मैंने देखा इच्छामरण

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Jul 1, 2026 #अटल जी, #अटल बिहारी वाजपेयी, #आत्मबल, #आध्यात्मिक प्रेरणा, #आध्यात्मिकता, #आरएसएस, #इच्छामरण, #एमएस गोलवलकर, #गुरु शिष्य परंपरा, #गुरुजी, #चरित्र निर्माण, #जीवन दर्शन, #जीवन मूल्य, #नेतृत्व, #पूजनीय श्री गुरुजी, #प्रेरक कथा, #प्रेरक प्रसंग, #प्रेरणादायक प्रसंग, #प्रेरणादायी संस्मरण, #भारत, #भारतीय चिंतन, #भारतीय परंपरा, #भारतीय संस्कृति, #महान व्यक्तित्व, #माधव सदाशिव गोलवलकर, #मैंने देखा इच्छामरण, #राष्ट्र निर्माण, #राष्ट्रभक्ति, #राष्ट्रीय चेतना, #राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, #व्यक्तित्व निर्माण, #श्री गुरुजी, #श्रीगुरुजी समग्र, #श्रीगुरुजी समग्र खंड 12, #संगठन जीवन, #संघ, #संघ इतिहास, #संघ कार्य, #संघ विचार, #संघ साहित्य, #सनातन संस्कृति, #समर्पण, #सेवा, #स्वयंसेवक, #हास्य प्रसंग, #हिंदू समाज
मैंने देखा इच्छामरणमैंने देखा इच्छामरण

सबेरे का समय, चाय-पान का वक्‍त, पूजनीय श्री गुरुजी के कमरे में (उसे कोठरी कहना ही अधिक उपयुक्त होगा) जब हम लोग प्रविष्ट हुए तब वे कुर्सी पर बैठे थे। चरण स्पर्श के लिए हाथ बढाए। सदैव की भाँति पॉव पीछे खींच लिए। मेरे साथ आए स्वयंसेवकों का परिचय हुआ। उनमें आदिलाबाद के एक डॉक्टर थे। श्री गुरुजी विनोदवार्ता सुनाने लगे कि एक मरीज एक डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने पृछा- “क्या कष्ट है? सारी कहानी सुनाओ 7 मरीज बिगड गया। बोला“अगर मुझे ही अपना रोग वताना है तो फिर आप निदान क्या करेंगे? बिना बताए जो बीमारी समझे, मुझे ऐसा डॉक्टर चाहिए।’

डॉक्टर एक क्षण चुप रहे। फिर बोले “ठहरो, तुम्हारे लिए दूसरा डॉक्टर बुलाता हूँ” जो डॉक्टर आया वह जानवरों का डॉक्टर था। बिना कुछ कहे सब कुछ समझ लेता था।

कथा सुनकर हँसी का फव्वारा फूट पडा। रात्रि भर के जागरण की थकान, पल भर में दूर हो गई। श्री गुरुजी स्वयं हँसी में शामिल हो गए।

फिर एक किस्सा सुनाया, हँसतै-हँसते पेट में बल पड गए। इतने में चाय आ गई। चाय सबको मिली या नहीं इसकी चिंता श्रीगुरुजी स्वयं कर रहे थे। कीन चाय नहीं पीता, किसको दूध की आवश्यकता है, इसका उन्हें बडा ध्यान रहता। सबके वाद स्वय चाय ली। कप में नाम मात्र की चाय थी। उन्होंने उसे और कम कराया। शायद हमारा साथ देने के लिए ही वे चायपान कर रहे थे। निगलने मे बडा कष्ट था। साँस लेने में अत्यधिक पीडा थी।

किन्तु चेहरे पर थी वही मुक्त मोहिनी मुस्कान। हृदय-हृदय को हरने वाला हास्य। मुरझाए मन की कली-कली को खिलाने वाली खिलखिलाहट। निराशा, हताशा ओर दुराशा को दूर भगाने वाला दुर्दम्य आत्मविश्वास ।

कमरे के किसी कोने में मीत खडी थी। शरीर छूट रहा धा। एक-एक कर सभी बंधन टूट रहे थे। महामुक्ति का मंगल मुहूर्त निकट था। एक क्षण के लिए मुझे लगा, शूलों की शय्या पर भीष्म पितामह मृत्यु की बांट जोह रहे हैं। इच्छामरण सुना भर था, आज आँखों से देख लिया।

श्री अटलबिहारी वाजपेयी, राजनेता
श्रीगुरुजी समग्र खण्ड 12

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