेश शर्मा झाबुआ के भील समाज की सामूहिक परंपरा ‘हलमा’ का समाज-वैज्ञानिक मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जहाँ कंटूर ट्रेंच को ‘शिव-जटाएँ’ मानकर वनांचल की बूँद-बूँद को सहेजा गया। पद्मश्री डॉ. पोपटराव पवार ने महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव की 35 वर्षों की साधना बताई है कि कैसे सख्त सामाजिक अनुशासन, चराई बंदी, बोरवेल नियंत्रण और ‘जल बजट’ के दम पर एक अकाल-पीड़ित गाँव देश का सबसे समृद्ध और आत्मनिर्भर गाँव बन गया। इसके साथ ही एम. पी. सिन्हा द्वारा बिहार की प्राचीन ‘आहर-पईन’ प्रणाली और जलसखियों के योगदान की चर्चा पारंपरिक ज्ञान के वैज्ञानिक पक्ष को उजागर करती है। ‘राष्ट्रधर्म’ का यह जल-विशेषांक केवल आलमारी में सजाकर रखने वाली पत्रिका नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों और आम नागरिकों के लिए हाथ में लेकर काम करने वाली मार्गदर्शिका है। यदि देश की भावी पीढ़ी को अपनी जल-संस्कृति को सहेजते हुए कल को सुरक्षित करना है, तो यह अंक न केवल पढ़ा जाना चाहिए अपितु इस पर सामाजिक विमर्श भी होना चाहिए।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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