संत रामानुजाचार्य का जन्म श्रीपेरुंबुडूर, तमिलनाडु में 1074 ईस्वी (वैशाख शुक्ल षष्ठी,1017) में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवाचार्य व माता जी का नाम कान्तिमती था। बचपन से ही संत रामानुजाचार्य की बुद्धि अत्यंत विलक्षण थी। 15 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने सभी शास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया था।
16 वर्ष की आयु में संत रामानुजाचार्य का विवाह रक्षम्बा जी के साथ हुआ। 23 वर्ष की आयु में गृहस्थ आश्रम त्यागकर श्रीरंगम के यदिराज संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली।
संत रामानुजाचार्य और उनके विचार
संत रामानुजाचार्य एक प्रमुख भारतीय धार्मिक विचारक और वैष्णव आचार्य थे। उन्होंने विशिष्टाद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को प्रस्थापित किया और अपने ग्रंथों और उपनिषदों के व्याख्यानों के माध्यम से जनमानस को इस धार्मिक दर्शन के सिद्धांतों से परिचित कराया।
संत रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रमुख प्रतिष्ठाता थे, उनका मानना था कि जीवात्मा और परमात्मा में अंतर नहीं होता, बल्कि वे एक-समान होते हैं। उनका धार्मिक दृष्टिकोण भक्ति और प्रेम पर केंद्रित था, और उन्होंने विष्णु भगवान के प्रति भक्ति को महत्व दिया। उन्होंने वेदांत दर्शन को जन सामान्य तक सरल रूप में समझाने का प्रयास किया।
संत रामानुजाचार्य ने वेदांत के सिद्धांतों को लोकप्रिय बनाने के लिए अनेक ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रमुख रचनाएं श्रीभाष्य, गीता भाष्य, वेदार्थसंग्रह, गद्यत्रय आदि हैं। उनके द्वारा रचित ग्रंथों में भक्ति, सेवा, और समाज सेवा के महत्व को बड़ा बल दिया गया है। उनके विचार और सिद्धांत आज भी लोगों के ह्रदय में बसे हुए हैं और उन्हें एक महान आध्यात्मिक आचार्य के रूप में याद किया जाता है।
संत रामानुजाचार्य और सामाजिक समरसता
संत रामानुजाचार्य वैष्णव मत के प्रसिद्ध संत भक्त माने जाते हैं। संत रामानुजाचार्य ने हिन्दू समाज के पिछड़े वर्ग की पीड़ा और उपेक्षा को ह्रदय से अनुभव किया। उस समय की प्रचलित सामाजिक एवं धार्मिक अनुष्ठान पद्धतियों में यथा संभव सुधार तथा नई अनुष्ठान पद्धतियों की सृष्टि की।
ब्राह्मण से लेकर चांडाल तक सभी जात-वर्गों के लिए सर्वोच्च आध्यात्मिक उपासना के द्वार, लोगों की आलोचना के बावजूद उन्होंने खोल दिए। इस कार्य के लिए उनको स्थान-स्थान पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा, किन्तु न व डरे, न झिझके और न ही रुके।
श्री रामानुजाचार्य, सामाजिक दृष्टि से वर्णव्यवस्था के अन्दर किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार नहीं करते थे। उनके अनेक शिष्य निम्न कही जाने वाली जातियों से थे। भगवान की रथयात्रा के अवसर पर तथाकथित निम्न जातियों वाले ही रथ पहले खींचते थे। वही परम्परा आज भी चली आ रही है। उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया।
उन्होंने शुद्र गुरुओं का शिष्यत्व स्वीकार किया तथा चांडाल के हाथ से भोजन करने में भी श्री संत रामानुजाचार्य ने कभी संकोच नही किया।
श्री संत रामानुजाचार्य वृद्धावस्था में स्नान करने के लिए जाते समय दो ब्राह्मण के कन्धों पर हाथ रखकर जाते थे और जब स्नान कर वापस आते थे तब दो चर्मकारों के कन्धों का सहारा लेकर आते थे। लोगों ने जब इस पर आपत्ति की तो उन्होंने कहा – अरे ! मन की कलुषता को समाप्त करो’ उनका मानना था कि न जाति: कारणं लोके गुणा: कल्याणहेतव: – अर्थात जाति नहीं, वरन गुण ही कल्याण का कारण है।
श्री संत रामानुजाचार्य ने श्री रंगपट्टम के उत्तर में मेलुकोट (दक्षिण बद्रिकाश्रम) नामक स्थान तिरूनारायण पेरूमाल वैष्णव मंदिर के द्वार पंचमों (शूद्रों से भी दूर कहे जाने वाले लोगों)के लिए खोल दिए थे। वे कहते हैं की शूद्र, निराश्रय मानव भी अपनी भक्ति, समर्पण तथा ज्ञान के सहारे ईश्वर को प्राप्त कर लेता है। इस व्यापक भावना ने सामाजिक सद्भाव तथा सहिष्णुता को जन्म दिया और वर्ण, जाति के भेदभाव से दूर आदर्श समाज व्यवस्था निर्माण करने का प्रयास किया।
संत रामानुजाचार्य के अनुसार, समरसता का मतलब है सभी व्यक्तियों के बीच धार्मिक और सामाजिक समानता को प्रोत्साहित करना। उन्होंने समाज में जाति, धर्म, और समुदाय के आधार पर भेदभाव को खत्म करने का प्रयास किया।
संत रामानुजाचार्य का मानना था कि भगवान की अनंत कृपा और प्रेम हर जीव को समरस बनाती है। वह सभी को समानता के साथ देखते थे और हर एक को आत्मिक स्वतंत्रता का अधिकार माना। उन्होंने धार्मिक समृद्धि को प्राप्त करने के लिए जाति और जातिवाद के खिलाफ लड़ा और समाज में समरसता की बात की।
संत रामानुजाचार्य के विचार और समरसता का सिद्धांत मिलकर एक विशेष योगदान देते हैं, जो समाज में विविधता का समर्थन करते हैं और सभी को समानता और सम्मान की भावना से जीने की प्रेरणा देते हैं।
संत रामानुजाचार्य की सामाजिक दृष्टि, धार्मिक उन्नति के साथ-साथ सामाजिक समरसता और समाज के विकास को भी समझने की दिशा में थी। उनकी धर्म के प्रति गहरी आस्था थी, इसीलिए उन्होंने धर्म को सामाजिक जीवन के हर पहलू से जोड़ा। वे समाज में विविधता और समरसता को प्रोत्साहित करते थे।
संत रामानुजाचार्य ने अपने सामाजिक दृष्टिकोण के माध्यम से जातिवाद का विरोध किया। उन्होंने समाज को जाति और वर्ण के विभाजन के विरुद्ध एकता और समरसता के प्रति प्रोत्साहित किया। उनके उपदेशों में सभी मनुष्यों को समान अधिकार और समानता की आकांक्षा दिखी।
उन्होंने समाज को धार्मिक और सामाजिक संबलता के लिए शिक्षा का महत्व बताया और लोगों को शिक्षा की प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने धर्म के माध्यम से समाज में न्याय, धर्म, और समरसता की भावना को बढ़ावा दिया।
संत रामानुजाचार्य के विचार उन्हें समाज के सभी वर्गों के उत्थान और कल्याण के लिए समर्पित बनाती थी। उनका धार्मिक उद्देश्य उनके सामाजिक कार्यों में स्पष्ट रूप से प्रकट होता था।
उन्होंने रामेश्वरम से लेकर बद्रीनाथ तक यात्रा की। आलवार भक्तों के तीर्थस्थानों की यात्रा व उत्तर भारत की यात्रा में काशी, अयोध्या, बद्रीनाथ, कश्मीर, जगन्नाथपुरी, द्वारिका आदि तीर्थस्थलों पर अपने आध्यात्मिक तथा सामाजिक विचारों को लेकर गए।
संत रामानुजाचार्य ने लोकजागरण का आधार भक्ति को ही मान और भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए व्यापक प्रयास किया। ज्ञान और भक्ति की गंगा बहाते हुए हिन्दू संस्कृति का पुनरूत्थान तथा सामाजिक जागरण का महान कार्य किया।
संत रामानुजाचार्य ने दलितों के मंदिर में प्रवेश के लिए अनेक कार्य किए। यह उनके विचारों का ही प्रभाव है कि दलित और पिछड़ी समझी जाने वाली जातियों से कुछ पुजारी बनाए गए। समाज में ऊँच-नीच की भावना कम हुई और समानता को बल मिला।
संत रामानुजाचार्य के समय समाज में जातिवाद बहुत प्रभावशाली रूप में विद्यमान था। उस समय केवल उच्च वर्ग के लोग ही मंत्रों के जाप करने का अधिकार रखते थे। परंतु संत रामानुजाचार्य ने सभी को समान दृष्टि से देखा और समाज में वसुधैव कुटुम्बकम का भाव जागृत किया।
उन्होंने अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों के लिए भक्ति का मार्ग खोल दिया। संत रामानुजाचार्य ने तिरुपति में अन्नक्षेत्र चलाया, जहाँ आज भी लोग बिना जाति भेदभाव के भोजन करते हैं। संत रामानुजाचार्य ने यह स्पष्ट घोषणा की थी कि भगवान के समक्ष सभी एक समान हैं।
स्वामी विवेकानंद जी ने अपने शिकागो के भाषण में संत रामानुजाचार्य का जिक्र किया – उन्होंने कहा था कि संत रामानुजाचार्य ने उच्च और निम्न जाति के लोगों के बीच समानता की भावना जागृत की।
संत रामानुजाचार्य द्वारा रचित ग्रन्थ
मूल ग्रन्थ :ब्रह्मसूत्र पर भाष्य ‘श्रीभाष्य’ एवं ‘वेदार्थ संग्रह’।
गुरु की इच्छानुसार रामानुजाचार्य ने उनसे तीन काम करने का संकल्प लिया था- ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबंधनम की टीका लिखना। अपने शिष्य ‘कुरंत्तालवार’ को लेकर वे श्रीनगर गए तथा वापस श्री रंगम आकर श्रीभाष्य लिखने लगे।
उन्होंने वेदांत दीप, वेदांत सार, वेदार्थ संग्रह, गीता भाष्य, नित्य ग्रन्थ तथा गद्य त्रयम (शरणागति गद्य, श्री रंगम गद्य, श्री बैकुंठ गद्य) की रचना की।
विशिष्टाद्वैत दर्शन: रामनुजाचार्य के दर्शन में सत्ता या परम सत्य के सम्बन्ध में तीन स्तर माने गए हैं- ब्रह्म अर्थात ईश्वर, चित् अर्थात आत्म, तथा अचित अर्थात प्रकृति।
संत रामानुजाचार्य के समय में वेद शास्त्र तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन तथा अध्यापन सभी जाति-वर्णों के लोगों के लिए सुलभ हो गया था।
सामाजिक जागरण का महान कार्य करते हुए संत रामानुजाचार्य 120 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए।
स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2022 में हैदराबाद में ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी’ राष्ट्र को समर्पित की। 216 फीट ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी’ 11 वीं सदी के संत भक्त श्री संत रामानुजाचार्य की स्मृति में स्थापित की गई। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि – श्री संत रामानुजाचार्य ने देश को सामाजिक सुधारों की वास्तविक अवधारणा से परिचित कराया और दलितों व पिछड़ों के लिए काम किया। उन्होंने कहा कि आज श्री संत रामानुजाचार्य जी की विशाल मूर्ति ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी’ के रूप में हमें समानता का संदेश दे रही है। इसी संदेश को लेकर आज देश ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, और सबका प्रयास’ के मंत्र के साथ अपने नए भविष्य की नींव रख रहा है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि आज भारत बिना भेदभाव के सभी के विकास और सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आगे बढ़ रहा है।
वस्तुतः संत रामानुजाचार्य अपने काल के अत्यंत विद्वान, साहसी तथा सामाजिक दृष्टिकोण से उदार धार्मिक पथ प्रदर्शक थे।