बहुत लोग हैं जो प्रश्न करने लगते हैं कि पहले यह तो बताओ कि तुम “हिन्दू” की क्या परिभाषा करते हो। हाँ, यह वास्तव में बड़ा कठिन कार्य है। एक बार एक सज्जन बोले- “मैं मुसलमान अथवा ईसाई की तो परिभाषा कर सकता हूँ, किन्तु हिन्दू की परिभाषा नहीं कर सकता।” उनका ऐसा कहना ठीक ही था। हम सूर्य और चन्द्रमा की परिभाषा कर सकते हैं, किन्तु उस “चरम सत्य” की परिभाषा नहीं कर सकते जिससे इन सभी वस्तुओं का उद्गम हुआ है। इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। केवल इसीलिये कि वह प्रतीकों के स्वरूप में प्रकट नहीं हो पाता और परिभाषा के परे है। इससे क्या उसकी अस्तित्वहीनता सिद्ध हो जाती है? श्री रामकृष्ण ने कहा है कि केवल ईश्वर ही “अनुच्छिष्ट”, शुद्ध एवं अकलुश है, क्योंकि उसका कभी वर्णन नहीं हो पाया। वह कभी जिह्वा द्वारा अपवित्र नहीं किया गया। हम अन्य सब वस्तुओं की परिभाषा कर सकते हैं, किन्तु वह, जो सर्वव्यापक है, जो “सत्य” कहा जाता है, उसकी परिभाषा नहीं कर सकते।
हम हिन्दुओं ने परमात्मा को अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का आधार माना है इसीलिये यह सम्भव है कि हिन्दू-समाज का विकास एक सर्वसमावेशक ढंग से हुआ है. जिसमें अवस्थाओं एवं आकारों की आश्चर्यजनक विविधता है, किन्तु विपुल भावव्यजनाओं एवं अभिव्यक्तियों में एक अन्तर्जात एकता का सूत्र बना रहता है। हिन्दुओं के अन्तर्गत सभी मतों और विविध जातियों की परिभाषा हो सकती है। किन्तु “हिन्दू” पद की परिभाषा नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें उन सभी का समावेश है। निस्सन्देह समय-समय पर इसकी परिभाषा के अनेक प्रयास किये जा चुके हैं, किन्तु ऐसी सभी परिभाषाएँ अपूर्ण सिद्ध हो चुकी हैं। वे पूर्ण सत्य को प्रकट नहीं करती। उन लोगों के सम्बन्ध में यह बात स्वाभाविक भी है, जिनकी वृद्धि तथा विकास गत अनेक शताब्दियों से होता आ रहा है।
हमारे समाज का मूल तथा कब से हम यहाँ सुसभ्य जीवन व्यतीत करते आ रहे हैं, उसकी तिथि से इतिहास के विद्वान अनभिज्ञ हैं। एक प्रकार से हम “अनादि” हैं। ऐसे समाज की व्याख्या करना ठीक उसी प्रकार असम्भव है, जैसे उस परम सत्य की परिभाषा करना, क्योंकि शब्दों का उद्भव तो उसके पश्चात् ही हुआ है। यही बात हिन्दू-समाज के लिये है। हमारा अस्तित्व उस काल से है, जब किसी भी नाम की आवश्यकता ही नहीं थी। हम आर्य प्रबुद्ध लोग थे। हम लोग प्रकृति एवं आत्मा के नियमों के ज्ञाता थे। हमने एक महान सभ्यता, महान संस्कृति तथा एक अनुपम समाज-व्यवस्था का निर्माण किया था। हम ऐसी सभी वस्तुओं का जीवन में समावेश कर चुके थे, जो मानव के लिये हितकर थीं। उस समय शेष मानवता द्विपाद पशु मात्र थी इसीलिये हमें कोई विशिष्ट नाम नहीं दिया गया था। यह ठीक ऐसे ही है, जैसे विभिन्न स्थानों पर गंगा को गंगोत्री, भागीरथी, जाह्नवी तथा हुगली नाम से पुकारा जाता है। यह ‘हिन्दू” नाम जो ‘सिन्धु नदी से लिया गया है, हमारे इतिहास एवं परम्पराओं में हमसे इतने काल से सम्बन्धित है कि अब हमारे लिये सम्पूर्ण विश्व के द्वारा स्वीकृत एवं आदर का नाम बन गया है।
हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा। मानव का विश्वास जगेगा। भेदभावना तमस हटेगा। समरसता अमृत बरसेगा ।।
श्रीगुरुजी के भाषण व लेख संग्रह से…