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गोवत्स द्वादशी : परम्परा, करुणा और गोसेवा का पर्व

भारतीय संस्कृति में पर्व एवं उत्सव जीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को वंशानुक्रम से प्रवाहित करने के सशक्त माध्यम रहे हैं। इन पर्वो का महत्त्व धार्मिक अनुष्ठानों के साथ उन जीवन के आदर्शों में भी निहित है, जिन्हें वे समाज के समक्ष प्रतिष्ठित करते हैं। गोवत्स द्वादशी ऐसा ही पर्व है, जो गौमाता के प्रति श्रद्धा, बछड़े के प्रति वात्सल्य, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समस्त जीवजगत के प्रति करुणा का सन्देश देता है। इस पर्व में गौ और वत्स की संयुक्त पूजा भारतीय जीवन-दृष्टि के उस स्वरूप को अभिव्यक्त करती है, जिसमें मातृत्व का सम्मान, सन्तति का संरक्षण और जीवों के प्रति उत्तरदायित्व परस्पर सम्बद्ध हैं। गोवत्स द्वादशी को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और लोकपरम्पराओं के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह पर्व वसुबारस के नाम से प्रसिद्ध है। परम्परानुसार इस अवसर पर गौ और बछड़े का पूजन, तिलक, पुष्पार्पण तथा उनकी सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। अनेक परिवारों में इस दिन व्रत रखने की परम्परा भी प्रचलित है। क्षेत्रीय विधियों में भिन्नता होने पर भी इस पर्व की मूल भावना गौवंश के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण में निहित है। गौ को भारतीय समाज में पोषण, समृद्धि और मातृत्व का प्रतीक माना गया है, जबकि वत्स जीवन की निरन्तरता तथा सहज वात्सल्य का प्रतिनिधित्व करता है। अतः गोवत्स द्वादशी का सांस्कृतिक अर्थ गौपूजन के साथ-साथ उसके बछड़े के स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षित जीवन की चिन्ता से भी जुड़ता है। वेदों का उद्घोष है-

प्रजावतीः सूयवसं रिशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः।
मा वः स्तेन ईशत माघशंसः परि वो हेती रुद्रस्य वृज्याः ॥
(ऋग्वेद, ६.२८.७)

मन्त्र का भाव यह है कि गौएँ सन्तानयुक्त रहें, उत्तम चारा प्राप्त करें, स्वच्छ जल पिएँ और चोर अथवा अनिष्टकारी व्यक्तियों से उनकी रक्षा हो। भविष्य पुराण के उत्तरपर्व में वर्णित एक आख्यान के अनुसार पार्थ से भगवान श्रीकृष्ण कहते सुमहत्पुण्यजननं गोवत्सद्वादशीव्रतम्। अस्ति पार्थ महाबाहो पाण्डवानां धुरन्धर। कथा क्रम में गौ को पार्वती का स्वरूप माना गया है- उमापि चक्रे गोरूपं। सागर मंथन में लोकमाता के नाम से ख्यात पञ्चगौ उत्पन्न हुईं और उन कामधेनु रूपी गायों को जमदग्नि आदि 5 ऋषियों को देवताओं ने प्रेमपूर्वक प्रदान किया-

नन्दा, सुभद्रा, सुरभी, सुशीला, बहुला इति।
एता लोकोपकाराय देवानां तर्पणाय च ॥

समुद्र मंथन के उपरान्त ऋषियों के परीक्षा लेने के उद्देश्य से गाय रूपी उमा देवी को ऋषि रूपी शिव भृगु आदि ऋषियों के पास जाकर गाय और उसके वत्स (बछड़े) की रक्षा करने को कहा और स्वयं अन्तर्निहित होकर व्याघ्र का रूप धारण करके गाय और उसके बछड़े के समीप आये। गाय और उसके वत्स को भयभीत देखकर ऋषिगणों ने क्रुद्ध होकर सुरगण द्वारा प्रदत्त भीषण स्वप्न करने वाले देवदत्त नामक घण्टे को बजाया उसके ध्वनि से विचलित होकर व्याघ्र रूपी शिव ने गौ और उसके बछड़े को छोड़ कर अपने मूल स्वरूप में परिकर सहित सबको दर्शन दिये। ऋषियों नें उमा-महेश्वर सहित सभी मातृकाओं और गणों का पूजन किया और उस स्थान का नया नामकरण किया ढूंढागिरी। वह दिन कार्त्तिकशुक्ल द्वादशी था तबसे इस पर्व को मनाया जाता है-

प्रणम्य देवेदेवाय पत्नीभिः सहितैरुमा।
गोरूपिणी सवत्सा च पूजिता ब्रह्मचारिभिः ॥

कार्त्तिके शुक्लपक्षे तु द्वादश्यां नन्दिनीव्रतम्।
ततः प्रभूति राजेन्द्र अवतीर्ण महीतले ॥

गोवत्स द्वादशी की परम्परा को गोसेवा के व्यापक आदर्श से जोड़कर देखने पर इसका सामाजिक महत्त्व और अधिक स्पष्ट होता है। गौ की पूजा करते समय उसके बछड़े की उपेक्षा करना अथवा वृद्ध, रोगग्रस्त और परित्यक्त गौवंश की समस्याओं से विमुख रहना गोसेवा के आदर्श को अधूरा बना देता है। वर्तमान समय में गोवंश-संरक्षण की आवश्यकता अनेक कारणों से महत्त्वपूर्ण है। गोवत्स द्वादशी का वैज्ञानिक पक्ष समझने के लिए गौ और वत्स के जैविक सम्बन्ध पर ध्यान देना आवश्यक है। स्तनधारी प्राणियों में माता का दूध नवजात शिशु के पोषण का महत्त्वपूर्ण माध्यम होता है। जन्म के बाद बछड़े को प्राप्त होने वाला प्रथम दूध, जिसे खीस या कोलोस्ट्रम कहा जाता है, प्रतिरक्षात्मक घटकों से समृद्ध होता है और उसके आरम्भिक स्वास्थ्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिये बछड़े को जन्म के बाद उचित समय पर खीस उपलब्ध कराना पशुपालन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। अन्ततः गोवत्स द्वादशी मातृत्व, वात्सल्य, करुणा और संरक्षण की भारतीय सांस्कृतिक चेतना का महत्त्वपूर्ण पर्व है। ऋग्वैदिक मन्त्र में गौ के लिये उत्तम चारे, स्वच्छ जल और सुरक्षा की कामना इस बात का प्रमाण है कि गोकल्याण की भावना का व्यावहारिक पक्ष भी प्राचीन वाङ्गय में महत्त्व रखता है। आज आवश्यकता है कि इस परम्परा को गोवंश की समुचित देखभाल, पशुचिकित्सा, ग्रामीण आजीविका के सहयोग और पर्यावरण-सम्मत संसाधन-प्रबन्धन से जोड़ा जाये। जब गौ-पूजन के साथ गौ और वत्स के कल्याण का वास्तविक प्रयास जुड़ता है, तब गोवत्स द्वादशी अपनी सांस्कृतिक गरिमा के साथ समकालीन समाज के लिये भी सार्थक प्रेरणा बन् जाती है।

(लेखक बीबीएयू लखनऊ में संस्कृत एवं वैदिक अध्ययन विभाग में शोध छात्र हैं)

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