अगर, तगर, देवदारु, चन्दन, रक्त चन्दन, गूगुल, जायफल, लौंग, चिरायता, असगन्ध, यह दसों चीजें समान भाग में लेनी चाहिए। इसके साथ में विशेष रोग की विशेष औषधियाँ भी मिला लेनी चाहिए। तैयार औषधियों का दशवाँ भाग शर्करा और दशवाँ भाग घृत मिला लेना चाहिए।
विशेष रोगों की विशेष हवन सामग्री-
शीत ज्वर – (1) पटोल पत्र, (2) नागर मोथा (3) कुटकी, (4) नीम की छाल, (5) गिलोय, (6) कुड़े की छाल, (7) करंजा (8) नीम के पुष्प।
उष्ण ज्वर – इन्द्र जौ, पटोल पत्र, नीम की गुठली, नेत्र वाला त्रायमात्र, काला जीरा, चौलाई की जड़, बड़ी इलायची।
खाँसी – मुलहटी, पान हल्दी, अनार, कटेरी, बहेड़ा, उन्नाव, बहेड़ा, उन्नाव, अंजीर की छाल।
दस्त – सफेद जीरा, दालचीनी, अजमोद, बेलगिरी, चित्रक, अतीस, सोंठ, चव्य।
अपच – तालीसपत्र, तेजपात, पोदीना की जड़, हरड़, अपल तास की छाल, नागकेशर, काला जीरा, सफेद जीरा।
यज्ञोपैथी और वनस्पतियाँ
वमन – बाय बिडिंग, पीपल, पीपला मूल, ढाक के बीज, निशोय, नीबू की जड़, आम की गुठली, प्रियंगु।
अर्श – नागकेशर, झाऊ बेर, धमासा, दारूहल्दी, नीम की गुठली का गूदा, मूली के बीज, जावित्री, कमल-केशर, गूलर के फूल।
उष्णता की अधिकता – धनियाँ, कासनी, सौंफ, बनफसा, गुलाब के फूल, आँवला, पोस्त के बीज।
जिगर, तिल्ली – राई, पीपरा मूल, पुनर्नवा, करेले की जड़, मकोय, सेमर के फूल, जामुन की छाल, अपामार्ग।
चेचक – मेंहदी की जड़, नीम की छाल, हल्दी, कलौंजी, जावित्री, बाँस की लकड़ी, खैर की छाल, श्योनाक।
धनियाँ।
जुकाम – दूब, पोस्त, कासनी, अंजीर, सौंफ, बहेड़े की गुठली का गूदा।
प्रमेह – तालमखाना, मूसली सफेद, गोखरू बड़ा, कौंच के बीज, सुपारी, बबूल के बीजों का गूदा, शतावर, इलायची छोटी।
प्रदर – कमल गट्टा, गूलर के फूल, अशोक की छाल, लौंग, कमल केशर, माजूफल, सुगन्ध वाला, अर्जुन की छाल।
वात व्याधि – ग्वारपाठे की जड़, रास्ना, बालछड़, सहजन की छाल, मेथी के बीज, पुनर्नवा, तेजपत्र।
मन्दबुद्धि – शतावरी, ब्रह्मी, ब्रह्मदण्डी, गोरखमुण्डी, शंखपुष्पी, मंडूकपर्णी, बच, माल काँगनी।
विष निवारण – बन तुलसी के बीज, अपामार्ग, इन्द्रायण की जड़, करंजा की गिरी, दारूहल्दी, चौलाई के पत्ते, बिनोले की गिरी, लाल चन्दन।
रक्त विकार – धमासा, सारवा, सारवा, कुड़े की छाल, अडूसा, सरफोंका, मजीठ, कुटकी, रास्ना।
चर्मरोग – शीतल चीनी, चोपचीनी, नीम के फूल, चमेली के पत्ते, दारूहल्दी, कपूर, मेथी के बीज, पद्माख।
मस्तिष्क रोग – बेर की गुठली का गूदा, मौलसिरी की छाल, पीपल की कोपलें, इमली के बीजों का गूदा, काकजंघ, बरगद के फूल, सिरैटी, गिलोय।
बच्चों की अस्वस्थता – अतीस, काकड़सिंधी, नागरमोथा, पीपल झोटी, धनियाँ, धाय के फूल, मुलहटी।
गर्भ पुष्टि – सौंफ, कासनी, धनियाँ, गुलाब के फूल, खन, पोस्त के बीज, लाख, इन्द्र जौ।
साँवला। क्षय – मकोय, जीवन्ती, जटामासी, गिलोय, जावित्री, शालपर्णी।
ऊपर की पंक्तियों में कुछ किस्मों के रोगों की हवन करने योग्य औषधियों के अष्ट वर्ग लिखे हुए हैं। यह सभी प्रायः समान मात्रा में लेनी चाहिए। इनमें से कोई वस्तु न मिले तो दूसरी औषधियाँ अधिक मात्रा में लेकर उसकी पूर्ति की जा सकती है। कोई वस्तु अधिक महँगी हो और उतना खर्च करने की अपनी सामर्थ्य न हो, उसे कम लेकर उसके स्थान पर दूसरी औषधियाँ बढ़ा देनी चाहिए।
हवन के अन्त में समीप रखे हुए जल पात्र में कुश, दूर्वा या पुष्प डुबो-डुबोकर गायत्री मन्त्र पढ़ते हुए रोगी पर उसका मार्जन करे, यज्ञ की भस्म रोगी के मस्तक, हृदय, कण्ठ, पेट, नाभि तथा दोनों भुजाओं से लगावे। घृत पात्र में जो घृत बच जावे, उसमें से कुछ बूँद लेकर रोगी के मस्तक तथा हृदय पर लगावे। इन सरल प्रयोगों को अनेक बार प्रयोग करके देखा गया है। साधारण औषधि चिकित्सा की अपेक्षा इसका लाभ अधिक ही रहा है। इस पद्धति को अपनाकर चिकित्सक लोग रोगियों को अधिक लाभ पहुँचा सकते हैं और रोगी भी आत्मिक तथा शारीरिक दोनों ही प्रकार के लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं।
—यज्ञ विज्ञान— प्रथम भाग से उद्धृत