संत ज्ञानेश्वर : अल्पायु में अद्वैत ज्ञान और भक्ति की अद्भुत साधना

संत ज्ञानेश्वर: अल्पायु में अद्वैत ज्ञान और भक्ति की अद्भुत साधना

पंद्रह वर्ष की उम्र में ही कृष्णभक्त और योगी बन चुके भारत के महान् संत एवं मराठी कवि संत ज्ञानेश्वर का जन्म 1275 ई. में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले में पैठण के पास आपेगांव में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। इनके पिता का नाम विट्ठल पंत तथा माता का नाम रुक्मिणी बाई था। बड़े भाई निवृत्तिनाथ के कहने पर उन्होंने एक वर्ष के अंदर ही भगवद्गीता पर टीका लिख डाली। ‘ज्ञानेश्वरी’ नाम का यह ग्रंथ मराठी भाषा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है। यह ग्रंथ दस हजार पद्यों में लिखा गया है। यह भी अद्वैत-वादी रचना है और यह योग पर भी बल देती है। 28 अभंगों (छंदों) की इन्होंने ‘हरिपाठ’ नामक एक पुस्तिका लिखी है, जिस पर भागवतमत का प्रभाव है।

मुक्ताबाई, संत ज्ञानेश्वर की बहन थीं। अपने तीनों भाइयों की तरह ही मुक्ताबाई जीवन-मुक्त विचारों वाली थीं। इन्हें योगमार्ग का अच्छा ज्ञान था। मुक्ताबाई को अद्वैतानुभव भी प्राप्त था और इनका सगुण प्रेम तो उत्कृष्ट कोटि का था। मुक्ताबाई जितनी कम आयु की थीं, बुद्धि और साधना से उतनी ही उच्चकोटि की थीं। एक बार योगी चांगदेव इनके यहां आए। मुक्ताबाई स्नान कर रही थीं। चांगदेव ने मुक्ताबाई को उस अवस्था में देखकर हाथों से आंखें मूंद ली और वापस चले गए। बाद में मुक्ताबाई ने तीनों भाइयों के सामने कहा- ‘चौदह सौ वर्ष के बड़े बूढ़े हुए तुम, पर तुम्हारे मन की भ्रांति न गई। ऐसा कठिन और महान योग साधन तुमने किया, पर अभी आत्मतत्व की पहचान न हुई। स्त्री-पुरुष भेद की भावना ज्ञानियों में नहीं हुआ करती।’

एक बार काशी आदि की यात्रा से लौटते हुए ज्ञानेश्वर, नामदेव आदि पूरी संत मंडली गोरा कुम्हार के यहां ठहरी । वहां मुक्ताबाई ने पास ही पड़ी थापी के विषय में गोरा कुम्हार से पूछा। उन्होंने कहा कि इससे ठोक कर घड़े का कच्चा-पक्का होना देखा जाता है। मुक्ताबाई ने हंसी-हंसी में कहा- ‘हम सबको इस थापी से ठोक कर बताइए कि कौन संत कच्चा है, कौन पक्का। जब नामदेव की बारी आई तो उन्हें ठोकर कहा गया- ये कच्चे हैं।’ नामदेव को बहुत बुरा लगा। गोरा कुम्हार ने कहा, ‘नामदेव! तुम भक्त हो, पर अभी तुम्हारा अहंकार नहीं गया। जब तक गुरु की शरण में न जाओगे तब तक ऐसे ही कच्चे रहोगे।’ संत नामदेव को बोध हुआ। स्वयं स्फूर्त ज्ञान में त्रुटि देख उन्होंने संत विठोबा खेचर से दीक्षा ली, जिससे अंत में उनके भीतर का अहंकार मर गया।

मराठी संतों में संत ज्ञानेश्वर प्रमुख माने जाते हैं। संत ज्ञानेश्वर की कविता दार्शनिक तथ्यों से पूर्ण है तथा शिक्षित जनता पर अपना गहरा प्रभाव डालती है। 28 अभंगों (छंदों) की इन्होंने ‘हरिपाठ’ नामक एक पुस्तिका लिखी है, जिस पर भागवतमत का प्रभाव है। इसके अतिरिक्त संत ज्ञानेश्वर के रचित कुछ अन्य ग्रंथ हैं- ‘अमृतानुभव’, ‘चांगदेवपासष्टी’, ‘योगवसिष्ठ टीका’ आदि। ज्ञानेश्वर ने उज्जयिनी, प्रयाग, काशी, गया, अयोध्या, वृंदावन, द्वारका, पंडरपुर आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा की। ज्ञानेश्वर ने 1296 में मात्र 21 साल की उम्र में इन्होंने समाधी ले ली थी।

Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *