युग प्रवर्तक स्वतंत्रता सेनानी डॉ. हेडगेवार

युग प्रवर्तक स्वतंत्रता सेनानी डॉ. हेडगेवार

वतंत्रता संग्राम के अग्रणी योद्धा डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जन्मजात स्वतंत्रता सेनानी थे। बाल्यकाल से लेकर जीवन के अन्तिम श्वास तक देश की स्वतंत्रता के लिये संघर्षरत रहे डॉक्टर हेडगेवार ने-

“नहीं चाहिये पद, यश, गरिमा,

सभी चढ़े माँ के चरणों में।

भारत माता की जय केवल,

शब्द पड़े जग के कणों में।।”

के सिद्धान्त पर अटल रहते हुए न तो अपनी आत्मकथा लिखी और न ही समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बटोरी। इस अज्ञात स्वतंत्रता सेनानी का समस्त जीवन ही मातृ भूमि की स्वतंत्रता के लिये समर्पित था।

स्वतंत्रता समर महानायक महात्मा गांधी के नेतृत्व में आयोजित असहयोग आन्दोलन एवं दाण्डी यात्रा में सक्रिय भूमिका निभाने वाले डॉ. हेडगेवार ने दो बार एक-एक वर्ष के कठोर कारावास की यातनाएँ भोगी। वह एक आदर्श सत्याग्रही थे।

8 वर्ष की आयु में बाल केशव ने ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया राज्यारोहण के अवसर पर विद्यालय के समारोह में विक्टोरिया की प्रशंसा में गीत गाने से मना कर दिया और विद्यालय में बाँटी गयी मिठायी को यह कहकर कूड़ेदान में फेंक दिया कि मैं हमारे देश को गुलाम बनाकर शासन करने वाली महारानी के। राज्यरोहण के उपलक्ष्य में दी जाने वाली मिठायी को कूड़ा ही मानता हूँ इसलिये कूड़ेदान में डाल रहा हूँ।

12 वर्ष की आयु में एडवर्ड सप्तम के राज्यरोहण के उपलक्ष्य में आयोजित आतिशबाजी को देखने जाने के लिये यह कहकर मना कर दिया कि यह हमारे लिये प्रकाश का नहीं अंधकार का समय है। नागपुर के सीतावडीं किले पर फहरा रहे ब्रिटिश झण्डे को देखकर मन में आक्रोश उठता था अतः मात्र 13 वर्ष की आयु में अपने बाल सखाओं को साथ लेकर अपने गुरु जी के खाली पड़े घर से सुरंग खोदकर किले से यूनियन जैक उतारकर उनके स्थान पर भगवा ध्वज फहराने की योजना बना डाली, इतनी बड़ी सुरंग खोद डालना कहाँ सम्भव था ? गुरुजी ने घर आकर देखा तो केशव ने अपने मन का संकल्प बता दिया, गुरु जी ने केशव के साहस व संकल्प को देखकर बालकों को गले लगा लिया और समझाया कि यह सम्भव नहीं। बाल केशव की यह तीनों घटनाएँ इस बात की साक्षी है कि उसके तो रग-रग में स्वतंत्रता की ज्वाला धड़क रही थी। यह अद्भुत और अंनूठा उदाहरण है। ऐसे बाल स्वतंत्रता सेनानी को नमन। इतना ही नहीं नागपुर के नील सिटी हाई स्कूल में निरीक्षण के लिये आये एक अंग्रेज इंस्पेक्टर का केशव ने अपने सहपाठियों के साथ योजना बनाकर वन्दे मातरम् का उद्घोष से स्वागत किया। इस पर इंस्पेक्टर ने स्कूल के प्रधानाचार्य पर दबाव डलवाकर विद्यार्थियों से क्षमा याचना करवाई पर बाल केशव ने क्षमा माँगने से मना कर दिया और स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था। निष्कासन की कीमत अदा करके भी देश के स्वाभिमान के साथ समझौता न करने का यह अनुपम उदाहरण है। कलकत्ता के मेडिकल कॉलेज में अध्ययन के समय क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में रहकर उनके बीच भूमिका सम्पर्क सूत्र का काम किया, धन की व्यवस्था की और ‘कोकेन’ नाम से प्रसिद्ध क्रान्तिकारी संस्था ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य हो गये। पढ़ायी पूरी कर कलकत्ता से लौटने पर घर गृहस्थी न बसाकर अधिक सक्रियता से क्रान्तिकारी गतिविधियों में जुट गये।

1904 में मात्र 15 वर्ष की आयु में बम बनाना सीख लिया और 1908 में पुलिस चौकी पर बम फेंक दिया कुछ समय बाद मध्य प्रदेश व विदर्भ में क्रान्तिकारी कार्यों की जिम्मेदारी सम्भाल क्रान्तिकारियों का एक नेटवर्क तैयार किया। 1921 में देश में असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हो गया, इस आन्दोलन को गति देने और लोगों को जोड़ने के लिये अंग्रेजी शासन के विरोध में स्थान-स्थान पर उग्र एवं प्रभावी भाषण देने लगे।

उनके भाषणों से घबराकर सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा दायर किया। डॉक्टर जी ने मुकदमे की पैरवी स्वयं ही की और न्यायालय में अपने बचाव में जो भाषण दिया उसे सुनकर मजिस्ट्रेट ने कहा यह तो मूल भाषण से भी अधिक उग्र और खतरनाक है और एक वर्ष की सजा सुनाकर कारागार में बन्द कर दिया गया। कारागार में रहते हुए डॉक्टर जी ने उनके समान ही कारागार में बन्द अनेक स्वातंत्र्य सेनानियों व नेताओं से विचार-विमर्श किया और देश व समाज के तात्कालिक परिस्थिति और ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर गहन चिन्तन किया।

उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था कि आखिर इस विशाल देश में बार-बार विदेशी आक्रमणकारियों से पदाक्रान्त क्यों को होना पड़ता है और क्योंकर हमें परतंत्र होना पड़ता है? राजनैतिक स्वंतत्रता आवश्यक तो है पर क्या मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता को पूर्ण एवं स्थायी स्वतंत्रता कहा जा सकता है? इस चिन्तन में से जो उत्तर मिला, वह यह था कि स्वतंत्रता एक बहुआयामी, हुआयामी, बहुपक्षीय संकल्पना है। इसे भौगोलिक, राजनीतिक, संवैधानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, सामाजिक आदि अनेक पक्ष हैं। महर्षि अरविन्द की तरह डॉक्टर जी को भी यह लगा था कि कुछ समय बाद राजनैतिक स्वतंत्रता तो मिल जायेगी पर मुख्य प्रश्न इसके सब पक्षों को संवारने और इस स्वतंत्रता को टिकाये रखने का है।

डॉक्टर हेडगेवार एक स्वाभिमानी, स्वावलम्बी, शक्तिशाली एवं समरस भारत का स्वप्न लेकर निःस्वार्थ बुद्धि एवं प्रमाणिकता से राष्ट्र व समाज समर्पित कार्यकर्ताओं के निर्माण में जुट गये थे। इसी भावना में से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ। डॉक्टर जी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह मानना रहा है कि देश व समाज को चलाने वाला तंत्र अपने ही लोगों के हाथों में रहना आवश्यक है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार कभी भी खण्डित भारत की आधी-अधूरी स्वाधीनता के पक्ष में नहीं रहे। वे तो सनातन भारत वर्ष (अखण्ड भारत) की सर्वांग स्वतंत्रता के लिये अन्तिम श्वास तक संघर्षरत रहे। संघ ऐसी ही सर्वतोन्मुखी स्वतंत्रता के लिये समर्पित एवं सतत कार्यरत है। 10

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *