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संघ को समझना है तो शाखा आइए

संघ को समझना है तो शाखा आइए

राजीव तुली विभिन्न कारणों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चर्चा में रखना मित्रों तथा अमित्रों दोनों के लिए लाभप्रद रहता है। अमित्र लिखा है, शत्रु नहीं, क्योंकि संघ किसी को भी अपना शत्रु नहीं मानता है। समाज दो भागों में है—एक जो आज स्वयंसेवक हैं और दूसरे जो भविष्य में संघ से जुड़ेंगे, ऐसी संघ…

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सदैव प्रेरित करने वाले विराट व्यक्तित्व

सदैव प्रेरित करने वाले विराट व्यक्तित्व

नरेन्द्र मोदी अशोक सिंहल जी ने हर थण इस महान राष्ट्र के उत्कर्ष का ही स्वप्न देखा था। हम उनके सपनों को साकार करने के संकल्प को फिर दोहराएं एक बहुत सुंदर सुभाषित है, ‘वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न *संचै नौर। परमारध के कारने, साधुन धरा शरीर।’ इसका मतलब है कि पेड़ कभी…

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हैदराबाद की आजादी के लिए लड़ने वाला स्वयंसेवक, जिनसे CM ने मांगी थी सुरक्षा

हैदराबाद की आजादी के लिए लड़ने वाला स्वयंसेवक, जिनसे CM ने मांगी थी सुरक्षा

माधव राव ने कुछ स्वयंसेवकों को मुस्लिम पहचान देकर विभाजित पंजाब के शहरों में मुस्लिम लीग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में तैनात कर दिया. ये लोग बताते थे कि कैसे पूरी तैयारी के साथ मुस्लिम लीग के लोग हिंदू बाहुल्य इलाकों की रिपोर्ट तैयार करते हैं, और फिर हमला करते थे. RSS के 100 सालों…

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पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन में चिति का विचार

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन में चिति का विचार

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय भारत के एक महान विचारक, दार्शनिक और राजनेता थे, जिन्होंने दुनिया को एकात्म मानववाद का एक बेहद अनूठा और गहरा सिद्धांत दिया। उनके इस दर्शन में व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ईश्वर को अलग-अलग टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक ही श्रृंखला के अभिन्न हिस्से के रूप में देखा गया है। उनके इसी चिंतन…

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‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

मनमोहन वैद्य जी “वैष्णव जन तो तेणे रे कहिये, जे पीड़ पराई जाणे रे”। दूसरों की पीड़ा की अनुभूति कर उन्हें उस पीड़ा से मुक्त करने के सहज कर्म को ‘धर्म’ कहा गया है। राजा रंतिदेव का प्रसिद्ध वचन है – “मुझे न राज्य की कामना है, न स्वर्ग की और न ही मोक्ष की।…

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वामनावतार : शक्ति का संस्कार

वामनावतार : शक्ति का संस्कार

भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक चेतनत्त्व के पटल पर भगवान वामन का स्वरूप केवल दशावतार रूपी परम्परा में एक धार्मिक दृष्टि तक ग्रहण करना उनके व्यक्तित्व की व्यापकता एवं विराटता को सीमित कर देना प्रतीत होता है। वामन अनुकृति के अन्तर्गत भारतीय मनीषियों ने स्व मेधा से सत्ता, सामर्थ्य, विनम्रता, आत्मसंयम एवं लोककल्याण के ऐसे गहनतं जीवन-मूल्यों…

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धर्म का द्वितीय लक्षण : क्षमा

धर्म का द्वितीय लक्षण : क्षमा

डॉ. बिपिन कुमार पाण्डेयशिक्षक, ज्योतिर्विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ शक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति विजय में नहीं, क्षमा में होती है; क्योंकि विजय केवल शत्रु को परास्त करती है, जबकि क्षमा शत्रुता का ही अंत कर देती है। जहाँ प्रतिशोध सभ्यता का अवसान करता है, वहीं क्षमा संस्कृति का उदय करती है। मनुष्य की वास्तविक विजय…

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11 सितम्बर 1893: जब शिकागो में गूंजा भारत का सनातन संदेश

11 सितम्बर 1893: जब शिकागो में गूंजा भारत का सनातन संदेश

शिकागो भाषण, 11 सितम्बर 1893   (Sankar, The Monk As the unknown life of Swami Vivekananda, Penguin Books)  ‘भारतवर्ष की विभूतियाँ’ नामक पुस्तक में शिकागों भाषण और स्वामी विवेकानन्द के विषय में लिखा है, “सन 1893 में आप शिकागो सर्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के हेतु प्रतिनिधि होकर अमेरिका गये। अमेरिका और इंग्लैण्ड में करीब…

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विनोबा भावे का राष्ट्र चिन्तन

विनोबा भावे का राष्ट्र चिन्तन

आचार्य विनोबा भावे भारतीय नवजागरण उन प्रमुख चिन्तकों में से हैं, जिनके विचारों में आध्यात्मिकता, नैतिकता, सामाजिक न्याय और राष्ट्र-निर्माण का अद्भुत समन्वय दिखायी देता है। उनका राष्ट्र चिन्तन संकीर्ण राजनीतिक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर एक ऐसे मानवतावादी और समग्र राष्ट्र की कल्पना प्रस्तुत करता है, जो मनुष्य की बाह्य स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी आन्तरिक…

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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : महान दार्शनिक, शिक्षक और राष्ट्रनायक की प्रेरक जीवनगाथा

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : महान दार्शनिक, शिक्षक और राष्ट्रनायक की प्रेरक जीवनगाथा

घोड़े अलग-अलग रूप-रंग के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं। अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं। ये जवाब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक अंग्रेज को दिया था। दरअसल, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक बार भारतीय दर्शन पर व्याख्यान देने इंग्लैंड गए थे, तब वहां बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आए…

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