क्रान्तिकारी : रानी अवन्तीबाई लोधी
मध्य प्रदेश के रामगढ़ राज्य की रानी अवन्तीबाई लोधी ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। रानी अवन्तीबाई के पिता राव जुझार सिंह 187 गाँवों के जमींदार थे। अवन्तीबाई की सम्पूर्ण शिक्षा घर पर ही हुई थी। घर पर ही उन्होंने तलवारबाजी सहित अन्य हथियार चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया। कम आयु में ही वह युद्धकौशल में पूर्णरूपेण दक्ष हो गयी थीं। अवन्तीबाई का विवाह राजा लक्ष्मण सिंह लोधी के पुत्र विक्रमादित्य के साथ सम्पन्न हुआ। राजा लक्ष्मण सिंह ने रामगढ़ की रियासत में 33 वर्षों तक राज किया। रानी अवन्तीबाई के पति राजा विक्रमादित्य बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। अतः राज्य का संचालन रानी ही करती थीं।
एक बार रानी ने राजा विक्रमादित्य से कहा कि, उन्होंने स्वप्न में एक चील को आपका मुकुट ले जाते देखा है। ऐसा लगता है कि कोई संकट आने वाला है। राजा ने कहा “हाँ, वह संकट अँग्रेजों की तरफ से आने वाला है पर मेरी रुचि पूजा-पाठ में अधिक हो गयी है इसलिये तुम ही राज सम्भालकर इस संकट से निपट लो।”
रानी इस विषय को लेकर एक बार मंत्रियों के साथ बैठी ही थीं कि लार्ड डलहौजी का दूत एक पत्र लेकर आया। उसमें लिखा था कि राजा के विक्षिप्त होने के कारण हम शासन की व्यवस्था के लिये एक अँग्रेज अधिकारी नियुक्त करना चाहते हैं। रानी समझ गयी कि सपने वाली चील आ गयी है तब रानी ने उत्तर दिया कि मेरे पति स्वस्थ हैं। मैं उनकी आज्ञा से तब तक काम देख रही हूँ जब तक मेरे बेटे अमन सिंह और शेर सिंह बड़े नहीं हो जाते। अतः रामगढ़ को अँग्रेज अधिकारी की कोई आवश्यकता नहीं है। पर डलहौजी तो राज्य हड़पने का निश्चय कर चुका था। उसने अँग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिया। इस बीच राजा का निधन हो गया। अब रानी ने पूरा कार्य सम्भाल लिया। वह जानती थी कि देर-सवेर अँग्रेजों से मुकाबला होगा ही अतः उसने आसपास के देशभक्त सामन्तों तथा रजवाड़ों से सम्पर्क किया। अनेक सामन्त तथा रजवाड़ों ने रानी का साथ देने का साहसिक निर्णय कर लिया। 1857 में नाना साहब पेशवा के नेतृत्व में अँग्रेजों को बाहर निकालने के लिये संघर्ष की तैयारी हो रही थी। रामगढ़ में भी क्रान्ति का प्रतीक लाल कमल और रोटी घर-घर घूम रही थी। रानी ने भी इस यज्ञ में अपनी आहुति देने का निश्चय कर लिया। उनकी तैयारी देखकर अँग्रेज सेनापति वाशिंगटन ने हमला बोल दिया।
रानी ने बिना घबराये खैरी गाँव के पास वाशिंगटन को घेर लिया। रानी के अदभुत कौशल और वीरता से अँग्रेजों के पाँव उखड़ने लगे। इसी बीच वाशिंगटन रानी को पकड़ने के लिये अपने घोड़े सहित रानी के पास आ गया। रानी ने तलवार की वार से घोड़े की गरदन उड़ा दी। वाशिंगटन नीचे गिर पड़ा और प्राणों की भीख माँगने लगा। रानी ने उसे छोड दिया
जीवनदान मिलने के बाद वाशिंगटन ने फिर धोखा दिया और वह 1858 में फिर रामगढ़ आ धमका। इस बार उसके पास पहले से अधिक सेना व रसद थी। उसने किले को घेर लिया लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी वह किले में प्रवेश नहीं कर सका। इधर किले में रसद समाप्त हो रही थी। अतः रानी कुछ विश्वासपात्र सैनिकों के साथ एक गुप्तद्वार से बाहर निकल पड़ी। इसी बीच किले के द्वार खोलकर भारतीय सैनिक अँग्रेजों पर टूट पड़े। पर वाशिंगटन को रानी के भागने की खबर मिल गयी और वह एक टुकड़ी लेकर पीछे दौड़ा। देवहारगढ़ के जंगलों में दोनों की मुठभेड़ हुई।
वह 20 मार्च 1858 का ऐतिहासिक दिन था जब रानी ने काल का रूप धारण कर लिया था। वह रणचण्डी बनकर शत्रुओं पर टूट पड़ी थी। अचानक एक फिरंगी के वार से रानी का एक हाथ टूट गया और तलवार छूट गयी। रानी समझ गयी कि अब मृत्यु निकट है। उन्होंने जेल में सड़ने की अपेक्षा मरना उचित समझा। कटार निकाली और अपने सीने में घुसा ली। अगले ही क्षण रानी का मृत शरीर घोड़े पर झूल गया और वह राष्ट्र की रक्षा में बलिदान हो गयी।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात रानी अवन्तीबाई को प्रदर्शनी और लोकथाओं के माध्यम से स्मरण किया जाता है। ऐसा ही एक लोकगीत इस क्षेत्र की वनवासी जनजाति गोंड लोगों का है जिसका अर्थ निम्नवत है-
‘जो रानी हमारी माता है, वह अँग्रेजों पर बार-बार प्रहार करती हैं। वह जंगलों की मुखिया है और उसने अन्य शासकों को पत्र और चूड़ियाँ भेजी और उन्हें इस उद्देश्य से जोड़ा। उन्होंने अँग्रेजों को परास्त किया और बाहर धकेल दिया, हर गली में उन्होंने अँग्रेजों को आतंकित कर दिया, ताकि वे जहाँ भी रास्ता मिले भाग जाएँ। जब भी वह घोड़े पर सवार होकर युद्ध के मैदान में प्रवेश करती थीं, बहादुरी से लड़ती थीं और तलवार और भाले का राज होता था। अरे वो तो हमारी रानी माँ थी।”
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने जबलपुर में बरगी बाँध परियोजना के एक भाग का नाम रानी अवन्तीबाई के सम्मान के नाम पर रखा है। रानी अवन्तीबाई के सम्मान में 20 मार्च 1988 और सितम्बर 2001 को दो डाक टिकट जारी किये गये थे। रामगढ़ में महल के खण्डहरों से कुछ दूरी पर पहाड़ी के नीचे की ओर रानी की समाधि है जो अत्यन्त जर्जर अवस्था में है। यही पर रामगढ शासकों की अन्य समाधियों भी बनी है
