
महाभारतका युद्ध प्रारम्भ हो गया था। सहसा एक रात्रिको धर्मराजके चरोंने समाचार दिया कि दुर्योधनके द्वारा उत्तेजित किये जानेपर भीष्मपितामहने प्रतिज्ञा की है कि कल वे समस्त सैन्यके साथ पाँचों पाण्डवोंको मार देंगे। पाण्डवोंमें अत्यन्त व्याकुलता फैल गयी। धर्मराजने श्रीकृष्णके पास अर्जुनको भेजा, किंतु रूखा उत्तर मिला। अन्तमें द्रौपदीने माधवके शिविरमें जाकर उनसे प्रार्थना की कि वे पाण्डवोंकी रक्षा करें।
यदि पितामहने प्रतिज्ञा की है, तो वह सत्य होकर रहेगी। ‘मैं असमर्थ हूँ।’ रूखे मुख उत्तर दे दिया गया।
‘तो क्या तुमने लम्बी-लम्बी शपथें खाकर मुझको झूठा ही आश्वासन दिया था। श्रीकृष्णके जीवित रहते उसकी सखी कृष्णाके पति परलोक सिधार जायें, इससे बढ़कर कलंक और क्या होगा ?’ द्रौपदीने खीझकर कहा।
‘एक उपाय है-तुम चुपचाप मेरे पीछे-पीछे चलो और भीष्मके शिविरमें जाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करो।’ श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा।
‘मैं तो सदा ही तुम्हारे वचनोंका अनुसरण करनेको प्रस्तुत हूँ, चलो शीघ्र।’
रातका तीसर प्रहर था। भगवान् द्रौपदीको लेकर चले। ‘अरे! तुम्हारी पंचनदीय जूतियोंको देखकर तो कोई भी पहचान लेगा। उतारो जूतियाँ जल्दी।’ श्रीकृष्णने द्रौपदीको कुछ कहनेका अवसर ही नहीं दिया और जूतियोंको लेकर अपने पीत उत्तरीयमें लपेटा और धीरेसे बगलमें दबा लिया। और कहा- ‘बस, पीछे-पीछे चली चलो। द्रौपदीने आज्ञाका पालन किया।
‘यह पितामहका शिविर है। चुपचाप अन्दर जाकर पितामहको प्रणाम करो। वे मेरा ध्यान कर रहे होंगे बैठे-बैठे। प्रणाम करना तो आभूषणोंको भली प्रकार बजाकर। मैं यहीं हूँ। मेरा पता मत बताना।’ लीलामयने आदेश दे दिया।
पितामहके शिविरमें सौभाग्यवती स्त्री, ब्राह्मण, साधु तथा श्रीकृष्णके निर्बाध प्रवेशकी आज्ञा थी। पितामह ध्यानस्थ बैठे थे। द्रौपदीने जाकर पैरोंपर मस्तक रखा। पितामहने समझा दुर्योधन अभी-अभी गया है, रानी प्रणाम करने आयी होगी। झटसे कह दिया-‘सौभाग्यवती हो, बेटी!’
‘पतियोंको मारनेकी प्रतिज्ञा करके पत्नीको सौभाग्यवती होनेका आशीर्वाद ? पितामह ! आप तो कभी असत्य नहीं बोलते। यह कैसी विडम्बना !’ द्रौपदीने पूछा।
‘ओह, पांचाली ! तू यहाँ कैसे, पुत्री! मैंने पाण्डवोंको मारनेकी प्रतिज्ञा तो की है; परंतु साथ ही यह भी कहा है कि यदि श्रीकृष्णने शस्त्र न उठाया तो ऐसा होगा ! तू यहाँ किसके साथ आयी ? बिना श्यामसुन्दरके यह सब कौन करता। बता, वे मेरे प्रभु कहाँ हैं?’ बुद्धिमान् भीष्मने सब समझ लिया।
‘मुझे धिक्कार है, जिसके यहाँ आनेमें संकोच करके श्रीकृष्णको द्वारपर रुकना पड़ता है।’ द्रौपदीके न बतानेपर भी भीष्मने स्वयं मधुसूदनको ढूँढ़ लिया। जगत्पति जूतियोंको बगलमें दबाये द्वारपर निस्तब्ध खड़े मुसकुरा रहे थे। भीष्म चरणोंपर गिरकर रोने लगे।
‘यदि आप इसी प्रकार दस सहस्र महारथी नित्य मारते रहे तो द्रौपदी सौभाग्यवती हो चुकी।’ शिविरमें आकर आसन तथा सत्कार ग्रहण करके केशवने कहा।
‘आप जो चाहते हैं, वह तो होगा ही। मेरे मुखसे ही मेरी मृत्युका उपाय आपको सुनना है तो मैं वह भी बता दूंगा; किंतु कलके युद्धमें मेरी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनी होगी।’ पितामहने गद्गद स्वरमें प्रार्थना की। वहाँसे पितामहके रथमें बैठकर द्रौपदीको लेकर श्रीकृष्ण धर्मराजके शिविरमें लौट आये। पूरा समाचार जानकर पाण्डवोंका समस्त शोक दूर हो गया।