तुलसीदास जयन्ती पोस्टर

तुलसीदासजी ने अपने समसामयिक मुगल शासन की कुव्यवस्था का चित्रण अपनी रचनाओं में किया है। विशेषकर उनकी रचना 'कवितावली' में मुगल शासन व्यवस्था में किसानों की त्रासद स्थिति और लोगों के जीविका विहीन होकर दर-दर भटकने का चित्रण मिलता है। अकाल, भुखमरी, महामारी और बेरोजगारी जैसे वातावरण से जनता जूझ रही थी और मुगलिया शासकों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।
तुलसीदासजी ने अपने समसामयिक मुगल शासन की कुव्यवस्था का चित्रण अपनी रचनाओं में किया है। विशेषकर उनकी रचना 'कवितावली' में मुगल शासन व्यवस्था में किसानों की त्रासद स्थिति और लोगों के जीविका विहीन होकर दर-दर भटकने का चित्रण मिलता है। अकाल, भुखमरी, महामारी और बेरोजगारी जैसे वातावरण से जनता जूझ रही थी और मुगलिया शासकों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।

“तुलसीदास जी की कविता की लोकप्रियता का कारण यह है कि हमारे देश का यथार्थ उसमें उपस्थित है।"
आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी
“तुलसीदास जी की कविता की लोकप्रियता का कारण यह है कि हमारे देश का यथार्थ उसमें उपस्थित है।"
आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी

तुलसीदासजी के साहित्य में साधुत्व, तप, संयम और कर्त्तव्य जैसे गुणों की प्रतिष्ठा अवतारी व्यक्तित्व की गरिमा तक ले जाती है। उनके काव्य में संस्कृति किसी एक पक्ष की सीमित अवधारणा नहीं, बल्कि मानव जीवन के समग्र, बहुआयामी और सन्तुलित स्वरुप में प्रकट होती है।
तुलसीदासजी के साहित्य में साधुत्व, तप, संयम और कर्त्तव्य जैसे गुणों की प्रतिष्ठा अवतारी व्यक्तित्व की गरिमा तक ले जाती है। उनके काव्य में संस्कृति किसी एक पक्ष की सीमित अवधारणा नहीं, बल्कि मानव जीवन के समग्र, बहुआयामी और सन्तुलित स्वरुप में प्रकट होती है।

तुलसीदास का सपनों का समाज एक ऐसा समाज है, जिसमें राजा और प्रजा दोनों अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं। राजा का प्रताप और प्रजा का सहयोग मिलकर सुख, शान्ति और समृद्धि का वातावरण निर्मित करते हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था, स्वधर्म और श्रुति नीति के पालन पर आधारित यह समाज आधुनिक काल में भी प्रासंगिक है। बशर्ते इसे सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। वर्णव्यवस्था को जातिप्रथा से अभिन्न मानने की भ्रान्ति को दूर करना आवश्यक है। 'तुलसी का आदर्श समाज' हमें यह सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिये।
तुलसीदास का सपनों का समाज एक ऐसा समाज है, जिसमें राजा और प्रजा दोनों अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं। राजा का प्रताप और प्रजा का सहयोग मिलकर सुख, शान्ति और समृद्धि का वातावरण निर्मित करते हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था, स्वधर्म और श्रुति नीति के पालन पर आधारित यह समाज आधुनिक काल में भी प्रासंगिक है। बशर्ते इसे सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। वर्णव्यवस्था को जातिप्रथा से अभिन्न मानने की भ्रान्ति को दूर करना आवश्यक है। 'तुलसी का आदर्श समाज' हमें यह सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिये।

रामराज्य तुलसीदास जी के सपनों का समाज है। जिसमें राजा और प्रजा दोनों अपने कर्तव्यों का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करते हैं। तुलसीदास जी के अनुसार राजा का प्रताप तभी स्थापित होता है जब वह अपनी नीयत को शुद्ध रखता है और राज-पाठ को भोग-विलास का साधन नहीं मानता अपितु इसे प्रजा के प्रति अपने दायित्व के रूप में ग्रहण करता है।
रामराज्य तुलसीदास जी के सपनों का समाज है। जिसमें राजा और प्रजा दोनों अपने कर्तव्यों का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करते हैं। तुलसीदास जी के अनुसार राजा का प्रताप तभी स्थापित होता है जब वह अपनी नीयत को शुद्ध रखता है और राज-पाठ को भोग-विलास का साधन नहीं मानता अपितु इसे प्रजा के प्रति अपने दायित्व के रूप में ग्रहण करता है।

तुलसी जयन्ती
श्रावण शुक्ल सप्तमी
मुगल शासकों के आगमन से सांस्कृतिक और धार्मिक तनाव उत्पन्न हो रहा था। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के प्रति प्रबुद्ध वर्ग में चिन्ता और आशंका व्याप्त थी।
ऐसे में इस्लाम के एक पुस्तक, एक ईश्वर और एक नबी की अवधारणा के समक्ष हिन्दू समाज जो अनेक पंथों, ग्रन्थों और देवी देवताओं का समूह था, को संगठित करना एक चुनौती थी। तुलसीदास जी ने अपनी तीव्र मेधा से इस सत्य को पहचाना और श्रीरामचरितमानस के माध्यम से एक ऐसी कृति रची, जिसमें वेद, पुराण और शास्त्रों का सार समाहित है। यह ग्रन्थ पिछले साढ़े चार सौ वर्षों से राजा - रंक, धनी - निर्धन, विद्वान - मूर्ख सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
तुलसी जयन्ती
श्रावण शुक्ल सप्तमी
मुगल शासकों के आगमन से सांस्कृतिक और धार्मिक तनाव उत्पन्न हो रहा था। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के प्रति प्रबुद्ध वर्ग में चिन्ता और आशंका व्याप्त थी।
ऐसे में इस्लाम के एक पुस्तक, एक ईश्वर और एक नबी की अवधारणा के समक्ष हिन्दू समाज जो अनेक पंथों, ग्रन्थों और देवी देवताओं का समूह था, को संगठित करना एक चुनौती थी। तुलसीदास जी ने अपनी तीव्र मेधा से इस सत्य को पहचाना और श्रीरामचरितमानस के माध्यम से एक ऐसी कृति रची, जिसमें वेद, पुराण और शास्त्रों का सार समाहित है। यह ग्रन्थ पिछले साढ़े चार सौ वर्षों से राजा - रंक, धनी - निर्धन, विद्वान - मूर्ख सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने अपने आदर्श समाज का एक सुन्दर खाका खींचा है। यह ग्रन्थ अवधी भाषा में रचा गया किन्तु इसमें संस्कृत के परम्परागत पारिभाषिक शब्दों का प्रचुर उपयोग हुआ है। इसकी विषय-वस्तु वेदों, पुराणों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों से संकलित है।
श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने अपने आदर्श समाज का एक सुन्दर खाका खींचा है। यह ग्रन्थ अवधी भाषा में रचा गया किन्तु इसमें संस्कृत के परम्परागत पारिभाषिक शब्दों का प्रचुर उपयोग हुआ है। इसकी विषय-वस्तु वेदों, पुराणों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों से संकलित है।

एक आदर्श राष्ट्र कैसा हो? शासन प्रणाली, पारिवारिक संरचना, आपसी व्यवहार, लोक कल्याणकारी समाज की परिकल्पना तथा राजा और प्रजा के कर्त्तव्यों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के मूल जीवन-मूल्य इन सभी
विषयों का तुलसीदास जी ने रामराज्य के माध्यम से अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है।
U
एक आदर्श राष्ट्र कैसा हो? शासन प्रणाली, पारिवारिक संरचना, आपसी व्यवहार, लोक कल्याणकारी समाज की परिकल्पना तथा राजा और प्रजा के कर्त्तव्यों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के मूल जीवन-मूल्य इन सभी
विषयों का तुलसीदास जी ने रामराज्य के माध्यम से अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है।
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तुलसी जयन्ती
श्रावण-शुक्ल-सप्तमी
तुलसीदास जी द्वारा प्रस्तुत भगवान राम का स्वरूप केवल एक धार्मिक आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के शील, शक्ति, त्याग और करुणा जैसे मूलभूत मूल्यों का प्रतिनिधि स्वरूप है। इन गुणों के माध्यम से उन्होंने भगवान राम को उस लोक मंगलकारी चरित्र के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो समग्र मानवता के लिए अनुकरणीय है।
तुलसी जयन्ती
श्रावण-शुक्ल-सप्तमी
तुलसीदास जी द्वारा प्रस्तुत भगवान राम का स्वरूप केवल एक धार्मिक आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के शील, शक्ति, त्याग और करुणा जैसे मूलभूत मूल्यों का प्रतिनिधि स्वरूप है। इन गुणों के माध्यम से उन्होंने भगवान राम को उस लोक मंगलकारी चरित्र के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो समग्र मानवता के लिए अनुकरणीय है।

तुलसीदास जी का आविर्भाव उस समय हुआ जब उत्तर भारत में मुग़ल शासन अपनी जड़ें जमा चुका था। उनकी प्रवृत्ति स्थानीय संस्कृति में घुलने मिलने के बजाय हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने की थी। यह स्थिति भारतीय समाज के लिए अभूतपूर्व थी। ऐसे समय में तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की, जो हिन्दू समाज को एकजुट करने का एक सशक्त माध्यम बनी।
तुलसीदास जी का आविर्भाव उस समय हुआ जब उत्तर भारत में मुग़ल शासन अपनी जड़ें जमा चुका था। उनकी प्रवृत्ति स्थानीय संस्कृति में घुलने मिलने के बजाय हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने की थी। यह स्थिति भारतीय समाज के लिए अभूतपूर्व थी। ऐसे समय में तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की, जो हिन्दू समाज को एकजुट करने का एक सशक्त माध्यम बनी।

तुलसीदास जी के साहित्य को देखें तो उनके सम्पूर्ण साहित्य में युगीन परिस्थितियों का सजीव और यथार्थ चित्रण मिलता है। यही कारण है कि तुलसीदास जी हमारे सामने सिर्फ एक कवि के रूप में ही नहीं बल्कि एक लोकद्रष्टा, समाज-सुधारक, सन्तशिरोमणि और मनीषी के रूप में उपस्थित होते हैं।
तुलसीदास जी के साहित्य को देखें तो उनके सम्पूर्ण साहित्य में युगीन परिस्थितियों का सजीव और यथार्थ चित्रण मिलता है। यही कारण है कि तुलसीदास जी हमारे सामने सिर्फ एक कवि के रूप में ही नहीं बल्कि एक लोकद्रष्टा, समाज-सुधारक, सन्तशिरोमणि और मनीषी के रूप में उपस्थित होते हैं।


