मेरे पिताजी श्री सुगन्धचन्द कावड़िया बदनावर में बस अड्डे के पास होटल चलाते थे। वे पहलवान थे। वे तथा उनके एक मित्र साण्डू पहलवान दोनों मिलकर बदनावर में तीन-चार अखाड़े चलाते थे। अखाड़ों में कुश्ती के साथ-साथ मलखम्ब, तलवार, गतका आदि का भी अभ्यास किया जाता था। पिताजी अपने होटल से ही पहलवानों को खूब दूध आदि पिलाते थे। वे थे तो वैश्य जैन, लेकिन लोग उन्हें ‘पंडित जी’ कहकर ही बुलाते थे। अखाड़ों में पूर्वजों का स्मरण कराने वाले वीर रस के गीत भी खूब होते थे। अखाड़ों में तो शस्त्रादि थे ही, हमारे घर में भी तलवारें थीं।
बदनावर की आबादी लगभग तीन हजार थी। हिन्दू बहुसंख्या में थे। मुसलमान कम थे। गाँव की मुख्य सड़क के बीच में उनकी एक मस्जिद थी।
शिव की सवारी
शिवरात्रि को वहाँ शिव की सवारी निकलती थी। जिस में शिव की झांकी होती थी। सबसे आगे ढोल आदि होते थे। उनके पीछे गाँव के प्रमुख लोग चलते थे। इनमें मेरे पिताजी व साण्डू पहलवान आदि होते थे। उनके पीछे गाँव के अलग-अलग अखाड़ों के युवा अपनी अपनी कलाओं का प्रदर्शन करते हुए चलते थे। यह प्रदर्शन चौराहों पर विशेष रूप से होता था और रास्ते भर ‘हर हर महादेव’ के गगन-भेदी नारे लगते थे। मस्जिद के सामने भी प्रदर्शन होता था, लेकिन मुसलमानों ने कभी उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
पहाड़ी की मस्जिद जमींदोज
गाँव के बाहर थोड़ी ही दूर एक ऊँची पहाड़ी थी। उस पर भी एक मस्जिद थी, लेकिन वहाँ जाता कोई नहीं था। वह खाली थी और गाँव से दिखती थी। पिताजी को वह बहुत खटकती थी। अतः एक दिन उन्होंने ५-५ लोगों की कुछ टीमें बनाईं। हर टीम को कुछ-कुछ काम सौंप दिया। रात को १२ बजे वे सब उस टीकरी पर पहुँच गए। मस्जिद को पूरी तरह जमींदोज कर दिया। उसके मलबे को भी कूट-कूट कर बारीक कर दिया और उसे पूरी पहाड़ी पर फैला दिया। मस्जिद का कहीं नामो-निशान भी नहीं रहा। सुबह पाँच बजे तक यह सब काम पूरा हो गया। इसके बाद पिताजी ने सबको कहा कि चलो और घर जाकर भांग खाकर सो जाओ, दोपहर से पहले उठना ही नहीं है।
अगले दिन मस्जिद किसी को दिखी नही, तो बवाल मचा। कुछ प्रमुख हिंदुओं को पकड़ लिया गया। पाँच-छः दिन कर्फ्यू भी लगा रहा। लेकिन प्रमाण कहीं कुछ था नहीं, इसलिए सब ठण्डा पड़ गया।
भैयाजी कस्तूरे
भैयाजी कस्तूरे बड़नगर तहसील में संघ के प्रचारक के नाते आए। वे बदनावर भी आए। उन्होंने देखा कि वहाँ पर हिन्दू के नाते नेतृत्व क्षमता मेरे पिताजी में ही है। अतः वे पिताजी से मिले और बातचीत करके वहाँ संघ शाखा शुरु करवायी।
एक बार भैयाजी बड़नगर से आए। पिताजी सहित चार-पाँच लोगों से बातचीत की। सबने सोचा कि वे बडनगर से खाना खाकर ही आए होंगे, इसलिए किसी ने उनसे खाने का पूछा ही नहीं। बात-चीत के बाद भैयाजी शाम को शाखा में चले गए। वहाँ प्रार्थना करते हुए वे गिर पड़े। किसी स्वयंसेवक ने आकर पिताजी को बताया। वे दौड़े-दौड़े गए। और भी कुछ लोग गए। उन्हें उठाया। पूछने पर पता चला कि भैयाजी ने दो दिन से खाना ही नहीं खाया था। पिताजी उन्हें घर ले गए और खाना खिलाया।
बस जिन्दा रहना, मरना नहीं
गान्धी-हत्या के आरोप में सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके विरोध में बदनावर से सत्याग्रह करके पिताजी भी जेल गए। कुछ दिन के बाद मेरे दादाजी श्री केसरीमल कावड़िया उन्हें मिलने के लिए जेल पहुँचे। बदनावर में रुई की गांठें बनाने की मिल थी। दादाजी वहाँ रुई की दलाली का काम करते थे। जेल में दादा जी ने पिताजी को कहा – “बेटा, काम सारा खतम हो रहा है। बड़ी मुश्किल हो रही है। तू माफी मांग कर आ जा।”
पिताजी ने उत्तर दिया- “जैसे भी हो गुजर करो। कर्जा भी लेना पड़े तो ले लो। बस जिन्दा रहना, मरना नहीं। मैं आकर सम्भाल लूँगा। अगर मर गए, तो मैं जलाने भी नहीं आऊँगा। माफी तो बहुत दूर की बात है।”
दादाजी को उस समय बुखार चढ़ा हुआ था। वे मुँह लटकाए वापिस आ गए।
मेरे जन्म के बाद १६५० में पिताजी सपरिवार उज्जैन आ गए थे। उज्जैन में एक बार दण्ड की प्रहार प्रतियोगिता हुई, तो उसमें वे दो हजार प्रहार लगा कर प्रथम रहे थे।
मैं सीमेंट कार्पोरेशन आफ इण्डिया में भू-वैज्ञानिक था, और वहीं से मैने स्वैच्छिक अवकाश ले लिया।