संघ में दण्ड का प्रयोग क्यों शुरू हुआ? जानिए इसका इतिहास
संघ में दण्ड का प्रयोग क्यों और कब से शुरू हुआ?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संघ में दण्ड का प्रयोग केवल शारीरिक प्रशिक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मरक्षा और संगठनात्मक चेतना का भी प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, जो वर्ष 1924 की घटनाओं और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे के नेतृत्व से जुड़ी हुई है।
1924 की घटनाएँ और सामाजिक परिस्थितियाँ
दिण्डी-सत्याग्रह के समय हुए तनाव का एक छोटा रूप वर्ष 1924 में भी देखने को मिला। 12 और 13 जुलाई को ईद तथा आषाढ़ी एकादशी एक साथ पड़ने के कारण वातावरण तनावपूर्ण हो गया।
उस समय मुस्लिम समुदाय के कुछ आक्रमणकारी तत्व पुनः सक्रिय होने लगे। हालांकि इस बार हिन्दू समाज पहले से अधिक सजग था, जिसके कारण स्थिति पहले जैसी नहीं रही। उस समय हुई झड़पों में लगभग 30–35 मुसलमान घायल होकर अस्पताल पहुँचे।
डॉ. हेडगेवार और डॉ. मुंजे की सतर्क रणनीति
तनावपूर्ण परिस्थितियों को देखते हुए डॉ. मुंजे और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने पहले से ही सावधानी बरती। उन्होंने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू परिवारों को सुरक्षित स्थान राजवाड़े में पहुँचाने की व्यवस्था की।
इसके बाद कई दिनों तक हिन्दू मोहल्लों में रात्रि के समय पहरा दिया गया। साथ ही मुस्लिम व्यापारियों के बहिष्कार का अभियान भी पुनः प्रारंभ हुआ।
बहिष्कार आन्दोलन और सामाजिक प्रतिक्रिया
उस समय समाज के एक वर्ग का अनुभव था कि एकतरफा सद्भावना के बावजूद अपेक्षित सौहार्दपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं मिल रही थी। इसी कारण बहिष्कार आन्दोलन को समर्थन मिलने लगा।
उसी समय जब मुस्लिम खटिकों के स्थान पर हिन्दू खटिक उपलब्ध नहीं हुए, तब डॉ. मुंजे ने स्वयं यह कार्य करने की घोषणा की। इससे उस आन्दोलन की गंभीरता और उसके प्रति उनके समर्पण का अनुमान लगाया जा सकता है।
संघ में दण्ड का प्रयोग और आत्मरक्षा का विचार
इन्हीं परिस्थितियों में संघ में दण्ड का प्रयोग और सदण्डता (लाठी लेकर चलने) के विचार का व्यापक प्रचार होने लगा।
डॉ. मुंजे युवाओं से कहा करते थे—
“यदि एकाध लाठीवाला गुण्डा अपने दरवाजे पर आया तो उससे अपनी स्त्री की रक्षा करने का सामर्थ्य तरुणों में होना ही चाहिए। लाठी चलाने की शिक्षा लेकर ‘शठं प्रति शाठ्यं च लाठ्यं च’ का प्रयोग ब्याज सहित पूरा करने की दक्षता आनी चाहिए।”
यह विचार आत्मरक्षा और सजगता पर आधारित प्रशिक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता था।
डॉ. हेडगेवार की संगठन निर्माण की तैयारी
डॉ. हेडगेवार स्वयं विभिन्न क्षेत्रों में जाकर रात्रि गश्त और पहरे की व्यवस्था का निरीक्षण करते थे। इस दौरान वे पहरा देने वाले युवाओं से परिचय स्थापित करते और उनकी कार्यक्षमता का आकलन भी करते थे।
स्पष्ट है कि वे भविष्य में एक अनुशासित और संगठित युवा शक्ति तैयार करने की दिशा में कार्य कर रहे थे। यही प्रयास आगे चलकर संघ की शाखाओं में दण्ड, अनुशासन और शारीरिक प्रशिक्षण की परंपरा के रूप में विकसित हुआ।
स्रोत
डॉ. हेडगेवार चरित
लेखक: ना. ह. पालकर

