प्रेम के उपासक महर्षि रमण

महर्षि रमण एक ऐसी विभूति थे जो बाल्यावस्था में ही प्रभु भक्ति को समर्पित हो गये थे। बालक वेंकट रमण बहुत ही सुन्दर और – स्वस्थ थे किन्तु उनकी सामान्य शिक्षा में उनकी रुचि बहुत कम थी। इस कारण उन्हें विद्यालय भेजने में उनकी माँ को अथक प्रयास करना पड़ता था। महर्षि बहुत सोते थे। इस कारण सभी उन्हें कुम्भकर्ण कहने लगे थे। जब वे 16 वर्ष के थे तब उनके घर तमिलनाडु के अरुणाचल – पर्वत से एक संन्यासी पधारे। बाल्यावस्था में ही वेंकटरमण के मन में अरुणाचल पर्वत के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। उन्होंने निश्चय किया कि वह एक बार अरुणाचल पर्वत पर अवश्य जायेंगे। उन्हीं दिनों उन्होंने शैव संतों की कथाएँ एवं कविताएँ पढ़ीं। इससे उनके मन में अध्यात्म के प्रति प्रेम जाग गया।

अब रमण अधिक से – अधिक समय एकान्त में रहकर चिन्तन, मनन व ध्यान आदि करने लगे। कभी-कभी वे घण्टों समाधि में बैठे रहते। उन्हें हर समय अरुणाचल की याद आती थी। एक दिन माँ ने उन्हें भाई की फीस जमा करने के लिये पाँच रुपये दिये। इसके बाद रमण ने माँ को पत्र लिखा ‘मैं भगवान को खोजने का जा रहा हूँ। आप लोग मेरी खोज न करें।’ पत्र में इतना लिखने के साथ ही उन्होंने शेष दो रुपये – उस पत्र के साथ माँ को वापस कर दिये। इसके बाद उनकी यात्रा बहुत कठिन रही। बहुत दिनों तक वह पैदल चले। मार्ग में दयावश लोग उन्हें भोजन करा देते थे। रात्रि में वह किसी मन्दिर में ही विश्राम करते थे। – अन्ततः अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करते हुए वह – तिरुवन्नमलाई पहुँच गये। सामने ही अरुणाचल पर्वत पर स्थित मन्दिर था। मन्दिर को देखकर रमण अपनी सुध-बुध खो बैठे तथा वहीं पर अपनी साधना प्रारम्भ कर दी। यहीं से वह प्रसिद्ध होने लगे तथा स्थानीय लोगों ने उनका नाम महर्षि रमण रख दिया और फिर यही नाम प्रचलित हो गया। मन्दिर में रहने के कारण उनको काफी व्यवधान रहता था। अतः अपने एक भक्त थम्बी रामास्वामी के आग्रह पर वह उनके बाग में साधना करने चले गये। कुछ समय बाद वह फिर मन्दिर – आ गये। उनके भक्तों ने वहीं एक आश्रम व मन्दिर बनवाया तथा गोशाला, वेद पाठशाला, प्रकाशन विभाग आदि खोले गये। उनका आश्रम सभी के लिये खुला था। उनके आश्रम में पशु-पक्षी भी स्वतंत्रता के साथ विचरते थे। रमण के मन में सबके लिये सम्मान था।

यही कारण था कि उन्हें प्रेम का उपासक कहा गया। संस्कृत के विद्वान गणपति शास्त्री ने उन्हें महर्षि उपाधि से विभूषित किया।

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