Headlines

लोकतंत्र बनाम रिजीम चेंज

लोकतंत्र की कतंत्र की मूल अवधारणा में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) का एकमात्र वैध, शान्तिपूर्ण और संवैधानिक माध्यम स्वतंत्र चुनाव होता है। लेकिन 21 वीं सदी में विश्व स्तर पर एक नया राजनीतिक ‘टूलकिट’ ‘कलर रिवोल्यूशन’ (Color Revolution) का खतरनाक मॉडल विकसित हुआ है। इस मॉडल के तहत, एक चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने या उसे सत्ता से बेदखल करने के लिये मतपेटी (Ballot Box) का नहीं, बल्कि सड़कों पर अराजकता, प्रायोजित छात्र आन्दोलनों, विदेशी नैरेटिव और संस्थागत विरोध का सहारा लिया जाता है।
फ्रांस, नेपाल और हाल ही में बांग्लादेश में जो घटनाक्रम देखने को मिले हैं, वे इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि कैसे नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में सुनियोजित सत्ता परिवर्तन के प्रयास किये जाते हैं। आज यही वैश्विक एजेण्डा भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका सबसे ताजा उदाहरण अक्टूबर 2026 में दिल्ली में हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आन्दोलन है।


सत्ता परिवर्तन के प्रयास : सीजेपी आन्दोलन का यथार्थ

भारत, जो कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, अब इसी ‘बांग्लादेश मॉडल’ के निशाने पर है। अक्टूबर 2026 में देश की राजधानी दिल्ली में जो घटनाक्रम देखने को मिला, वह इसी वैश्विक षड्यंत्र की एक भारतीय कड़ी प्रतीत होता है। हाल ही में अस्तित्व में आई कॉकरोच जनता पार्टी नामक एक नयी संस्था ने, जिसके संस्थापक अभिजीत दीपके हैं। दिल्ली में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया। दीपके के साथ वामपंथी छात्र संगठन आइसा (AISA) की नेता नेहा बोरा, और योगेन्द्र यादव तथा प्रशान्त भूषण जैसे अनुभवी एक्टिविस्टों ने मिलकर दिल्ली को बन्धक बनाने का प्रयास किया। इस आन्दोलन का सतही और घोषित एजेण्डा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और चुनाव आयोग (Election Commission) की कार्यप्रणाली का विरोध था। दिल्ली के कनॉट प्लेस में ‘तिरंगा मार्च’ के नाम पर भीड़ जुटायी गयी और एम्स (AIIMS) से जन्तर-मन्तर तक मार्च निकाला गया। इसके जवाब में शान्ति भंग होने और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका में पुलिस ने निवारक कार्रवाई (Preventive action) करते हुए अभिजीत दीपके और नेहा बोरा को हिरासत में भी लिया।


मुखौटे के पीछे का असली खेल

आन्दोलन का असली चेहरा तब उजागर हुआ जब वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण ने प्रेस क्लब में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में खुलेआम यह स्वीकार किया, ‘हाँ, हम सत्ता परिवर्तन (Regime Change) चाहते हैं… अगर ऐसी बर्बरता जारी रही, तो निश्चित रूप से सत्ता परिवर्तन होगा… हम सब सत्ता परिवर्तन चाहते हैं, क्या इसमें कुछ गलत है?’। उनका यह बयान स्पष्ट करता है कि यह आन्दोलन किसी विशिष्ट नीति, ईवीएम या चुनाव आयोग की कमियों के खिलाफ नहीं था, बल्कि भारत की स्पष्ट बहुमत वाली चुनी हुई सरकार को असंवैधानिक रूप से उखाड़ फेंकने के लिये रचा गया था।

प्रेस वार्ता के दौरान प्रशान्त भूषण से बात
करती आइसा राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा
बोरा।


विवाद को और बढ़ाते हुए, कथित तौर पर नेहा बोरा और उनके समर्थकों द्वारा यह नैरेटिव गढ़ा गया कि ‘बांग्लादेश ने हमें रास्ता दिखाया है और हम बांग्लादेश के उन युवाओं के साथ एकजुट हैं जिन्होंने वहाँ सत्ता परिवर्तन किया’। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है; यह भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण देश में एक अराजक और हिंसक तख्तापलट का खुला आह्वान है। भारत में किसी भी दल को सत्ता से हटाने का अधिकार केवल भारत की जनता के पास है, जो शान्तिपूर्ण मतदान के जरिये अपना फैसला सुनाती है, न कि सड़कों पर आगजनी करने वाली भीड़ के जरिये।


सीजेपी आन्दोलन व सत्ता परिवर्तन के नैरेटिव की आलोचना

इन अन्तरराष्ट्रीय प्रयोगों और भारत में हुए हालिया प्रयासों का गहरायी से विश्लेषण करने पर इस टूलकिट (toolkit) की कई गम्भीर कमियाँ और खतरनाक मंतव्य सामने आते हैं:

संविधान की आड में असंवैधानिकता का खेल

इन आन्दोलनों की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि आन्दोलनकारी हाथों में भारत का संविधान लेकर भारत की ही संवैधानिक संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग, न्यायालय और संसद) को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।


प्रशांत भूषण जैसे लोग जब यह कहते हैं कि ‘सत्ता परिवर्तन हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है’, तो वे इस सत्य को चतुरायी से छिपा जाते हैं कि सत्ता परिवर्तन का अधिकार ‘मतदान’ के दिन होता है, न कि हर दिन सड़कों पर भीड़ जुटाकर सरकार को डराने धमकाने में।

दिल्ली में प्रदर्शन करते कॉकरोच जनता पार्टी व आइसा के प्रदर्शनकारी।

युवाओं का ढाल के रूप में उपयोग

बांग्लादेश की तर्ज पर ही भारत में भी अभिजीत दीपके (जो पहले आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया और रणनीतिक संचार से भी जुड़े रहे हैं) और नेहा बोरा जैसे युवा चेहरों को जानबूझकर आगे किया गया। इसके पीछे की कुत्सित राजनीति यह है कि जब राज्य व्यवस्था और पुलिस कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिये इन पर कोई भी दण्डात्मक या निवारक कार्रवाई (जैसे एसईएम कोर्ट में पेशी या हिरासत) करती है, तो उस कार्रवाई को तुरन्त ‘छात्रों पर अत्याचार’, ‘लोकतंत्र की हत्या’ और ‘तानाशाही’ बताकर अन्तरराष्ट्रीय मीडिया में प्रसारित किया जाता है। यह रणनीति राज्य को नैतिक रूप से पंगु बनाने के लिये इस्तेमाल की जाती है।

अर्थव्यवस्था व जनजीवन का अपहरण

अभिजीत दीपके ने अपने बयान में तर्क दिया कि ‘शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से व्यवसायों को नुकसान नहीं होता, बल्कि सरकार द्वारा शहर बन्द करने और इंटरनेट रोकने से नुकसान होता है’। यह एक खोखला तर्क है। जब कोई संगठन कनॉट प्लेस जैसे प्रमुख व्यापारिक और यातायात केन्द्रों को अवरुद्ध करने का ऐलान करता है, तो प्रशासन के पास सुरक्षा और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबन्ध लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसे आन्दोलनों का वास्तविक उद्देश्य ही देश की आर्थिक रीढ़ को चोट पहुँचाना और आम जनजीवन को बाधित कर सरकार पर दबाव बनाना होता है।

वैश्विक परिदृश्य

इस वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिये हमें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जैसे-फ्रांस, नेपाल और बांग्लादेश में हालिया सत्ता परिवर्तन और उग्र आन्दोलनों के प्रयोगों को समझना होगा-

फ्रांस में प्रदर्शन करते 'येलो वेस्ट' (Gilets Jaunes) के प्रदर्शनकारी।

फ्रांस : स्ट्रीट वीटो का अन्तहीन चक्र

यूरोप के सबसे पुराने और मजबूत लोकतंत्रों में से एक, फ्रांस, अक्सर सड़कों की इस भीड़तंत्र का शिकार होता रहा है। वहाँ ‘येलो वेस्ट’ (Gilets Jaunes) आन्दोलन हो या हाल के वर्षों में पेंशन सुधारों की आयु सीमा बढ़ाने और पुलिस की गोलीबारी के बाद हुए देशव्यापी हिंसक दंगे, हर बार एक ही पैटर्न देखने को मिला है। एक छोटी सी चिंगारी या विशिष्ट नीतिगत विरोध को एक व्यापक हिंसक आन्दोलन में बदल दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य राजधानी पेरिस की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाना और निर्वाचित सरकार को घुटने टेकने के लिये मजबूर करना होता है। फ्रांस में इन आन्दोलनों ने भले ही पूरी तरह से सरकार का तख्तापलट न किया हो, लेकिन इन्होंने संसद की सर्वोच्चता को भीड़ के माध्यम से लगातार चुनौती दी है। यह स्ट्रीट वीटो का मॉडल स्थापित करता है, जहाँ चुनाव हारने वाला पक्ष सड़कों पर हिंसक वीटो के जरिये अपनी बात मनवाने का प्रयास करता है।

नेपाल : अस्थिरता का स्थायी रोग

दक्षिण एशिया में नेपाल राजनीतिक अस्थिरता और निरन्तर सत्ता परिवर्तन की एक दुःखद प्रयोगशाला बन चुका है। 2008 में राजशाही के खात्मे और लोकतंत्र की स्थापना को एक ऐतिहासिक जीत के रूप में पेश किया गया था। लेकिन उसके बाद से नेपाल में विदेशी हस्तक्षेप, माओवादी उग्रवाद और आन्तरिक राजनीतिक स्वार्थों के कारण एक भी सरकार अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी है। सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया जब संसद से निकलकर सड़कों, घेराव और विदेशी दूतावासों के इशारे पर तय होने लगती है, तो देश कभी स्थिर नहीं हो पाता। नेपाल का उदाहरण यह साबित करता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की कीमत पर होने वाला हर सत्ता परिवर्तन देश को दशकों पीछे धकेल देता है।

बांग्लादेश : ‘छात्र क्रान्ति’ की आड में तख्तापलट

बांग्लादेश में प्रदर्शन करते लोग।

सत्ता परिवर्तन के इस टूलकिट का सबसे ज्वलन्त और विनाशकारी उदाहरण अगस्त 2024 में बांग्लादेश में देखने को मिला। जो आन्दोलन शुरुआत में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्रों के एक शान्तिपूर्ण विरोध के रूप में शुरू हुआ था, उसे कुछ ही हफ्तों में एक पूर्ण सत्ता परिवर्तन (Regime Change) के हिंसक अभियान में बदल दिया गया। शेख हसीना की चुनी हुई सरकार को असंवैधानिक रूप से अपदस्थ कर दिया गया। इस बदलाव को ‘युवा और छात्र क्रान्ति’ का नाम दिया गया, लेकिन इसके परिणाम भयानक रहे। सत्ता के इस पॉवर वैक्यूम में अल्पसंख्यकों पर बर्बर हमले हुए, संसद और सर्वोच्च न्यायालय जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया और देश को एक अनियंत्रित अराजकता में धकेल दिया गया। यह तथाकथित क्रान्ति दरअसल एक सॉफ्ट कूप (Soft Coup) थी, जिसने विकासशील देशों को अस्थिर करने का एक नया ब्लूप्रिंट तैयार कर दिया।


विदेशी मॉडलों का अन्धानुकरण, भारत की सम्प्रभुता को खतरा

भारत न तो फ्रांस है, न नेपाल, और न ही बांग्लादेश। फ्रांस में एक सजातीय समाज है, नेपाल और बांग्लादेश में संस्थाएँ कमजोर थीं जिन्हें एक उग्र भीड़ ने आसानी से कुचल दिया। लेकिन भारत में एक अत्यन्त मजबूत संवैधानिक और संस्थागत ढाँचा मौजूद है। वामपंथी छात्र संगठनों और प्रशान्त भूषण जैसे नेताओं द्वारा बांग्लादेश मॉडल की प्रशंसा करना यह दर्शाता है कि इन नेताओं का भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे से पूरी तरह विश्वास उठ चुका है। वे एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ “क्रान्ति” और सड़कों पर “खून बहाने” (जैसा कि उनके आलोचकों का आरोप है) की बातें कर रहे हैं। एक अरब से अधिक आबादी वाले देश में ‘कलर रिवोल्यूशन’ का कोई भी प्रयास देश को एक अकल्पनीय गृहयुद्ध और सामाजिक विभाजन की ओर धकेल सकता है।

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हिंसा करते युवा और घायल पुलिसकर्मी।

लोकतंत्र में सरकारों की आलोचना करना, उनसे कठिन सवाल पूछना, नीतियों का विरोध करना और उनके खिलाफ शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करना एक स्वस्थ नागरिक समाज की पहचान है। लेकिन ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) के नाम पर देश की सड़कों पर अराजकता फैलाना, चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं को दबाव में लेना और पड़ोसी देशों के हिंसक तख्तापलट का महिमामण्डन करना कभी भी लोकतांत्रिक अधिकार नहीं माना जा सकता। फ्रांस से लेकर नेपाल और बांग्लादेश तक के कड़वे अनुभव हमें यह चेतावनी देते हैं कि जब सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई संसद और मतपेटी से निकलकर सड़कों की अनियंत्रित भीड़ और प्रायोजित टूलकिट के हाथों में चली जाती है, तो उस लड़ाई में सरकार नहीं, बल्कि अंततः आम नागरिक और देश का लोकतंत्र हारता है। हालिया ‘सीजेपी’ आन्दोलन और उसमें योगेन्द्र यादव, प्रशान्त भूषण, अभिजीत दीपके तथा नेहा बोरा की भूमिका का मूल्यांकन इसी व्यापक खतरे के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए। भारत जैसे परिपक्व लोकतंत्र में बदलाव हमेशा मतपेटी से आना चाहिये, न कि अराजक और हिंसक सड़क प्रदर्शनों से।

Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *