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‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

मनमोहन वैद्य जी

“वैष्णव जन तो तेणे रे कहिये, जे पीड़ पराई जाणे रे”। दूसरों की पीड़ा की अनुभूति कर उन्हें उस पीड़ा से मुक्त करने के सहज कर्म को ‘धर्म’ कहा गया है। राजा रंतिदेव का प्रसिद्ध वचन है – “मुझे न राज्य की कामना है, न स्वर्ग की और न ही मोक्ष की। दुःख से तप्त, त्रस्त लोगों को पीड़ा, वेदना से मुक्ति मिले, यही मेरी कामना है (कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्)। इसीलिए स्वाधीनता के बाद भारत के निर्माताओं, संविधानकर्ताओं ने भारत के लिए इसी ‘धर्म’ का महत्व समझ कर लोकसभा में लिखा है – “धर्म चक्र प्रवर्तनाय”। राज्यसभा में लिखा है – “सत्यम् वद धर्मं चर”। सर्वोच्च न्यायालय का बोधवाक्य है – “यतो धर्मस्ततो जय” और भारत के राष्ट्रध्वज में जो चक्र है वह “धर्मचक्र” है।

भारत में ‘राष्ट्र’ पश्चिम के ‘नेशन-स्टेट’ से अलग है। यहां राष्ट्र का मतलब समाज है। भारत की इस अध्यात्म आधारित सर्वांगीण-एकात्म जीवनदृष्टि को डॉ. राधाकृष्णन ने “हिन्दू जीवनदृष्टि” (Hindu view of Life) कहा है। इसके आधार पर “धर्म” का आचरण करना ‘हिन्दुत्व’ का प्रकटीकरण ही है। 

समग्र भारत में रहने वाला यह समाज एक है; हम सभी समान हैं और ये सब मेरे अपने हैं, यह संस्कार और सीख स्वयंसेवक शाखा में कार्यक्रमों तथा प्रवासी कार्यकर्ताओं के सहवास से प्राप्‍त करता है। समाज ने मानवीय और प्राकृतिक आपदाओं के समय स्वयंसेवकों द्वारा किए गए निरलस, आत्मीय सेवा कार्यों को भली‑भांति अनुभव किया है – चाहे वह विभाजन की विभीषिका हो, भूकंप, बाढ़ या कोरोना जैसी संक्रामक बीमारी। संघ के वैचारिक विरोधी भी स्वयंसेवकों की देशभक्ति, अनुशासन, समर्पण और सेवा से प्रभावित हैं और उनकी प्रशंसा भी करते हैं।

कांग्रेस-नीत यूपीए शासन के दौरान बनी फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ प्रसिद्ध धावक मिल्‍खा सिंह के जीवन पर आधारित है। फिल्‍म में दिखाया गया है कि विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए निराश्रित हिन्दू परिवारों में मिल्खा सिंह का परिवार भी था। फिल्म के तीन दृश्यों में संघ स्वयंसेवकों द्वारा निराश्रितों के लिए चलाए जा रहे राहत शिविर दिखाए गए हैं। कांग्रेस के शासन में ऐसे दृश्य दिखाना साहस का काम था। जब मैंने फिल्म के निर्देशक से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “करीब चार वर्ष से मैं इस फिल्म पर काम कर रहा हूं। पाकिस्तान से निराश्रित के रूप में भारत आए जितने भी लोगों से मेरी प्रत्यक्ष वार्ता हुई है, सभी ने संघ द्वारा की गई सेवा और सहायता का उल्लेख किया है।”

1977 में आंध्र प्रदेश की दीवि सीमा (पूर्व तटीय आंध्र) में आए भयंकर तूफान से बहुत तबाही हुई थी। तब संघ के स्वयंसेवकों ने जिस तत्परता और साहस के साथ सेवा कार्य किया, सड़ने के कारण दुर्गंध देने वाले शवों का दाह संस्कार किया (ऐसे स्वयंसेवकों को ‘शव सेना’ ऐसा कहा जाता था)।  पूर्णतः नष्ट हुए मूलपालम गांव के सभी के लिए पक्के मकान बनाकर दीनदयालपुरम नाम से घरों के लोकार्पण कार्यक्रम में विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी और आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. चेन्ना रेड्डी आए थे। दोनों ने संघ के सेवाकार्य की बहुत प्रशंसा की। उस समय प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक श्री प्रभाकर राव जी ने संघ की “आर एस एस” की नई परिभाषा बताई कि यह “आर एस एस” माने “रेडी फॉर सेल्फलेस सर्विस” (Ready for Selfless Service) है।

मई 2009 में पश्चिम बंगाल में आए ‘आयला’ चक्रवात से विशेषकर 24 परगना जिले में बहुत हानि हुई थी। स्वयंसेवक तुरंत सेवा में जुट गए थे। उसके तुरंत बाद संघ के शिक्षा वर्ग के लिए वहां मेरा जाना हुआ। सेवा देखना था तो पहले जीप द्वारा, फिर नाव से और अंत में घुटने भर कीचड़ में चलकर मुझे राहत कार्यस्थल पहुंचना पड़ा। जब मैंने पूछा कि यहां और कौन‑कौन सी संस्थाएं राहत कार्य कर रही हैं, तो उत्तर मिला कि वे सभी संस्थाएं मुख्य मार्गों पर ही कार्य कर रही हैं। अंदरूनी इलाके में, जहां सबसे अधिक विनाश हुआ, वहां केवल संघ स्वयंसेवक ही काम कर रहे हैं।

2013 में केदारनाथ में बादल फटने से अचानक आई बाढ़ में पीडि़तों की सहायता के लिए स्वयंसेवक पूरे देश में जनता से धन-संग्रह कर रहे थे। उस समय मुझे विदर्भ के श्री एम.डी. रामटेके नामक एक व्‍यक्ति का ई-मेल मिला। उसमें उन्‍होंने लिखा, “मैं आरएसएस का घोर विरोधी हूं। मैं कट्टर आंबेडकरवादी हूं और मानता हूं कि डॉ. आंबेडकर भगवान बुद्ध के अवतार हैं। पर अपने अनुभव से कह सकता हूं कि आरएसएस के लोग सेवा कार्य बड़ी प्रमाणिकता से करते हैं। यदि आप उन्हें सेवा हेतु 100 रुपये देंगे तो वे अपनी जेब से 10 रुपये अधिक जोड़कर 110 रुपये सेवा में लगा देंगे। इसलिए मेरा आवाहन है कि अगर इस समय संघ के स्वयंसेवक आपके पास सहायता निधि मांगने आएं तो आप उदार मन से उनकी सहायता करें।”

ऐसा निःस्वार्थ, आत्मीय सेवा करने का संस्कार स्वयंसेवक शाखा से प्राप्त करता है। प्राकृतिक अथवा मानवनिर्मित आपदा के समय स्वयंसेवक राहत और पुनर्वसन कार्य करते आ रहे हैं। राजकीय दुर्भावना के चलते कांग्रेस सरकार ने दो बार 1948 और 1975 में संघ पर अनुचित, अवैधानिक और अलोकतांत्रिक प्रतिबंध लगाया तथा हर तरह से संघ का दमन करने का प्रयास किया। फिर भी, लोकतांत्रिक प्रतिकार और संघर्ष के बाद संघ का कार्य फिर से तीव्रता के साथ प्रारंभ हुआ।

1989–90 में संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की जन्मशताब्दी के अवसर पर यह विचार उत्पन्न हुआ कि झुग्गियों में सुविधाओं के अभाव में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर अपने समाज बंधुओं के साथ नियमित संपर्क बढ़ाकर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सेवा कार्य शुरू करने चाहिए। इसी के तहत 1991 में संघ में सेवा विभाग की शुरुआत हुई। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक स्वावलंबन के क्षेत्र में आज संघ स्वयंसेवक विभिन्न सेवा संस्थाओं के माध्यम से 1,67,113 सेवा कार्य चला रहे हैं।

संघ स्वयंसेवक ऐसा कर पाते हैं, करते आ रहे हैं क्योंकि उनका वैचारिक अधिष्ठान हिन्दुत्व पर आधारित है। यह हिन्दुत्व ‘रिलिजन’ नहीं है। यह अध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि है। इसलिए आत्मीयता के आधार पर निरपेक्ष भाव से स्वयंसेवक यह ‘सेवा कार्य’ करते आ रहे हैं। कुछ लोग इसकी तुलना मिशनरियों के “सेवा” कार्य से करते हैं। वास्तविक रूप में मिशनरीज “सेवा” कार्य कन्वर्जन के लिए करते हैं। “सेवा” की यह संकल्पना मूलतः भारतीय नहीं है। ईसाई मिशनरियों द्वारा कन्‍वर्जन करने के लिए किए जा रहे “सेवा” कार्यों के कारण यह प्रचलित हुई। उनका उद्देश्य अक्‍सर ‘सेवा’ गौण और “कन्‍वर्जन” करना प्रमुख रहा है। जहां कन्‍वर्जन की संभावना नहीं होती, वहां वे सेवा कार्य नहीं करते। एक उदाहरण से यह स्पष्ट होगा।

मणिपुर में म्यांमार की सीमा के पास उखरुल नामक एक गांव है। वहां सभी लोग ईसाई हो गए थे। इसलिए वहां पढ़ाई की कोई व्यवस्था, विद्यालय नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक श्री शंकर (भैयाजी) काणे 1971 में जब वहां गए, तो उन्होंने देखा कि बच्चों के लिए पढ़ने की सुविधा नहीं है। उन्हें वहां के बच्चों के भविष्य की चिंता हुई। भैयाजी कुछ बच्चों को पढ़ाने के लिए महाराष्ट्र ले गए। पर, मणिपुर से महाराष्ट्र तक किसी अनजान व्यक्ति के साथ अपने बच्चे भेजना अभिभावकों के लिए आसान नहीं था; इसलिए भैयाजी ने उनके भरोसे के लिए महाराष्ट्र से उनके साथ आए एक 12 वर्षीय लड़के को उखरुल में ही रखा। धीरे-धीरे  विश्वास बढ़ा। प्रतिवर्ष कुछ बच्चे लगातार महाराष्ट्र पढ़ने के लिए आने लगे और उनके जीवन में उजाला आया।

पढ़ने हेतु आए सभी बच्चे ईसाई थे। भैयाजी (संघ प्रचारक) ने उन्हें हिन्दू बनाने का प्रयास नहीं किया; वे ईसाई ही रहे। पढ़‑लिखकर वापस उखरुल लौटने पर इन बच्चों ने अच्छा अर्थ अर्जित करना शुरू किया और भैयाजी की प्रेरणा से उखरुल में एक विद्यालय स्थापित किया, ताकि बच्चे वहीं रहकर पढ़ सकें। आसपास के विद्यालयों के नामों में ‘स्कूल’ या ‘हाई स्कूल’ लिखा मिलता है; पर भैयाजी की प्रेरणा से स्थापित इस विद्यालय का नाम ‘ओझा शंकर विद्यालय’ रखा गया है (स्थानीय बोली में समाज के बुजुर्गों को सम्मानपूर्वक ‘ओझा’ कहा जाता है)।

‘सेवा’ शब्द के परिचय से पहले भारत में ऐसे सभी कार्यों को ‘धर्म’ की श्रेणी में समझा जाता था और आज भी समझा जाता है। यहां ‘धर्म’ रिलीजन नहीं है। रिलीजन को हमारी भाषा में ‘उपासना’ कह सकते हैं। भारत में ‘धर्म’ आध्‍यात्मिकता का प्रकटीकरण है। भारत की जीवनदृष्टि अध्यात्म-आधारित होने के कारण एकात्म और सर्वांगीण है; वह सम्पूर्ण सृष्टि को अध्यात्म से परस्पर जुड़ा मानती है। इसलिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आचरण भारत में प्राचीन समय से होता आ रहा है। जब ‘मैं’ को छोटा किया जाता है और आंखें खोलीं जाती हैं, तो स्वाभाविक रूप से ‘हम’ का दायरा बड़ा होता है। जो ‘अपने’ नहीं, वे भी ‘अपने’ लगने लगते हैं। ऐसे ‘अपनेपन’ (आत्मीयता) के भाव से उनके लिए कुछ करने की प्रेरणा उत्पन्न होती है। समाज के प्रति अपनेपन के भाव से कुछ देना, समाज को वापस लौटाना; यही सच्चा धर्म है।

स्वामी विवेकानंद की आयरिश मूल की शिष्या भगिनी निवेदिता ने कहा है कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का फल (पारिश्रमिक) अपने ही पास न रखकर समाज को देते हैं, वह समाज ऐसे एकत्र पारिश्रमिक (सामाजिक पूंजी) से समृद्ध होता है और समाज के प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर भी सुधरता है। समाज की इस सामाजिक पूंजी को बनाए रखना ही ‘धर्म’ है। रिलीजन ‘धर्म’ नहीं है, उपासना है। उपासना करते रहने से ‘मैं’ छोटा होने और ‘हम’ के व्यापक होने में सहायता मिलती है। उपासना से ‘धर्म’ के आचरण में भी मदद मिलती है। उपासना स्वयं ‘धर्म’ नहीं है।

भारतीय चिंतन में भौतिक समृद्धि (अभ्युदय) और मोक्ष (निःश्रेयस), दोनों के लिए प्रयत्न को समान महत्व दिया गया है। इसलिए धर्म का वर्णन “यतोऽभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि: स धर्म:” के रूप में हुआ है। उत्पादन में प्रचुरता, वितरण में समानता और उपभोग में संयम को आचरण का सूत्र माना गया है। संयमित उपभोग से बची हुई समृद्धि को समाज के हित में, अपनेपन के भाव से समर्पित करना ही ‘धर्म’ है। इससे सामाजिक पूंजी बढ़ती है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा है कि समाज को देना ‘चैरिटी’ है और समाज को वापस लौटाना ‘धर्म’ है।

भारत सदियों से यही परंपरा निभाता आया है। तीर्थयात्रियों के रहने के लिए बने आवास को ‘धर्मशाला’ कहा जाता है। ‘धर्मादाय’ दवाखाने में सभी को चिकित्सकीय सहायता दी जाती है। पहले के समय में सड़कें बनवाना, छाया के लिए वृक्ष लगवाना, जल के लिए कुआं या बावड़ी बनवाना, तीर्थक्षेत्र में नदी पर घाट बनवाना; ये सभी ‘धर्म’ कार्य माने जाते थे।

द्वितीय महायुद्ध के समय रूस ने जब पोलैंड पर आक्रमण किया, तो 675 महिलाएं और बच्चे जान बचाने के लिए एक जहाज पर बैठकर भागे थे। कई देशों ने उन्‍हें आश्रय (asylum) देने से इनकार किया। ब्रिटिश शासन के दौरान मुंबई में आश्रय मांगने पर भी अंग्रेजों ने उन्‍हें अनुमति नहीं दी, जबक‍ि वे ईसाई मत के थे। जब यह बात जामनगर (गुजरात) के महाराजा को पता चली, तो उन्होंने ब्रिटिश शासन से आग्रह किया, आप इन्हें मुंबई में उतरने दीजिए। मैं सभी को अपने राज्‍य में ले आऊंगा। फिर भी अंग्रेजों ने अनुमति नहीं दी। अंततः जामनगर के महाराजा ने उन्‍हें समुद्र मार्ग से जामनगर बुलाया और वहां जामनगर के पास बालाचेड़ी में सभी के रहने की व्‍यवस्‍था की और भोजन हेतु गोवा से सात रसोइये बुलवाए (उन्‍हें शाकाहारी नहीं बनाया)। अंग्रेज सरकार का अधिक दखल न हो, इसलिए महाराजा ने प्रत्येक महिला को अपनी ‘बेटी’ तथा प्रत्येक लड़के को अपना ‘पुत्र’ मानते हुए 675 दत्तक-पत्र (adoption papers) पर हस्ताक्षर किए और कहा, “आप मेरे पुत्र और मेरी पुत्री हैं; जब तक चाहें यहीं रहिए।” वे लोग जामनगर में लगभग 9 वर्ष तक रहे। युद्ध के पश्चात् वे पोलैंड लौट गए। जामनगर के महाराजा के प्रति कृतज्ञता स्वरूप पोलैंड की राजधानी में एक चौक का नाम “गुड महाराजा स्क्वेयर” रखा गया है।

12 नवंबर 1996 की रात्री को हरियाणा के चरखी- दादरी के पास सउदी अरब और कझाक एअरलाइन्स के दो विमान आपस में टकाराये और नीचे गिरे। दोनों विमानों में कुल 351 प्रवासी थे, जिनमें से 300 मुसलमान और 12 इसाई थे। दुर्घटना के तुरंत बाद जिला संघचालक श्री. जीतराम जी, अन्य स्वयंसेवक और डॉ. हेडगेवार चिकित्सालय के चिकित्सक दुर्घटना स्थल पर पहुंचे। अंधेरे के कारण पेट्रोमॅक्स और जनरेटर का प्रबंध कराया तथा तत्काल; सभी शवों को भिवानी के चिकित्सालय में पहुंचाया गया। समाचार फैलते ही सुबह तक मृतकों के परिजन, पुलिस प्रशासन, पत्रकार आदि वहां आने लगे। मृतकों के शव उनके परिजनों को सौंपे गये। जिनके परिजनों के बारे में जानकारी नहीं मिली, ऐसे 76 मुसलमान तथा 3 ईसाईयीं को उनकी आस्था, विधान के अनुसार दफनाया गया। इसमें स्थानीय मौलवी और मुंबई से आये कुछ लोगों ने सहयोग दिया। तीन दिन बाद 15 नवंबर को दादरी की मस्जिद में आयोजित धन्यवाद सभा में जिला संघचालक जीतराम जी को सम्मानित किया गया, अधिकांश समाचार पत्रों में शीर्षक था – “मस्जिद में खाकी निक्कर और भगवा पट्टी का सम्मान”।

यह स्वयंसेवकों द्वारा धर्म का ही प्रकटीकरण था। जामनगर के महाराजा का कार्य शुद्ध ‘धर्म’ से प्रेरित था। भैयाजी काणे द्वारा मणिपुर में बच्चों की पढ़ाई के लिए जो पहल की गई, वह भी ‘धर्म’ से प्रेरित थी। आध्यात्मिकता के कारण वे सहज रूप से उनसे जुड़ पाए, उनकी पीड़ा को समझ सके और उन्हें उस पीड़ा से मुक्त करने के लिए बिना किसी भेदभाव के जो संभव था, किया। यही सच्चा धर्म है।

इसलिए सूत्र रूप में कह सकते हैं कि –

व्यक्ति ‘धर्मप्रवण’ बने और समाज धर्माधिष्ठित रहे (धर्म निरपेक्ष नहीं) यह संघ का प्रयास है। ऐसा समाज निर्माण करना माने राष्ट्र का हिन्दू बनना है। जब सेवा की बात आती है तो वह ‘धर्म’ के रूप में करने की भारत की परंपरा रही है। इसे स्वामी विवेकानंद ने ‘शिव’ भाव से ‘जीव’ सेवा करने के लिए कहा है। To serve man (Jeeva) is to worship God (Shiva).

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