एक साधारण स्वयंसेवक की भावानुभूति : सरसंघचालक से हुई भेंट पर निःसृत भाव-धारा

एक साधारण #स्वयंसेवक की भावानुभूति (परम् पूजनीय #सरसंघचालक से हुई भेंट पर निःसृत भाव-धारा)

यद्यपि स्वयंसेवक साधारण नहीं होता। वह विशिष्ट है। उसकी विशिष्टता “कुल” अथवा “विराट” के अंश होने में है। उसकी विशिष्टता “बूँद” बनकर “समाज-सिंधु” में स्वयं को विसर्जित कर देने में है। साधारणत्व का यह बोध भी विसर्जन व समर्पण के भाव को परिपुष्ट करता है। बिना विसर्जन के सृजन नहीं, समर्पण नहीं। जहाँ समर्पण व ध्येयनिष्ठा नहीं, वहाँ संगठन का भाव भी नहीं। इसलिए साधारणत्व का सतत बोध ही स्वयंसेवक के लिए वरेण्य व अभीष्ट है।

कल का दिन मेरे लिए बड़ा शुभ व सुखद रहा। कल परम् पूजनीय सरसंघचालक जी से पुनः मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पिछले वर्ष 26 एवं 27 जुलाई को उनसे भेंट अवश्य हुई थी। परंतु कल की बात कुछ विशेष थी। ईश्वर की कृपा से उनसे प्रत्यक्ष भेंट का सौभाग्य उदित हुआ। यह संघ की कार्यपद्धति में ही संभव है कि एकदम धरातल पर सक्रिय स्वयंसेवक भी शीर्ष से मिल सकता है। मुझे तीन सरसंघचालक – परम् पूजनीय रज्जू भैया, परम् पूजनीय सुदर्शन जी और परम् पूजनीय मोहन भागवत जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त रहा है। आप सबके मार्गदर्शन व आशीर्वाद से अनेकानेक जिज्ञासाओं का समाधान भी मिला। एक साधारण स्वयंसेवक के जीवन में ऐसे अवसर व सौभाग्य का उदित होना, संघ की रीति-नीति-पद्धति की अनूठी विशेषता ही कही जाएगी।

कल भेंट के लिए समय मिलने के तुरंत बाद से ही मन में यह द्वंद्व चल रहा था कि अपने प्राणप्रिय भारतवर्ष में किसी आत्मीय अथवा श्रद्घेय से खाली हाथ मिलने जाने की परंपरा नहीं रही है, परंतु पुनः ध्यान आया कि संघ में कुछ उपहार आदि ले जाने को सामान्यतः हतोत्साहित किया जाता है। हाँ, किसी स्थान विशेष अथवा नगर की कोई प्रसिद्ध मिठाई आदि ले जाने पर उसे स्वयंसेवकों में ही बाँट देने की परिपाटी अवश्य रही है। सोचा साफा ले चलता हूँ, वह राजस्थान की परंपरा व संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। परंतु तुरंत ध्यान आया कि सार्वजनिक समारोह होता तो साफा चल जाता, पर यहाँ अवसर ऐसा था कि उसके लिए भी मानस नहीं बना सका। अंत में एक विचार विद्युत की भाँति मन-मस्तिष्क में कौंधा कि क्यों न अपने चुनिंदा लेखों की प्रति ले चलूँ! अब तक मेरे प्रकाशित लेखों की संख्या सैकड़ों में हो चुकी है, इसलिए उनमें से कुछ लेख चुनने भी कठिन थे। लेखक के लिए यह और कठिन इसलिए भी हो जाता है कि सृजन की जिस “प्रसव-पीड़ा” या “मातृत्व-सुख” से गुजरते हुए वह सृजन करता है, वह बिलकुल लोकेतर अनुभूति-प्रक्रिया होती है। उनमें से प्रिय-अप्रिय का चयन कठिन ही नहीं, असंभव होता है। तय किया कि वे लेख ले चलता हूँ, जो ध्येयनिष्ठा या भारतबोध को गहरा करते हैं।

चूँकि कल स्वातंत्र्यवीर सावरकर की जयंती थी तो मन में यह विचार भी आया कि क्यों न वे पत्रिकाएँ ले चलूँ, जिन्होंने अपने किसी अंक में उन पर आवरण-कथा प्रकाशित की हो। स्वाभाविक रूप से *#पाञ्चजन्य* व *#राष्ट्रधर्म* की प्रतियाँ दिखीं। संयोग कहें या योजनाबद्धता पाञ्चजन्य ने 11 मई को प्रकाशित अंक में #स्वातंत्र्यवीर_सावरकर पर आवरण-कथा प्रकाशित की है। राष्ट्रधर्म की भी वह प्रति मिली, जिसमें स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर आवरण-कथा थी। अपने लेखों के साथ इन दोनों पत्रिकाओं की प्रति भी परम् पूजनीय सरसंघचालक जी को भेंट की। उन्होंने मेरे सामने ही मेरे लेखों के शीर्षक पढ़े। उन्हें सरसरी तौर पर देखा। दोनों पत्रिकाओं के सभी पृष्ठ पलटे। उनमें प्रकाशित लेखों को देखा और लगभग 8-10 मिनट देखने के बाद उन्हें अपने सहायक को सहेजकर रखने और साथ ले चलने का निर्देश दिया। अचानक कौंधे इस विचार से मुझे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का ध्यान हो आया। इन दिनों सामान्य समाज में महँगे उपहारों की लेन-देन का चलन बढ़ गया है। यदि इसके स्थान पर अच्छे लेखों, अच्छे विचारों, अच्छी पुस्तकों को साझा करने का चलन बढ़े तो समाज व विशेष रूप से भावी पीढ़ी को बड़ा लाभ होगा। कल की भेंट में प.पू सरसंघचालक जी से संघ के शताब्दी-वर्ष पर कतिपय विषयों पर पुस्तक लिखने का भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। ईश्वर की कृपा रही और संयोग बना तो निश्चय ही उस दिशा में भी कुछ सार्थक प्रयास करने की प्रेरणा जगी है।

मैंने बारंबार दुहराया है कि मेरे जीवन में जो भी शुभ है, सुंदर है, सार्थक है, उनमें से अधिकतम संघ की ही देन है। संघ से जुड़ने से पूर्व मैं एक दिशाहीन युवा था, अनुशासन रहित, निरर्थक, निरुद्देश्य जीवन जिए चला जा रहा था। ठीक है कि जीवन का ध्येय केवल जीवन है और जीवन ही होना चाहिए। पर निष्क्रिय, अकर्मण्य, आत्म-केंद्रित जीवन भी कोई जीवन होता है! केवल खाओ, पियो और मौज करो का तात्कालिक लक्ष्य लेकर चलना तो जीवन की ऊँचाई, जीवन की उपादेयता, जीवन के विस्तार व वैविध्य को बहुत कम करके आँकना होगा। जड़ता व एकरसता तो ऊब पैदा करती है। खाओ, पियो और मौज करो में आनंद ढूँढ़ने वाला व्यक्ति अंततः ऊब व दुहराव का शिकार बनता है और उस दुष्चक्र से चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाता। पल-पल परिवर्तित जीवन में वह न बदलने वाले तत्त्व तक पहुँच ही नहीं पाता।

प्रश्न यह भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या केवल अकेले सुखी रहा जा सकता है? इसका उत्तर कदाचित न में आए! सुखी जीवन के लिए भी एक समाज चाहिए, उस समाज के साथ अपना नाभिनाल, आत्मिक एवं रागात्मक संबंध चाहिए। उसी समाज के प्रति आत्मिक जुड़ाव व अखंड निष्ठा रखते हुए माँ भारती की सेवा में जीवन होम करने वाले सेवाव्रती साधकों-तपस्वियों का दूसरा नाम ‘#प्रचारक‘ है। उन्हें हम श्वेत वस्त्रधारी संत भी कह सकते हैं। उनका त्याग व समर्पण उसी स्तर का है। प्रचार व प्रसिद्धि, निंदा व स्तुति से दूर वे राष्ट्र-यज्ञ में अहर्निश जुटे रहते हैं। सभी प्रचारकों का जीवन प्रेरणा का जीवंत स्रोत होता है। संघ की कार्यप्रणाली ऐसी है कि व्यक्तित्व का शोधन-परिमार्जन-परिष्करण वहाँ सतत चलता रहता है। घिस-घिसकर ही साधारण प्रस्तर शालिग्राम बनता है। प्रचारक-जीवन में प्रवेश करने व रह जाने के पश्चात प्रस्तर से शालिग्राम बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। अनुशासन की छेनी-हथौड़ी और ध्येय की उत्कट निष्ठा कोई अनगढ़-नुकीला “कोना” नहीं रहने देती। व्यक्ति-निर्माण की सतत प्रक्रिया व चरित्र का उत्तरोत्तर विकास संघ की कार्यप्रणाली का सहज क्रम है और प्रचारक उसकी केंद्रीय धुरी हैं। “स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः” – की प्रत्यक्ष व जीवंत अनुभूति प्रचारकों के जीवन को देखकर होती है। आज के भौतिकवादी दौर में भी वे इसके सजीव-जीवंत दृष्टांत हैं।

संघ से जुड़ने के बाद ही समाज और राष्ट्र के प्रति मेरे भीतर भी संवेदना जगी, जो शनैः-शनैः प्रगाढ़ होती चली गई। और उस समाज से गहरे तादात्म्य के कारण ही मुझे आसेतु हिमाचल कहीं भी जाने पर पराएपन की अनुभूति नहीं होती। जितना मैं बूँद बनकर स्वयं को समाज-सिंधु में विलीन करता जाता हूँ, उतनी ही विराटता व प्रसन्नता की अनुभूति गहरी होती जाती है। पर इस अनुभूति के लिए “बिंदु का सिंधु”, “लघु का विराट” और “खंड का कुल” में विसर्जन आवश्यक है।

मैंने हर बार कहा और अध्ययन व अनुभव से भी यही पाया कि व्यक्ति नहीं, विचार ही महत्त्वपूर्ण व स्थाई होते हैं। पर विचार अमूर्त्त होते हैं, जो अमूर्त्त है, वह मूर्त्त के माध्यम से ही अभिव्यक्त होता है, अतः व्यक्तियों का भी अपना महत्त्व है। उनके प्रति भी शुद्ध-सात्विक श्रद्धा अंततः ध्येय से ही जोड़ती है। इसलिए संघ में अपरिचित को परिचित, परिचित को मित्र व मित्र को कार्यकर्त्ता बनाने के महत्त्वपूर्ण सोपान तय किए गए हैं। हृदय के तल पर जुड़े बिना गहरी मित्रता-आत्मीयता भला कैसे संभव होगी! इसलिए भाव व श्रद्धा निरर्थक नहीं, निष्प्रयोज्य नही, उनका भी अपना महत्त्व व प्रयोजन है। श्रद्धा सनातन की शक्ति है, आधारशिला है। ठोस वैचारिक अधिष्ठान भी श्रद्धा की नींव पर खड़े किए जा सकते हैं, खड़े किए गए हैं, खड़े किए जा रहे हैं। वर्तमान में श्रद्धा-केंद्रों को ध्वस्त करने का जो यत्र-तत्र-सर्वत्र अभियान चल पड़ा है, वह अंततः समाज के लिए घातक व त्रासद ही सिद्ध होगा। उन्हें बनाए रखने में आपका, हमारा, परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण है। विश्वास न हो तो वर्तमान पीढ़ी या संततियों को देख लें, उनके उलझन-भटकन का प्रमुख कारण श्रद्धा से विचलन है, विकर्षण है। अलग-अलग नाम पर उन्हें उकसाया गया, भरमाया गया, परिवार के श्रद्धा-केंद्रों – यहाँ तक कि माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों से दूर करने के प्रयत्न-षड्यंत्र किए गए, परिणामतः न उनमें आस्था बची, न आस्तिकता, न अनुभवजनित सत्य के बल जीवन की चुनौतियों से पार पाने का विश्वास, न बड़ों के अनुभव से सीखने की ललक और न ही बात मानने की रुचि, प्रवृत्ति, प्रकृति। यहाँ यह भी स्मरण रहे कि श्रद्धा केवल दूसरों की ही दिशा-दशा नहीं सुधारती, वह स्वयं को भी सभी द्वंद्वों-प्रश्नों से मुक्त करती है। द्वंद्व से घिरा मन अस्थिर-आकुल-विचलित रहता है। एक बिंदु-पड़ाव पर पहुँचकर उसे ठौर चाहिए, भटकाव नहीं। पथ व ध्येय चाहिए, विपथगामी वृत्ति व मृग-मरीचिका नहीं।

यों ही नहीं हमारी पूजा-परंपरा में भगवान के विग्रह स्वरूप का विशेष महत्त्व है। उस विग्रह-स्वरूप को देखकर, जीवन और स्वयं को कृतकृत्य समझने वाले हृदय की थाह भला कौन-सा विचार अथवा तत्त्व-चिंतन ले सकता है! भाव, भक्ति व श्रद्धा को मापने का भी क्या कोई उपकरण हो सकता है! नहीं न! भाव और श्रद्धा पर अधिष्ठित समाज के मन व मर्म को समझे जाने की आवश्यकता है। भगवान के विग्रह को हम अपना सर्वोत्तम सौंपकर हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सब उस पर छोड़ देते हैं। बिलकुल निर्द्वंद्व व मुक्त हो जाते हैं। इस एक विश्वास ने हमें आक्रांताओं से लड़ने की अजेय शक्ति दी। अपने आस्था-केंद्रों, परंपराओं एवं सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के सिद्ध मंत्र व संकल्प दिए। इसलिए यदि संघ या भारत के सनातनी समाज के मर्म को समझना है तो वह श्रद्धा की भाव-भूमि पर ही गहराई व संपूर्णता से समझा जा सकता है। अतः आइए, पहले अपने-अपने हृदय में श्रद्धा के दीप जलाएँ और तदनंतर सामाजिक श्रद्धा-केंद्रों को जागृत-स्थापित करें। हममें से हरेक को यह स्मरण रखना होगा कि उन केंद्रों को नष्ट करने की आँच व लपटें देर-सबेर हमें भी अपने घेरे में लेगी।

प्रणय कुमार, फेसबुक वॉल से साभार

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