1995 ई. में जब यह कल्पना ही नहीं की जा सकती थी कि जम्मू-कश्मीर जैसे आतंकवादग्रस्त क्षेत्र में एक दिन भारतीय संविधान पूरी तरह से लागू होगा, राष्ट्रीय एकता में बाधक अस्थायी धारा-370 का लोप हो जाएगा, 35-ए का अस्तित्व ही कहीं नहीं रहेगा और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कश्मीर में सम्मान और गौरव के साथ कहरेगा, उन विकट और अनिश्चितकालीन परिस्थितियों में साहित्यिक हृदय राष्ट्र नेता और भारत के यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने न केवल ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की कल्पना की थी अपितु आत्मविश्वास के साथ जम्मू-कश्मीर के संदर्मों में इसकी घोषणा भी की थी। संभवतः उनका यह कथन उतना प्रचारित नहीं हो पाया, क्योंकि यह भूमिका के रूप में एक कविता संग्रह फिरन में छिपाए तिरंगा में संकलित था। उनके उस कथन को आज नए संदर्मी में व्याख्यायित करने की आवश्यकता है।
आज से तीस वर्ष पूर्व हिंदी अकादमी दिल्ली के आर्थिक सहयोग से सितंबर 1965 ई. में मेरा प्रथम कविता संग्रह ‘फिरन में छिपाए तिरंगा नई दिल्ली स्थित अनिल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ। उन दिनों मैं राष्ट्रीय साप्ताहिक पांचजन्य’ में एक पत्रकार के नाते सेवारत था। श्री तरुण विजय संपादक थे। पाकिस्तान प्रायोजित सशस्त्र आतंकवाद के कारण ‘रलिव, चलिय, गलिव के उत्तेजक कट्टरपंथी नारों और धमकियों के बीच 1960 के प्रारंभ से ही कश्मीर से हिंदुओं का सामूहिक पलायन हो रहा था, जिसमें मेरा परिवार भी भागीदार था।
राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे और संविधान का सम्मान करने वाले इस समुदाय को आतंकवादियों ने आए दिन नृशंस हत्याओं से भयभीत कर वहीं से पलायन करने पर विवश किया। जातीय संहार, घर के बिछोह की पीड़ा और विस्थापन की त्रासदी के कारण कवि-मन में हूक उठनी स्वाभाविक थी और इस प्रकार से फिरन में छिपाए तिरंगा की कविताएँ सृजित होती रहीं जिन्हें ‘पांचजन्य के संपादकीय मंडल से प्रोत्साहन और नैतिक समर्थन मिलता रहा, साथ ही इस साप्ताहिक समाचार पत्र के तत्कालीन संपादकीय सलाहकार और वरिष्ठ स्तंभकार, लेखक स्व. भानुप्रताप शुक्ल ने मुझे इन कविताओं को संकलित करने के लिए प्रेरित किया। मन में यह अभिलाषा थी कि इस संकलन को अटल जी का आशीर्वाद प्राप्त हो, इसके लिए पांचजन्य के तत्कालीन संपादक श्री तरुण विजय ने पहल की और एक दिन मुझे अटल जी द्वारा हस्तलिखित ‘शुभाशीष थमा दिया।
अटल जी ने इस ‘शुभाशीष में फिरन में छिपाए तिरंगा के कथ्य, आतंकवाद के कारण कवि के उजड़े और जले हुए घर और कश्मीर लौटने की आशा और संकल्प शक्ति को उजागर किया, वहीं आने वाले कल में कश्मीर में शान से तिरंगा फहरने की भविष्यवाणी भी की है। यह केवल ‘शुभाशीष के रूप में संग्रह की भूमिका नहीं है वरन् समस्त कश्मीरी विस्थापित हिंदुओं के रिसते घावों पर लगाया गया स्नेहलेप है। वित्त्थापित हिंदुओं की व्यथा को आत्मसात करते हुए अटल जी ने समस्त कश्मीरी समुदाय का मनोबल बढ़ाया साथ ही अनिश्चितता की घड़ी में उनका मार्ग भी प्रशस्त किया है। संग्रह के शीर्षक में राष्ट्रीयता को छिपाने की जो छटपटाहट है उसमें अटल जी ने संकल्प की प्राजंलता भर दी। शुभाशीष के रूप में अटल जी की ऐतिहासिक पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं-
“फिरन में छिपाए तिरंगा’ के रचयिता श्री महाराजकृष्ण ‘भरत’ ने कश्मीर के आतंकवाद को स्वयं झेला है। उनका अनन्तनाग में घर आतंकवादियों ने जला दिया। पूरा परिवार सदियों पुराना, अपने पुरखों का शहर, घर-बार छोड़कर जम्मू के विस्थापन शिविरों में रहने को विवश हुआ। उनके हृदय में लहरा रहा देशभक्ति का तिरंगा आहत हुआ, वे हर दुःख झेलकर भी अपनी देश भक्ति की ज्वाला प्रखर किए रहे, अन्य लाखों कश्मीरियों की भाँति और उसी की अभिव्यक्ति हुई है ‘फिरन में छिपाए तिरंगा काव्य संग्रह की कविताओं में।
श्री भरत की कविताएँ कश्मीर की देशभक्ति की वेदना, घुटन और क्षोभ को तो व्यक्त करती ही हैं, साथ ही उनमें सबल, सशक्त, अखंड भारत के निर्माण तथा गर्व से सर ऊँचा किए फिर कश्मीर लौटने की आशा और संकल्प भी झलकता है जो एक दिन अवश्य पूरा होगा। वह घड़ी दूर नहीं जब किसी को कश्मीर से फिरन में तिरंगा छिपा कर लाने की विवशता नहीं होगी, क्योंकि वह शान से कश्मीर के हर घर पर निर्भीक फहरा रहा होगा’।
तब अटल जी लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता थे। 25-26 नवंबर, 1965 को दिल्ली में अखिल भारतीय कश्मीरी हिंदू प्रतिनिधि सम्मेलन का आयोजन होना था। इस आयोजन में ‘फिरन में छिपाए तिरंगा का लोकार्पण निश्चित हुआ था। इस समारोह में मुख्य अतिथि के नाते सहभागिता के लिए हम अटल जी के दिल्ली निवास पर निमंत्रण देने गए थे। मेरे साथ उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं जम्मू-कश्मीर विचार मंच के तत्कालीन अध्यक्ष श्री त्रिलोकी नाथ राजदान और महामंत्री श्री अजय भारती भी थे। हमारा प्रयोजन यह भी था कि इस सम्मेलन में वे मेरे संग्रह का भी लोकार्पण कर सकें।
परिस्थितिवश उन्हीं दिनों उनका दिल्ली से बाहर जाने का कार्यक्रम पहले से निश्चित हुआ था, इस कारण वे इस सम्मेलन में नहीं आ पाए। अटल जी के साथ उन क्षणों में कश्मीर की ज्वलंत परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में जो चर्चा हुई वह बहुत ही धीर-गंभीर थी। उन्होंने कहा कि कश्मीर की परिस्थितियाँ कल अवश्य बदल जायेंगी, आतंकवाद पर नकेल कसी जाएगी, कश्मीर का संपूर्ण क्षेत्र भारत का अविच्छिन्न अंग बना रहेगा लेकिन सबसे बड़ी चिंता कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी की है। वह पुनः अपने घरों की ओर सम्मान और सुरक्षा के साथ लौट पायें, यह सबसे बड़ी चुनौती होगी, जिसका हमें समाधान खोजना ही होगा।
अगस्त २०१६ में संसद के दोनों सदनों में पारित जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक’ के बाद केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की वैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिला। कश्मीर के हर घर पर निर्भीकता से तिरंगा फहराने की राष्ट्रीय एकत्व की जो भावना अटलजी ने व्यक्त की थी उसे चरितार्थ होने में वर्षों लगे और जिस प्रयास के पीछे वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भी आंदोलनरत थे। बरसों बाद वह भावना एक नए तेवर के साथ साहित्य में भी उतर आयी थी। इसके प्रति उनका मंतव्य कितना गहरा था क्योंकि जब तक अस्थायी धारा ३७० समाप्त नहीं होती, तब तक फिरन में तिरंगा छिपाने की विवशता भी दूर नहीं होती। इसी धारा के रहते जम्मू-कश्मीर का अलग विधान और अलग निशान था। प्रदेश के सचिवालय पर दोनों चिह्न समानांतर रूप से विद्यमान थे। वर्षों बाद इस देश में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान की संकल्पना साकार हो उठी।
‘फिरन में छिपाए तिरंगा में संकलित इस ऐतिहासिक वक्तव्य को देश ने अगस्त २०१६ से कश्मीर में भी चरितार्थ होते हुए देखा, जब कुछ समय बाद वहाँ तिरंगा रैलियों का आयोजन शुरू होने लगा, हर घर तिरंगा’ की योजना फलीभूत हुई, ऐतिहासिक लाल चौक के घंटाघर की ऊँचाई पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराने लगा, उसके आसपास का क्षेत्र तिरंगे के रंग में रंगने लगा। निस्संदेह इस आमूलचूल परिवर्तन से उस कट्टरपंथी मानसिकता को प्रत्युत्तर मिला जो यह कहते फिरते थे कि जम्मू-कश्मीर की संरचना में यदि ३७० समाप्त किया गया तो कश्मीर में कोई तिरंगे को कंधा देने वाला भी नहीं रहेगा। उसी कश्मीर में आज शान से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहरा रहा है।
वर्ष 1966 ई. में जब भारत सरकार के अधीन केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने ‘हिंदीतर भाषी हिंदी साहित्यकार पुरस्कार के अंतर्गत ‘फिरन में छिपाए तिरंगा’ को पुरस्कृत करने की घोषणा की और १७ मार्च, १६६७ को राष्ट्रपति भवन में यह पुरस्कार ग्रहण करने के लिए मुझे जाना था, तो इससे एक दिन पूर्व १६ मार्च को मैं अटल जी के दिल्ली निवास पर सपरिवार उनसे मिलने गया था। मेरे साथ माताजी, सहधर्मिणी तथा मित्र विक्रम उपाध्याय और मेरे गुरु पदमश्री प्रोफेसर चमन लाल सप्पू भी थे। उन अनमोल क्षणों के चित्र आज भी संजोकर रखे हुए हैं।
अटल जी ने मुझे साहित्य लेखन में और आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मैं जहाँ भी जाता है आपकी पुस्तक की चर्चा करता है। आपको और क्या चाहिए ? मैंने केवल यही उत्तर दिया था. ‘आपका आशीष। उन्हें फिरन में छिपाए तिरंगा का शीर्षक बहुत ही भा गया था क्योंकि यह कश्मीर की तत्कालीन परिस्थितियों को व्यक्त करने में बहुत ही सटीक बैठता था। इसमें आतंकवाद का दंश घर का संत्रास और राष्ट्रीयता की भावना भी उमड़ रही थी। कश्मीर से उजडने का यह एक मुहावरा बन गया। 1966 में जब उन्होंने जम्मू शहर में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था तो अपने भाषण की शुरुआत ही मेरे संग्रह के शीर्षक से की थी। इस कार्यक्रम के बाद जब मेरा जम्मू जाना हुआ तो बहुत सारे लोगों का मुझे प्यार मिला और पहचान भी।
‘कैदी कविराय के संबोधन से भी विख्यात अटल जी के विशाल व्यक्तित्व और कृतित्व से कोई भी अछूता नहीं रहा है। देश की एकता एवं अखंडता के परिप्रेक्ष्य में उनका राष्ट्र चिंतन सर्वविदित है। उनकी वक्तृत्व शैली, तार्किक और ओजस्वी धाराप्रवाह भाषणों की गूंज आज भी सुनाई देती है। संसद में विरोधी विचारधारा के लोग भी उनकी वाक्पटुता के कायल हो जाते थे। वे न जाने कितने लोगों के प्रेरणास्रोत, आत्मीय और मार्गदर्शक रहे होंगे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मार्च 1965 में उन्होंने मुझे भारत प्रकाशन लिमिटेड नई दिल्ली द्वारा आयोजित दो दिवसीय पत्रकार सम्मेलन में सम्मानित किया था। आज इस रूप में उनका चिंतन करना ऊर्जा से भर देता है। कश्मीर से उजड़े हुए निर्वासित, निष्कासित विस्थापितों को उदीयमान कवि के प्रथम संग्रह के माध्यम से जो उन्होंने प्यार दिया, अपनत्व और प्रोत्साहन दिया. जीवन जीने की जिजीविषा बढ़ाई निराशा से आशा और फिरन में तिरंगा छिपाने की विवशता से उभरने के लिए जो संकल्प शक्ति दी. वह स्तुत्य है। आज जब वे हमारे बीच में नहीं हैं. उनका चिंतन प्रेरणा बौद्धिक विरासत हम सब की स्थायी पूँजी है। उनकी कविता ऊँचाई का अंतिम अंश याद आ रहा है जो उनकी प्रकृति और स्वभाव को दर्शाता है-
“मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना गैरों को गले न लगा सकूँ इतनी रुखाई कभी मत देना”।
इन पंक्तियों में विनम्रता और मानवीय संवेदनशीलता का सुंदर समन्वय है। अटल जी इसीलिए तो लोकनायक थे, सहृदय थे, कि उन्होंने मुझ जैसे सामान्य को भी गले लगाया और हिंदी साहित्य जगत से मेरी पहचान करायी। २५ दिसंबर, २०२५ को श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की १०१वीं जयंती पर उनके अपार व्यक्तित्व को कोटि-कोटि नमन।
डॉ. महाराजकृष्ण भरत
पूर्व प्रध्यापक व प्रतिष्ठित साहित्यकार
राष्ट्रधर्म दिसम्बर 2025