जलियाँवाला नर-संहार का सच
जलियाँवाला नर-संहार का सच

जलियाँवाला नर-संहार का सच

अभी तक हमें सभी पुस्तकों में यही बताया जाता है कि 1919 में अमृतसर के जलियाँवाले बाग में रौलट एक्ट के विरुद्ध कांग्रेस की सभा हो रही थी। इससे जनरल डायर ने गुस्से में आकर उस सभा पर गोली चला दी। यह वह अधूरा सच है, जिसे उस समय ब्रिटिश सरकार ने प्रचारित किया था। लेकिन वास्तविकता कुछ और थी। ब्रिटिश सरकार अमृतसर के लोगों को दंडित करना चाहती थी, इसलिए उसने ही कांग्रेस के नाम से मुनादी करायी और लोगों को जलियाँवाले बाग में इकट्ठा करके उन पर बेतहाशा गोलियाँ चला दीं। इस प्रकार यह नर-संहार ब्रिटिश सरकार द्वारा पूर्व-नियोजित था। आगे की पंक्तियों में इसी सत्य का उद्घाटन किया गया है।

1919 में अमृतसर कांग्रेस के सेक्रेटरी थे श्री रूपलाल पुरी और कोषाध्यक्ष थे डा. संतराम अरोड़ा। 1963 में डा. संतराम जी का देहान्त हो गया। उस समय रूपलाल पुरी भी लगभग मृत्यु-शय्या पर ही थे, इसलिए वे संतरामजी के घर जाने में असमर्थ थे। अतः उन्होंने संतराम जी के बेटों- ब्रह्मदेव व कृष्णचन्द्र – को अपने पास ही बुला लिया। उनसे शोक सम्वेदना प्रकट करते हुए वे संतरामजी के बारे में कुछ संस्मरण सुनाने लगे। उन्हीं में से एक संस्मरण था जलियाँवाले बाग के नर-संहार के बारे में जो १३ अप्रैल १६१६ को हुआ था।

रूपलाल पुरी जी ने बताया-
“डा. संतरामजी जलियाँवाले काण्ड के दिन करीब एक बजे मेरे घर आए। मैं उस समय अमृतसर कांग्रेस का मंत्री था और वे कोषाध्यक्ष थे। डा. सैफुद्दीन किचलू (उस समय अमृतसर कांग्रेस के अध्यक्ष) और डा. सत्यपाल जेल में थे। संतराम जी ने कहा कि मेरा एक मरीज सी.आई.डी. में है और मेरे से उसको काफी लगाव है। वह अभी अभी 12 बजे के लगभग मेरे पास आया था और बोला कि ‘आप आज की जलियाँवाले बाग की कांग्रेस मीटिंग में मत जाना, वहाँ गोली चलनी है।’ मैंने उसे कहा कि ‘मैं कांग्रेस का पदाधिकारी हूँ। हमने तो कोई मीटिंग नहीं रखी।’ वह बोला- ‘परन्तु अंग्रेज सरकार की योजना के अन्तर्गत यह रखी गई है, लोगों को भयाक्रान्त करके उनके जोश को खतम करने के लिए। इसीलिए मेरी आप से प्रार्थना है कि आप उसमें न जाएँ।’

“डाक्टर साहब की क्लिनिक क्योंकि कटड़ा दूलो चौक में ही थी, उसी समय वहाँ चौक में एक ढिंढोरची आया और उसने ढिंढोरा पीटा- ‘आज शाम साढ़े चार बजे जलियाँवाले बाग में कांग्रेस की ओर से सभा रखी गई है। सभी वहाँ पहुँचें।’ उस ढिंढोरची को यह ढिंढोरा पीटते हुए देख वह सी.आई.डी. बोला- ‘लीजिए डाक्टर साहब, सुन लीजिए। अब तो आप मेरी बात मानेंगे।’

“डाक्टर साहब अपने बाकी मरीजों को जल्दी-जल्दी निपटा कर मेरे पास पहुँचे थे। हमने सलाह की कि समय बहुत कम है। हम इस सूचना को अब पलट नहीं सकते। इसलिए तय किया कि हम भी जलियाँवाला बाग जाएँ और वहाँ ही यह घोषित करें कि यहाँ गोली चलने वाली है, इसलिए सभी तुरन्त अपने-अपने घरों को लौट जाएँ। यह मीटिंग हमने नहीं रखी।

“हम दोनों वहाँ पहुँचे। मंच पहले से ही वहाँ लगा हुआ था। हम मंच पर चढ़ गए। मैं आखिर कांग्रेस का संक्रेटरी था, इसलिए बोलने के लिए खड़ा हुआ। मैंने कहा- ‘भाइयो और बहनो…..।’ इतने में ही ऊपर आकाश में हवाई जहाज आया। उसने एक के बाद एक कर के तीन चक्कर लगाए। उसे देख कर लोग कौतूहल वश-‘हवाई जहाज, हवाई जहाज’ कहकर शोर मचाने लगे। काफी देर तक यह शोर होता रहा। उस शोर में ही मेरी आवाज दब कर रह गई। मैं अपनी बात कह भी नहीं पाया कि उधर डायर ने गोली चलवा दी। गोलियों की दनादन से लोग इधर-उधर भागे। भीड़ बहुत थी। वहाँ एक कुआँ था। कई लोग कुएँ में गिर गए। बाहर निकलने का रास्ता एक ही था, उस रास्ते पर डायर के फौजी खड़े हो कर गोलियाँ चला रहे थे। एक गोली मेरी टाँग पर लगी। एक गोली मेरे बेटे को भी लगी। डाक्टर साहब के आगे एक अन्य व्यक्ति खड़ा था, उसे गोली लगी। इस कारण डाक्टर साहब बच गए, उन्हें गोली नहीं लगी। “वहाँ से किसी तरह निकल कर हम घर पहुँचे। डाक्टर साहब भी हमारे साथ ही आए। उन्होंने ही मेरी और मेरे लड़के की गोली निकाली। इसके बाद भी कई दिन तक वे हमारा इलाज करते रहे, किन्तु उसका उन्होंने हम से कोई पैसा नहीं लिया।”

यह घोर आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस ने इस सत्य को कभी प्रकट नहीं किया कि जलियाँवाला नरसंहार ब्रिटिश सरकार द्वारा पूर्व-नियोजित था। सरकार ने यह नर-संहार करने का दायित्व जनरल डायर को सौंपा था और उसने उस दायित्व को बखूबी पूरा किया।

इसके लिए सरकार ने उसकी प्रशंसा भी की। किन्तु कांग्रेस इसका सारा दोषारोपण जनरल डायर पर ही करके अंग्रेज सरकार को साफ बचा कर ले गई। नरसंहार के कुछ महीने बाद कांग्रेस ने उसकी जाँच के लिए जाँच कमेटी बनाई थी। उसने जाँच भी की और अमृतसर के सैंकड़ों लोगों के बयान लिपिबद्ध किए। अतः रूपलाल पुरी व डा. संतराम ने उन्हें इस सत्य से अवगत न कराया हो, यह सम्भव नहीं। दिसम्बर 1916 में कांग्रेस अधिवेशन भी अमृतसर में ही हुआ था। अंग्रेज सरकार उसे नहीं होने देना चाहती थी।

किन्तु इन्हीं दोनों के वज्र-निश्चय के कारण ही वह अधिवेशन अमृतसर में हो पाया था। फिर भी कांग्रेस के किसी दस्तावेज में इन दोनों का नाम तक नहीं है। पट्टाभि सीतारामैया द्वारा लिखित ‘कांग्रेस का इतिहास’ में अमृतसर की तब की विकट परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन है, किन्तु उन विपरीत परिस्थितियों में भी अमृतसर कांग्रेस की नौका को संभाल कर रखने वाले इन दो नर-पुंगवों के नाम वहाँ भी गायब हैं। शायद इसीलिए कि इन नामों के साथ वह सत्य भी सामने आ जाता, जिसे कांग्रेस प्रकट नहीं करना चाहती थी। इसमें कांग्रेस का क्या स्वार्थ था, यह भी शोध का विषय है।

विभाजनकालीन भारत के साक्षी – विभाजन से पूर्व और प्रमाणित दस्तावेज
कृष्णानन्द सागर
खण्ड 1

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