घोड़े अलग-अलग रूप-रंग के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं। अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं। ये जवाब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक अंग्रेज को दिया था। दरअसल, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक बार भारतीय दर्शन पर व्याख्यान देने इंग्लैंड गए थे, तब वहां बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आए थे, उसी वक्त एक अंग्रेज ने उनसे पूछा कि- क्या हिंदू नाम का कोई समाज, कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरे हुए हो? तुम्हारा एक सा रंग नहीं- कोई गोरा तो कोई काला, कोई धोती पहनता है तो कोई लुंगी, कोई कुर्ता तो कोई कमीज। देखो हम सभी अंग्रेज एक जैसे हैं- एक ही रंग और एक जैसा पहनावा। तब राधाकृष्णन जी ने उत्तर दिया कि, घोड़े अलग-अलग रूप-रंग के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं। अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं। राधाकृष्णन जी के इस जवाब को सुनकर वहां उपस्थित सभी ने चुप्पी साध ली थी। डॉ. राधाकृष्णन के तर्कपूर्ण हाजिर-जवाबी से पूरी दुनिया उनकी कायल थी।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु में आंध्रप्रदेश से सटे स्थान तिरूतनी नाम के एक गांव में 5 सितम्बर सन् 1888 को हुआ। डॉ. राधाकृष्णन ने अपना जन्मदिवस शिक्षकों के लिए समर्पित किया। इसलिए 5 सितंबर सारे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में सम्मानपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत भी बड़े ही दिलचस्प तरीके से हुई थी। दरअसल, बात साल 1962 की है, जब डॉ. राधाकृष्णन भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने और उनका जन्मदिन आया। इस मौके पर उनके कुछ छात्र उनसे मिलने पहुंचें और उनका जन्मदिन मनाने का अनुरोध किया। इस पर डॉ. राधाकृष्णन ने उन्हें यह सुझाव दिया कि उनका जन्मदिन मनाने का सबसे अच्छा तरीका इस दिन को शिक्षकों को समर्पित करना है और इस तरह डॉ. राधाकृष्णन के एक विचार से भारत में शिक्षक दिवस की शुरुआत हुई।
भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक, आस्थावान, हिन्दू विचारक और भारतीय संस्कृति के संवाहक डॉ. राधाकृष्णन एक साधारण ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरस्वामी और माता का नाम सीतम्मा था। परिवार आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न नहीं था, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण से भरपूर था। बचपन से ही वे मेधावी और तेजस्वी रहे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा तिरुत्तनी और तिरुपति में हुई। आगे चलकर उन्होंने वेल्लूर और मद्रास (अब चेन्नई) में पढ़ाई की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवेश लिया। यहाँ उन्होंने दर्शनशास्त्र को प्रमुख विषय के रूप में चुना और उसमें गहरी रुचि विकसित की। केवल 20 वर्ष की आयु में ही उन्होंने दर्शनशास्त्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। अध्ययन के दौरान उन्होंने भारतीय दर्शन पर गहराई से काम किया और बाद में “The Ethics of the Vedanta and Its Metaphysical Presuppositions” नामक शोधग्रंथ लिखा। राधाकृष्णन जी का प्रारम्भिक जीवन सादगी और धार्मिक वातावरण से जुड़ा रहा तथा शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने दर्शनशास्त्र को आधार बनाकर अपने ज्ञान और विचारों की नींव रखी।
दर्शनशास्त्र में एम.ए. की उपाधि लेने के बाद सन् 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हो गए। फिर प्राध्यापक भी रहे। वे भारतीय दर्शनशास्त्र परिषद् के अध्यक्ष भी रहे। डॉ. राधाकृष्णन ने अपने लेख और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र से परिचित कराया। पूरे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा भी की गई। छल-कपट और अहंकार जैसे भाव से कोसों दूर रहने वाले और अपने राष्ट्रप्रेम के लिए विख्यात राधाकृष्णन को अंग्रेजी सरकार ने ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया था। एक बार शिकागो विश्वविद्यालय ने डॉ. राधाकृष्णन को तुलनात्मक धर्मशास्त्र पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया। कई भारतीय विश्वविद्यालयों की भांति कोलंबो एवं लंदन विश्वविद्यालय ने भी अपनी-अपनी मानद उपाधियों से उन्हें सम्मानित किया था। भारत की स्वतंत्रता के बाद भी डॉ. राधाकृष्णन ने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे पेरिस में पूरे संसार के लोगों की भलाई के लिए अनेक कार्य करने वाली संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अंग यूनेस्को नामक संस्था की कार्यसमिति के अध्यक्ष बने। इसके अलावा वो 1949 से 1952 तक रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर रहे। भारत-रूस की मित्रता बढ़ाने में उनका भारी योगदान रहा। अनेक विभिन्न महत्वपूर्ण उपाधियों पर रहते हुए भी उनका ध्यान सदैव अपने संपर्क में आए लोगों और विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना बढ़ाने की ओर रहता था।
उनके इन्हीं गुणों के कारण ही भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने प्रकांड विद्वान, दार्शनिक, शिक्षाविद और लेखक रहे डॉ. राधाकृष्णन जी को देश का सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रत्न’ प्रदान किया था। 1963 में उन्हें ऑर्डर ऑफ मेरिट और 1975 में टेम्पलटन पुरस्कार भी मिला। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले उन्हें सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से संबोधित किया जाता था और स्वतंत्रता के बाद वे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जाने गए। डॉ. राधाकृष्णन सन् 1952 में भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। 13 मई, 1962 को वे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने तथा सन् 1967 तक राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश की बहुमूल्य सेवा की। लंबी बीमारी के बाद 17 अप्रैल 1975 को डॉ. राधाकृष्णन का निधन हो गया था।