आज से ठीक 6 वर्ष पूर्व एक वर्षा-आँधी वाली रात मेरे एक सहयोगी ने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या श्री गुरुजी गोलवलकर जी की डॉक्टरी परीक्षा करने का समय दे सकता हूँ।
अगले प्रातः मैं उन्हें देखने चल दिया। कार की गति के साथ अनेक विचार भी मेरे मस्तिष्क में दौड़ रहे थे। हमने गोलवलकर जी के बारे में बहुत पढ़ा और सुना था। हमें मालूम था कि उन्हें अपनी मान्यताओं के प्रति अटूट आस्था है तथा उनकी मान्यताएँ हिंदुत्व पर दृढ़ व अचल हैं और यह कि इस संबंध में वे बहुत ही दृढ़ एवं संकुचित हैं। मैं इस अंतिम विषय में कितना गलत था यह बाद में पता चला। यही कारण था कि मैं दर्शन करने को उत्सुक था और मैं सोच रहा था कि चिकित्सा के विषय में आश्वस्त करने में आज एक विकट का सामना करना पड़ेगा।
उनका निर्बल और कृश शरीर उनके विषय में मेरी पूर्व जानकारी और कल्पना तथा धारणा के बिल्कुल विपरीत था।
पहली ही भेंट में मुझे पता चल गया कि मैं एक गंभीर दृष्टि के ज्ञान-इच्छुक व्यक्ति के सामने हूँ। वह व्यक्ति तर्कशील है, विनम्र है, और दूसरे पक्ष के दृष्टिकोण को सुन सकता है, उन्हें समझ सकता है। प्रारंभिक बातचीत से ही मैंने उनके व्यक्तित्व के विषय में बहुत कुछ सीख लिया।
“तो डॉक्टर, मेरे रोग के विषय में आपका क्या विचार है?” उन्होंने शुद्ध हिंदी में प्रश्न किया।
उनकी तरह शुद्ध हिंदी में बोलने का अभ्यास न होने से मैंने साधारण डॉक्टरी भाषा में कहा- “आपकी दशा से कैंसर की संभावना का संदेह हो रहा है। इसका ठीक पता लगाने और चिकित्सा हेतु आवश्यक होगी।”
मेरे इस निदान से वे जरा भी नहीं घबराए जैसा कि आमतौर पर साधारण आदमियों के साथ होता है।
कुछ पल सोचकर गुरुजी ने कहा- “यदि कैंसर ही है तो मेरी राख में उसे यों ही रहने दें। अच्छा, डॉक्टर क्या आपको आशा है कि आप उसे ठीक कर लेंगे?”
उन्हें इस रोग और मानव शरीर पर उसके कुप्रभावों का पूरा ज्ञान था! “क्या यह अन्यत्र भी पहुँच गया है?” उनका अगला प्रश्न था।
उनके जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति को आश्वस्त करने के लिए मुझे तत्काल उत्तर देना था। मैंने कहा, “यह अपनी राय की बात है। लेकिन इसे यों ही छोड़ दिया जाए, इससे मैं सहमत नहीं हूँ। कैंसर से निरोग होना इस पर निर्भर है कि रोग कितना व्यापक है। इसका पता ऑपरेशन से ही चल सकेगा और उसके बाद ही चिकित्सा का प्रकार निश्चित किया जाएगा। इसको यों ही छोड़ देना किसी जलपोत को हिमखंडों की तरफ बढ़ते हुए छोड़ देने के समान होगा। आपकी चिकित्सा करना, स्थिति को सँभालना हो तो, अर्थात् प्रत्यक्ष संकट से आपको दूर ले जाना होगा। अभी यह अन्यत्र नहीं फैला है, किंतु कितना है, इसका पता ऑपरेशन से ही चलेगा!”
गुरुजी ने स्थिति समझ ली और वे चुप हो गए। शायद विचारमग्न या आत्मदर्शन करने लगे थे। लम्बी चुप्पी के बाद वे बोले- “अब तो मुझे ऑपरेशन कराना ही होगा।” उन्होंने धीरता से कहा। उसके बाद वे जैसे अपने विचारों को स्वर देने लगे। अनेक लोगों से मिलना, कार्यक्रम, उत्तरदायित्व, प्रवास आदि जिनकी योजना वे बना चुके थे, के बारे में निर्णय लेना था। उनके साथियों तथा सचिव को आवश्यक आदेश भेज दिए गए। गुरुजी 30 जून 1970 को अस्पताल में भर्ती हो गए और 1 जुलाई 1970 को कैंसर का ऑपरेशन कर दिया गया।
इस पहली भेंट में ही उनके गरिमामय व्यक्तित्व की अनेक विशेषताएँ उजागर हो गई थीं। ज्ञान और विज्ञान को स्वीकार करने की उनकी इच्छा का पता चल गया था।
अपनी शारीरिक दशा के विषय में जानकारी प्राप्त करने हेतु उन्होंने कुछ प्रश्न किए थे। उनकी यह आतुरता उनके मस्तिष्क की अंतर्भेदी दृष्टि की द्योतक थी। विषम स्थिति का सामना करने के उनके साहस का परिचायक थी। उनके धैर्य, दूरदर्शिता और अपने काम के प्रति निष्ठा का अगाध प्रमाण थी।
मैंने उनसे कहा था कि आप इससे मुक्त होंगे तो भविष्य में आपके कार्य में बाधा नहीं पड़ेगी। इसके उपरांत उन्होंने तर्क नहीं किया था।
64 वर्ष की आयु होने पर भी उन्होंने शल्यक्रिया के बाद अनुकूल लक्षण प्रस्तुत किए थे। ऑपरेशन के अगले दिन वह उठ बैठे और चलने-फिरने लगे थे। अस्पताल में उनके तीन हफ्ते के निवास ने मुझे उनके मन और व्यक्तित्व का अध्ययन करने का काफी लंबा अवसर दिया था। उनसे हुई अनेक मुलाकातें मेरे जैसे आदमी के लिए ज्ञान का माध्यम सिद्ध हुईं। उनके अंतश्चरित्र को स्पष्ट करने वाली कुछ घटनाएँ मैं नीचे दे रहा हूँ।
वे अपने रोग की गंभीरता एवं व्यापकता के विषय में जानकारी और अपने जीवन की संभावना के बारे में जानना चाहते थे। सत्य को उनसे छिपाया नहीं था। सभी बातें साफ-साफ बता दीं।
“ओह। तब तो ठीक है।” उन्होंने कहा था- “इतने दिन और मेरे पास इतने दिनों के हेतु काफी काम हैं।”
ऑपरेशन के सात दिन बाद गुरुजी मुंबई के उपनगर की एक जगह में गए। उन्होंने वहाँ जाने की आज्ञा डॉक्टरों से ले ली थी। मैंने उनसे कहा था कि मैं आपको चला जाने दूँगा बशर्ते आप भाग न जाएँ। उन्होंने यह कह कर अपनी विनोदप्रियता का परिचय दिया था कि “मैं चोर-उचक्का लगता हूँ?”
वे जितने दिन अस्पताल में रहे, वहाँ विनोद और खुशी का वातावरण छाया रहा।
उनके व्यक्तित्व की पूर्ण मीमांसा करने के लिए कोई भी विशेषण उचित और उपयुक्त नहीं लगता। वे एक दार्शनिक व गहन अध्येता थे। मानव, पदार्थ, घटनाक्रम का अपरिसीम ज्ञान उन्हें था। उनकी विचारधारा में विज्ञान, धर्म और संस्कृति का समान समावेश था।
एक दिन उन्होंने कहा था- “मानव के प्रत्येक विकास के लिए विज्ञान परमावश्यक है।” यह सुनकर मुझे सचमुच आश्चर्य हुआ था, क्योंकि ये शब्द एक अगाध धार्मिक आस्थावाले व्यक्तित्व ने कहे थे। वे उन में से नहीं थे जो अपना दर्शन और अपनी आस्था दूसरों पर थोपते, किंतु वे अपनी मान्यताओं और कथनी के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे। उन्होंने कहा था- “जो मेरी दृष्टि में सत्य और न्यायपूर्ण है, मैं उसके लिए प्रयत्नशील रहा हूँ और रहूँगा।”
यही एक वाक्य उनकी अंतर्भावना और साहस का संक्षिप्त परिचय था और इस प्रश्न का उत्तर भी था कि उनके इतने अधिक अनुयायी क्यों हैं।
गुरुजी अस्पताल के अल्पकालीन निवास में भी अपना सारा कार्य कर रहे थे। ऑपरेशन के बाद की गई चिकित्सा भी उनके अनुकूल रही थी। अस्पताल आने की पूर्व संध्या को उन्होंने कहा था कि “मनुष्य को मृत्यु की चिंता नहीं करनी चाहिए। सभी को मरना होगा। जीवन की अवधि नहीं, उसकी उपयोगिता का महत्त्व होता है। मेरे सामने एक लक्ष्य है और मैं चाहता हूँ कि अंतिम श्वास तक मैं उसके हेतु प्रयत्नशील रह सकूँ।” मुझे तब ऐसा लगा था कि वे एक ऐसे पुरुष हैं, जो अपना काम पूरा कर लेने के लिए बहुत ही आतुर हैं। बाद के दो वर्ष वे बहुत ही स्वस्थ्य और कर्मण्य रहे थे। मेरी आशा के विपरीत उनका जीवन बहुत आगे तक चलता रहा। उनके रोग की गंभीरता के कारण मैं उनके अपरिहार्य अंत के प्रति बहुत भयाक्रांत था। वे एक उल्लेखनीय और बहुत ही सहज रोगी थे। जब भी मुंबई आते थे, परीक्षण के लिए अस्पताल आया करते थे! एक बार मैंने पूछा- “बुवा पुरुष के क्या हाल हैं?” “दिन पर दिन युवा होता जा रहा है”, उन्होंने उत्तर दिया था।
समय किसी को नहीं छोड़ता अतएव उसने गुरुजी को भी नहीं छोड़ा। इस वर्ष फरवरी या मार्च से उन्हें फिर कष्ट होने लगा था। यद्यपि वे कार्यशील थे, परंतु मृत्यु की छाया उनके निकट आती जा रही थी। अप्रैल में लिए गए एक्स-रे से पता चला था कि रोग अत्यंत गंभीर हो गया है। उसके बाद के घटनाक्रम की ओर लिखने को अब शेष ही क्या बचा है।
इस आलेख का यह उद्देश्य नहीं है कि गुरुजी को मृत्यूपरांत उस रूप में दर्शाया जाए, जो वे जीवन में नहीं थे। वह व्यक्ति, जिसने एक भयकर रोग के शारीरिक और मानसिक आघात का धीरज और साहस से सामना किया, वह व्यक्ति, अपने देश के हेतु जिसकी मान्यताएँ और आस्थाएँ निष्कपट थीं, जो उन आस्थाओं से कभी डिगा नहीं, वह व्यक्ति, जो शरीर से दुर्बल और कृश था, किंतु जिसमें अखंड अथाह क्रियाशीलता थी, जिसमें अनुशासन था, आगे बढ़ने की आतुरता थी, वह व्यक्ति जिसने गलत को सही राह पर लाने के लिए अथक प्रयास किया, वह थे- गुरुजी गोलवलकर!