एक साधारण स्वयंसेवक की भावानुभूति : सरसंघचालक से हुई भेंट पर निःसृत भाव-धारा
स्वयंसेवक साधारण नहीं होता। वह विशिष्ट है। उसकी विशिष्टता "कुल" अथवा "विराट" के अंश होने में है। उसकी विशिष्टता "बूँद" बनकर "समाज-सिंधु" में स्वयं को विसर्जित कर देने में है।



