वर्ष प्रतिपदा : एक खगोलीय-सांस्कृतिक पर्व
पयोदकान्त मिश्र
भारतीय नववर्ष और पंचांग का प्रथम दिवस अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही ‘वर्ष प्रतिपदा’ है। ब्रह्मपुराण के अनुसार इसी दिन सूर्योदय काल में भगवान ब्रह्मा ने ‘सृष्टि की रचना आरम्भ’ की थी। मत्स्य पुराण के अनुसार जलप्रलय के पश्चात सृष्टि की सुरक्षा के लिए भगवान विष्णु के दशावतारों में प्रथम- ‘मत्स्यावतार’ भी आज ही के दिन हुआ था। वनवास बिताकर अयोध्या पहुँचे ‘भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक‘ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सम्पन्न हुआ था अर्थात यह ‘रामराज्य की स्थापना’ का भी दिन है। यह शक्ति पूजा के ‘नवरात्र का प्रथम दिवस’ है तो द्वापर के उत्तरार्ध में धर्म की स्थापना हेतु ‘धर्मराज युधिष्ठिर के राज्याभिषेक’ का दिन भी है जिसे हम ‘युगाब्द या युधिष्ठिर संवत्सर’ के रूप में व्यवहार में लाते हैं। क्रूर शकों और हूणों को पराजित कर ‘सम्राट विक्रमादित्य के विजयोल्लास पूर्वक सिंहासनारूढ़’ होने का महान पर्व है यह। इसी दिन सिन्ध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक एवं पूज्य वरुणावतार ‘झूलेलाल जी की जयन्ती’ है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही ‘आर्य समाज की स्थापना’ किया था और ‘वेदों की ओर लौटो’ का ध्येय वाक्य दिया था। हिन्दुओं को संगठित करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम राव हेडगेवार का जन्म’ भी वर्ष प्रतिपदा के दिन ही हुआ था।
वर्ष प्रतिपदा का शाब्दिक अर्थ है ‘वर्ष का पहला दिन’। यहाँ वर्ष का तात्पर्य ‘समय अर्थात काल’ गणना से है। वर्ष अर्थात ‘पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा में लगाया गया काल’। पृथ्वी जब सूर्य का एक चक्कर पूरा कर दूसरी परिक्रमा आरम्भ करती है तो इस कलावधि को ही एक वर्ष की संज्ञा दी जाती है। इसी प्रकार ‘प्रतिपदा’ का आशय एक-एक पद अर्थात एक एक चरण आगे बढ़ने से है। वर्ष की दृष्टि से देखें तो यह पद अर्थात चरण, काल गणना के लिए बनाये गये पंचांग के दिन अथवा तिथि ही हैं जिन्हें हम वर्ष भर एक-एक दिन आगे बढ़ने के आरम्भ दिवस के रूप में देखते हैं। इस प्रकार ‘पृथ्वी द्वारा एक वर्ष में एक चक्कर पूरा करने के लिए सूर्य की नई परिक्रमा आरम्भ करने की पहली तिथि को ही वर्ष प्रतिपदा कहा जाता है।’ यह पूर्णतया खगोल एवं सांस्कृतिक मान्यता पर आधारित एक महत्वपूर्ण तिथि है।
हमारे वहाँ वर्ष को ‘देश’ के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। वर्ष अर्थात ‘एक बहुत बड़ा और विशिष्ट प्राकृतिक (भौगोलिक) भूभाग’-
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणं।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्तति।।
यहाँ ‘वर्ष से आशय देश’ से है। ‘भारत वर्ष’ अर्थात् ‘भारत देश’। एक विशिष्टता लिए ऐसा प्राकृतिक भूभाग जिसका विस्तार दक्षिण में हिन्द महासागर से उत्तर में हिमालय तक है। इस प्रकार जब हम वर्ष प्रतिपदा के ‘वर्ष’ शब्द को ‘देश’ के रूप में परिभाषित करते हैं तो इसका अर्थ है ‘देश-प्रतिपदा’। इस रूप में ‘वर्ष प्रतिपदा से आशय है देश की उत्तरोत्तर वृद्धि का प्रथम दिवस’ अर्थात देश का चरणबद्ध तरीके से एक एक पद आगे बढ़ने का प्रथम दिवस। इस प्रकार यह दिन मानव सभ्यता के विकास का पहला दिन है। ‘कृण्वंतो विश्वमार्यम्’ के संकल्प का पहला दिन। यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विस्तार के संकल्प का पहला दिन है। नये वर्ष में हम अपने देश की निरन्तर प्रगति और समृद्धि की कामना करते हैं और इसके लिए अपना यथायोग्य योगदान देने का संकल्प लेते हैं। जिससे दुनिया में ‘रामराज्य स्थापित किया जा सके और धर्म की स्थापना’ हो सके।
देश और काल की गणना के प्रथम दिवस के रूप में वर्ष प्रतिपदा का आत्मिक सम्बन्ध ‘प्रकृति के नैसर्गिक परिवर्तन’ से भी है। यह प्रकृति की नव्यता का पर्व है। यह बसन्त के शुभागामन का प्रिय सन्देश है। प्रकृति में चहुँओर नवीनता की झलक दिखने लगती है। चराचर में नवीन ऊर्जा का संचार होने लगता है। तरु-लताओ में कोमल पल्लवों का सृजन, मंजरी लदे वृक्षों की मादकता और फलों से लद जाने की आतुरता, सृष्टि संरचना का यथार्थ बोध कराती है। यह ‘नित्य नूतन चिर पुरातन’ की शाश्वत अवधारणा को प्रतिष्ठापित करता है। यह प्राकृतिक जीवन चक्र का बोध कराता है। यह उत्तरायण ‘सूर्य की ऊर्जा के रूपान्तरण’ के फलस्वरूप भारतीय प्रायद्वीप में परिलक्षित ‘परिवर्तन का प्रतीक’ है। यह नवीन ऊर्जा के संचार का द्योतक है।
वर्ष प्रतिपदा, पर्व के रूप में सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। कश्मीर में इसे ‘नवरेह’ (नवरोज/नववर्ष) के रूप् में मनाया जाता है तो दक्षिण भारतीय राज्यों कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना में ’उगादी’ (युगआदि) कहकर। उगादि अर्थात ‘युग का आरम्भ काल’। यह इस मान्यता पर आधारित है कि इसी दिन युग का आरम्भ हुआ था। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है और तभी से वर्ष की गणना भी आरम्भ हो जाती है। कहा जाता है कि महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग‘ की रचना की। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा कहा जाता है। इस दिन सभी घरों को रंगीन झण्डियों और पताकों से सजाया जाता है। प्रायः सभी घरों में एक विशेष प्रकार का मीठा औषधीय पेय बनाया जाता है जिसे कई तरह की जड़ी बूटियों को मिलाकर बनाया गया होता है। कहा जाता है कि नियमित खाली पेट पीने से यह आयुर्वेदिक औषधि नैरोग्य एवं दीर्घ जीवन प्रदान करती है। वर्ष प्रतिपदा को सिन्धी भी नववर्ष के रूप में मनाते हैं। वे इसे ‘चेटी चन्द’ कहते हैं। मणिपुर में यह दिन ‘सजिबु नोंगमा पानबा’ या ‘मेइतेई चेइराओबा’ के रूप में मनाया जाता है।
उत्तर भारत में वर्ष प्रतिपदा को नवरात्र के रूप में मनाया जाता है। नव संवत्सर के दिन घरों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ ही अनुष्ठान पूर्वक नवदुर्गा की पूजा आरम्भ हो जाती है जिसे नवरात्र कहते हैं। नौ दिनों तक चलने वाला यह त्योहार आध्यात्मिक दृष्टि से सिद्धि दायक होता है। तंत्र-मंत्र की साधना करने वालों के लिए सिद्धिप्रद यह समय अत्यन्त लाभदायक होता है। शक्ति के उपासकों के लिए नवरात्र का यह कालखण्ड वर्ष का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं ऊर्जा से परिपूर्ण समय होता है। ऐसी मान्यता है कि वर्ष भर संचित प्राकृतिक ऊर्जा का प्रस्फुटन नवसंवत्सर के प्रथम दिवस पर शक्ति के रूप में होता है जो प्रकृति में स्पष्ट रूप से यत्र तत्र सर्वत्र साकार रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है। इस अवधि में प्रतिदिन शक्तिस्वरूपा माँ दुर्गा के नए स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है। अधिकांश हिन्दू नवरात्र का व्रत, उपवास रखकर पूर्ण करते हैं।
चैत्र नवरात्र की अन्तिम तिथि नवमी को भगवान राम के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। रामनवमी के नाम से प्रसिद्ध इस तिथि को ही भगवान राम अपने तीन भाइयों के साथ अयोध्या के राजा दशरथ के वहाँ अवतरित हुए थे यह लोक विदित है कि उन्होंने अपने वनवास काल में पृथ्वी से निशचरों का समूल नाश कर रामराज्य स्थापित किया था।
नौमी तिथि मधु मास पुनीता।
सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
मध्यदिवस अति सीत न घामा।
पावन काल लोक बिश्रामा।।
भारतीय जनमानस को अपने पारम्परिक नववर्श चैत्र षुक्ल-प्रतिपदा को भव्य व दिव्य रूप में मनाना तथा अपनी नयी पीढ़ी के मानस-संस्कार में षामिल भी करना चाहिए।।
