जन्माष्टमी पर मुस्लिम आक्रमण की योजना 1946 का ऐतिहासिक संस्मरण
1946 में जन्माष्टमी पर कथित आक्रमण की योजना और स्वयंसेवकों की भूमिका का ऐतिहासिक संस्मरण।

जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना: 1946 का ऐतिहासिक संस्मरण

जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना: 1946 का ऐतिहासिक संस्मरण

1946 का वर्ष भारत के इतिहास में सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक उथल-पुथल का काल माना जाता है। विभाजन से पहले अनेक क्षेत्रों में हिंसा और अविश्वास का वातावरण था। प्रस्तुत विवरण एक ऐतिहासिक संस्मरण के रूप में उस समय की घटनाओं और परिस्थितियों का वर्णन करता है। इसमें जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना तथा उसके संबंध में स्वयंसेवकों द्वारा की गई तैयारियों का उल्लेख मिलता है।


कुछ स्वयंसेवक विधर्मी बन गए: एक गुप्त योजना

संस्मरण के अनुसार, 1946 में विधर्मी लीग की गतिविधियाँ तेजी से बढ़ रही थीं। उस समय संभावित योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से कुछ स्वयंसेवकों ने स्वयं को विधर्मी के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सुन्नत कराई, कलमा सीखा और धीरे-धीरे स्थानीय विधर्मी समाज में घुल-मिल गए।

बताया जाता है कि इनमें से कुछ स्वयंसेवक विधर्मी नेशनल गार्ड्स तक में शामिल हो गए, ताकि उन्हें भीतर की सूचनाएँ मिल सकें।


जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना

इन्हीं स्वयंसेवकों के माध्यम से सूचना मिलने का उल्लेख है कि जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना बनाई गई थी। संस्मरण के अनुसार, योजना यह थी कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन काली मस्जिद में एकत्र होकर नमाज़ के बाद विभिन्न हिन्दू मोहल्लों पर हमला किया जाए।

वर्णन में यह भी कहा गया है कि जन्माष्टमी का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि अधिकांश हिन्दू उस दिन व्रत रखते हैं और कथित रूप से उन्हें कमजोर समझकर हमला करना आसान माना गया। संस्मरण के अनुसार, हमलावरों द्वारा पिस्टल, राइफल और अग्नि-गोलों के उपयोग की भी योजना थी।


प्रतिरोध की तैयारी कैसे हुई

इस सूचना को गंभीर मानते हुए स्वयंसेवकों ने प्रतिरोध की तैयारी प्रारम्भ की। संस्मरण के अनुसार, बल्ब बम बनाने के लिए बड़ी संख्या में बल्ब एकत्र करने का कार्य कुछ बाल स्वयंसेवकों को सौंपा गया।

वे विभिन्न हिन्दू घरों से चुपचाप बल्ब उतारकर लाते थे। एक बार भूलवश वे एक विधर्मी परिवार के घर में पहुँच गए, जहाँ उन्हें पकड़ लिया गया।

चूँकि वे बच्चे थे, इसलिए डाँट-फटकार और कुछ थप्पड़ लगाने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया।


टैटू हटाने की घटना

दोनों बाल स्वयंसेवक तुरंत संघ कार्यालय पहुँचे और पूरी घटना सुनाई। वहाँ माधवानन्द जी ने उनके हाथों पर बने धार्मिक चिह्न देखे।

एक स्वयंसेवक की कलाई पर हनुमान जी का टैटू था, जबकि दूसरे के हाथ पर ‘ॐ’ अंकित था। संस्मरण के अनुसार, संभावित पहचान और सुरक्षा के खतरे को देखते हुए उन टैटू को तत्काल हटाया गया।

उस समय यह प्रक्रिया अत्यंत पीड़ादायक थी, लेकिन बाद में स्वयंसेवकों को उसकी आवश्यकता समझ में आई।


जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना के विरुद्ध रणनीति

संस्मरण के अनुसार, जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना की सूचना मिलने के बाद विस्तृत रणनीति बनाई गई।

काली मस्जिद के आसपास स्थित हिन्दू घरों में पहले से स्वयंसेवकों और अन्य लोगों को तैनात किया गया। विशेष रूप से मस्जिद से लगी नक्कारची गली सहित आसपास के क्षेत्रों में निगरानी और प्रतिरोध की तैयारी की गई, ताकि किसी भी संभावित हमले का सामना किया जा सके।


1946 का समय भारत के इतिहास का अत्यंत संवेदनशील दौर था। प्रस्तुत विवरण एक ऐतिहासिक संस्मरण है, जिसमें उस समय की परिस्थितियों, स्वयंसेवकों की भूमिका तथा जन्माष्टमी पर विधर्मी आक्रमण की योजना से जुड़ी घटनाओं का वर्णन मिलता है।

ऐसे संस्मरण उस काल की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं, हालांकि इनके विभिन्न पक्षों का अध्ययन अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के साथ भी किया जाना चाहिए।

अनिल गुप्ता
ए-125, प्रीत विहार, दिल्ली
साक्षात्कार दि. 11-5-2015

कृष्णानन्द सागर
विभाजनकालीं भारत के साक्षी
विभाजन से पूर्व और पश्चात का प्रामाणिक दस्तावेज

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