जब केशवराव पहुँचे क्रांति की भूमि कलकत्ता
प्रसन्नचित्त से केशवराव कलकत्ता पहुँचे। कलकत्ता उनकी दृष्टि में केवल महानगरी नहीं थी। वह आत्मबलिदान की वेदी थी। वहाँ के युवक मातृभूमि को विदेशी शासन से मुक्त करना चाहते थे। उन्होंने बंगभूमि की धूलि अपने माथे पर लगाई। क्योंकि इस भूमि पर चैतन्य महाप्रभु घूमे, झूमे, नाचे थे। वहाँ का हर बालक और युवक महिषासुरमर्दिनी काली माता का उपासक था।
केशवराव की भोजन, निवास आदि की व्यवस्था उत्तम हो गई। इसके दो कारण थे। एक तो वे ऐसे मामले में उदासीन रहते थे। दूसरा यह कि उनका व्यवहार इतना आत्मीय व मिलनसार था कि वे हर किसी का हृदय शीघ्र जीत लेते थे। नी. स. मोहरीर, नारायणराव सावरकर, अण्णासाहेब खापर्डे, शंकरराव नाईक आदि युवकों ने केशवराव को अपना भाई समझकर, सब सुविधायें प्रदान कीं।
अल्प समय में केशवराव बंगला बोलना सीख गये। नलिनी किशोर गुह, अमूल्यरत्न घोष, प्रतुलचंद गांगुली, श्यामसुंदर चक्रवर्ती, विपिनचंद्र पाल आदि गणमान्य बंगाली सज्जनों के घर वे जाने-आने लगे। वे उनके घर के सदस्य बन गये। पंजाबी वसतिगृह में जाते-जाते उन्होंने वहाँ के युवकों से मित्रता की।
बाढ़ पीड़ितों की सेवा में रामकृष्ण आश्रम द्वारा चलायी गयी योजनाओं में उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। सुभाषचंद्र बोस की स्वदेशी प्रदर्शनियों में वे स्वयंसेवक बनकर दर्शकों का मार्गदर्शन करते थे।
केशवराव ने प्रतिज्ञाबद्ध होकर क्रांतिकारी दल में प्रवेश किया। वे अनुशीलन समिति के सदस्य बने।
बाल साहित्य शृंखला
डॉ. हेडगेवार
