Pahalgam Terror Attack : कश्मीर में पीढ़ियों से पोषित तथाकथित शान्ति का एक और वीभत्स रूप आया सामने

Pahalgam Terror Attack : कश्मीर में पीढ़ियों से पोषित तथाकथित शान्ति का एक और वीभत्स रूप हमारे सामने आ गया है। सम्पूर्ण भारत क्षुब्ध है। पर… क्या सम्पूर्ण कहना उचित है? क्या इस सम्पूर्णता में नृशंस हिन्दू-संहार की त्रासद घटना का अवमूल्यन करते हुए, छद्म कश्मीरियत की दुहाई देते हुए, हत्यारों की रक्षा करने की दुर्भावना से रक्षकों पर सन्देह आरोपित करते हुए कुटिल कुतर्की भी सम्मिलित हैं। क्या भारत सम्पूर्ण इनको मिलाकर बनता है। क्या ये भी दुखी हैं ? कदाचित् नहीं। ..और यदि हैं, तो इनका दुःख क्षुब्ध भारत से भिन्न है। मारे गये दर्जनों निरपराध हिन्दुओं में चूक वश मरे एकमात्र मुस्लिम को बलिदानी सिद्ध करते हुए, स्थानीय अपराधियों की पहचान को कश्मीर के जनसमान्य की निर्दोष छवि में छिपाते हुए, भारत माता की छाती का दूध चूसकर पले भारत भाव के चिर द्रोही जिस प्रकार इस जघन्य हिंसा के बचाव में संगठित होकर उतरे हैं, यह देखना इस हत्या-काण्ड से भी अधिक विचलित करने वाला है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ नामक अपने खण्ड काव्य में 1962-63 के मध्य भारत-चीन युद्ध की परिस्थितियों को लक्ष्य करते हुए जो पंक्तियाँ लिखी थीं, वे आज भी दोहरायी जाने योग्य हैं –

“गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?

उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;
सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;

सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,
(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)

हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,
शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।”

सर्वथा निष्किञ्चन और निःस्पृह भगवान् परशुराम किस प्रकार अवाञ्छित का प्रतिकार करने को उठ खड़े हुये, ये पंक्तियाँ उसका बीजमन्त्र हैं।

आज भारत-माता के मस्तक पर अपनी निर्दोष-निश्चिन्त सन्तानों का रक्त छलक रहा है। देश इस पीड़ा से व्याकुल है। सेना अपना प्राण-पण लगाकर इसकी चिकित्सा करना चाहती है। सौभाग्य से अब देश किसी के पंजे में नहीं है। इसकी सम्प्रभुता, शक्ति और इच्छाशक्ति स्पष्ट है। पीड़ा के परिहार की सभी सम्भव विधियाँ अपनायी जा रही हैं। लेकिन अभी यह देखना अत्यन्त पीड़ादायक है कि दशकों तक सत्ता की टपकी हुई चाशनी चाटने वाले पोषित पातकी अथवा घोषित बुद्धिजीवी यत्र-तत्र-सर्वत्र उमड़ पड़े हैं। हुआँ-हुआँ सुनायी पड़ रही है। इन्हें अकारण मारे गये नौनिहाल, खून से धो दिये गये ताजा सिन्दूर, सूने कर दिये गये आँगनों का शोक दिखाई नहीं देता। इन्हें दिखाई दे रहा है स्वर्ग, धरती वाला स्वर्ग। जिस स्वर्ग के देवताओं की उपसाना से इनका भोग-मोक्ष सिद्ध होता आया है। ये वादी की बातें करते हैं, लेकिन कबायली आक्रमण के द्वारा भारत के मस्तक कहलाने वाले भारतीय धर्म-दर्शन और आस्था के सनातन केन्द्र कश्मीर को बदल देने के दुःख पर ध्यान नहीं देते। ये भारतीय सेना के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह में मारे गये उग्रवादियों पर शोक करते हैं, परन्तु चरमपन्थी हिंसा के माध्यम से विस्थापित किये गये कश्मीरी पण्डित, जो कि कश्मीर की आत्मा जैसे हैं, उनका नाम नहीं लेते। श्रीनगर की श्री क्या है और वह कहाँ खो गयी यह इन दम्भी विश्लेषकों की चिन्ता नहीं है। अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर का ध्वंस और शताब्दियों तक उसका विस्थापन इन्हें विचलित नहीं करता, इनका इतिहास दिसम्बर बान्नबे से प्रारम्भ होता है।

आज भारत-माता के मस्तक पर अपनी निर्दोष-निश्चिन्त सन्तानों का रक्त छलक रहा है। देश इस पीड़ा से व्याकुल है। सेना अपना प्राण-पण लगाकर इसकी चिकित्सा करना चाहती है। सौभाग्य से अब देश किसी के पंजे में नहीं है। इसकी सम्प्रभुता, शक्ति और इच्छाशक्ति स्पष्ट है। पीड़ा के परिहार की सभी सम्भव विधियाँ अपनायी जा रही हैं। लेकिन अभी यह देखना अत्यन्त पीड़ादायक है कि दशकों तक सत्ता की टपकी हुई चाशनी चाटने वाले पोषित पातकी अथवा घोषित बुद्धिजीवी यत्र-तत्र-सर्वत्र उमड़ पड़े हैं।

अपनी ही छायाओं में घिरे ये ‘तमस्वी’ पहलगाम की त्रासदी का रंग बदलने पर काम कर रहे हैं। यद्यपि अब ये रंग धुलकर रहेगा। तथापि, प्रसन्नता खोजते हुए जो अबोध जन अकाल-कवलित हुए हैं, उनके पीड़ितों की पीड़ा को और बढ़ाने का दोष हमें किसे दें…

“हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?

यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?
दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।

चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।”

प्रधानमन्त्री ने कहा कि यह भारत की आत्मा पर प्रहार है।
इस कथन को समझना होगा। आत्मा पर प्रहार बन्दूक की गोली से नहीं होता। यह प्रहार बोली का है, विचार का है। यह प्रहार इन कपटजीवियों का है। नाचकर, गाकर, रोकर, चिल्लाकर अनेक युक्तियों से जो इस महापराध की प्रतिक्रिया को शिथिल करना चाहते हैं, वही वस्तुतः राष्ट्रघाती हैं।

आज जो दृश्य है उसकी एक ही चिकित्सा है और वह है दण्ड। परशुराम जी ने कहा था कि अपराध देखकर-सहकर जो चुप रहा, उसके विरुद्ध नहीं हुआ वह भी उसमें सहमत है और मेरे हाथों मारा जायेगा। अनुचित सहना भी अपराध है-

मन की व्यथा समेट, न अपनेपन तू से हारेगा
मर जायेगा स्वयं, सर्प को अगर नहीं मारेगा॥

एक लॉबी काम कर रही है- तथाकथित सेकुलर, उदार, गंगाजमनी और असल में दोगलेपन से भरी हुई। यह मुर्शिदाबाद संहार पर चुप थी। पहलगाम पर भी चुप ही रहती यदि समर्थ प्रतिक्रिया से घबरायी न होती। इस लॉबी के अपने तर्क हैं। कुछेक आपके सामने रखना उचित है।

सेकुलर कुतर्क – 1

  • यह इंटेलीजेंस फेलियर है।

(अर्थात् अपने घर में सोये या बैठे व्यक्ति को कोई बाहर से आकर गोली मार दे तो यहाँ दोष गोली मारने वाले का नहीं है बल्कि घरवाले का है कि उसने दरवाजा बन्द नहीं रखा था या सुरक्षा नहीं लगायी थी। गोली मारने वाले तो निकले ही मारने हैं, इसमें दोष कैसा।)

सेकुलर कुतर्क – 2

  • हत्यारे बाहर से आये थे। उन्हें धर्म के अनुसार न पहचाना जाए।

(अर्थात् वे जिन्न-प्रेत हैं, जिन्हें चलने को वाहन, रहने को स्थान और खाने-सोने को साधन नहीं चाहिए होते और हत्या करने के बाद वे अदृश्य हो गये। उन्हें कहीं छिपना नहीं पड़ा। उनका कोई धर्म नहीं होता और कलमा-पढ़वाने और समझने की योग्यता उन्हें गर्भ में ही मिली थी, यह कलमा अधार्मिकता का कोई सूत्र होता है जिसका किसी भी धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है।)

सेकुलर कुतर्क – 3

  • घायलों को बचाने सेना नहीं आयी। स्थानीय लोगों ने ही सहायता की, इसलिये उनको मसीहा माना जाए।

(अर्थात् हत्यारे सेना के जवानों की उपस्थिति देखकर उनको ललकारते हुए उनके सामने ही आये थे और सहायता करने वाले मसीहा इतने उदार तथा समदर्शी हैं कि पहले उन्होंने हत्यारों को पर्यटकों तक पहुँचाया, उनके हत्याकाण्ड में कोई ख़लल नहीं किया और उनका काम ठीक से हो जाने पर घायलों की मदद करते हुए समान भाव से अपनी सेवायें दीं। इस प्रकार उनका रिवायती अन्दाज़ क़ायम रहा और बतर्जे-कश्मीरियत दोनों ओर अपने फरायज को अंजाम दिया गया।)

सेकुलर कुतर्क – 4

  • भारतीय होने के कारण संयम बरतें, सरकार भड़का रही है, भड़काने पर ध्यान न दें।

( अर्थात् जो अपने देश की सीमा पारकर, हिन्दुस्थान में घुसकर निर्दोष लोगों की हत्या करते हैं, उनके लिये इन धूर्तों के पास कोई सन्देश नहीं है। ये अकारण हिंसा का शिकार हुये लोगों से उनकी प्रतिक्रिया देने को असहिष्णुता बताना चाहते हैं। ये आतंकियों को बुरा कहने से आतंकित है और सरकार को घेरने के लिये चौकड़ी भर रहे हैं।)

सेकुलर कतर्क – 5

  • कुछ कट्टरपंथी लोग एक आतंकी हमले को धार्मिक रंग दे रहे हैं।

( अर्थात् ये हमला धार्मिक नहीं था आतंकी था और आतंकी पाकिस्तान से आये थे। तो, पाकिस्तान का निर्माण किस तर्क के आधार पर हुआ था। क्या वह एकमात्र धार्मिक आग्रह नहीं था। क्या विश्वभर में आतंकवाद की सबसे बडी प्रेरणा एक धर्मविशेष का आग्रह नहीं है।)

…ये और ऐसे ही अनेक कल्पित तर्क आपको सर्वत्र दिखाई देंगे। महाकुम्भ की दुर्घटना पर जो जो लोग प्रदेश सरकार को विलेन बता रहे थे कि ये उसकी व्यवस्था में हुआ है। वही लोग पहलगाम के नरसंहार में सहयोगी बने लोगों को पहचानने से न केवल इनकार कर रहे हैं बल्कि छिपे हुये अपराधियों को बचाने का खेल, खेल रहे हैं। दरअसल, यही लोग हैं जो पीढ़ियों से इस देश को अपनी प्रकृति में स्थिर होने से रोकते आये हैं। ये भारत को भारत नहीं इण्डिया बनाकर रखना चाहते हैं। ये इतने भोले लोग हैं कि तुर्किस्तान में तुर्कों के हित के लिये बोलते हैं। अफ़ग़ानिस्तान में अफगानों के लिये दुखी हैं। उज़्बेकिस्तान में उज़्बेकों के मौलिक अधिकार इन्हें समझ में आते हैं परन्तु हिन्दुस्थान में हिन्दू के स्वाभिमान-सम्प्रभुता और सामर्थ्य से इन्हें बेहोशी आने लगती है। इस राष्ट्र को ये सराय मानते हैं। जहाँ किसी का कोई स्वत्व नहीं है। ‘काफिले आते गये हिन्दोस्तां बसता गया’ की धूर्त्तता में वेद-पुराण तो दूर, हमारी अबतक चली आ रही शैव-शाक्त उपासना की प्रत्यक्ष परम्परा को भी ये पहचानना नहीं चाहते। हिन्दुस्थान की जमीन को उसकी पहचान से गाफिल करने का मिशन कभी पूरा तो न हुआ, पर ये अब तक रुके नहीं हैं। ये अभिशप्त बौद्धिक सदा हिन्दुत्व को लांछित और प्रश्नांकित बनाये रखना चाहते हैं। ये धर्मान्तरण पर चुप रहते हैं और धर्मरक्षा पर छाती पीटने लगते हैं।

लेखों, वक्तव्यों और इन्फ्लुएंस के विभिन्न माध्यमों पर ये छाये हैं, जैसे बरसात में पंख उगाये चींटे फैल जाते हैं। आप ये देख-सुनकर अचंभित हो सकते हैं कि पाकिस्तानी नेताओं और भारत के सेकुलरों की भाषा-भाव कैसे एकमेक हैं। अब यदि ये हितैषी हैं इस देश के, तो फिर हाफिज सईद भी खैरख्वाह ही होगा।

मित्रों ! हमें अपनी ही पाली कुण्ठाओं से उबरना होगा।
यह कठिन हो सकता है, पर इसे किये बिना मुक्ति नहीं। ताड़का को मारते हुये श्रीराम के सामने स्त्री-वध का प्रश्न रहा होगा, पर आप जानते हैं कि उन्होनें निर्णय लिया। भगवान् परशुराम ने अपने किये वध का प्रायश्चित्त किया, परन्तु अपराधियों को न मारने का विकल्प नहीं चुना। अपनी प्रतिज्ञा के विरुद्ध प्रेरणा पर असहमत होकर भीष्म पितामह अपने गुरु से न केवल लड़े बल्कि विजयी भी हुये। हमें आभासी उदारता और छद्म भाईचारे से निकलकर भाई और भाई के वेश में शत्रु को पहचानकर निर्णय करना होगा। किसी प्रकार के अतिरेक और विद्वेष को स्वीकारना मेरा स्वभाव नहीं। परन्तु, सदा चुप रहना भी पाप हो सकता है।

सेना अपना कार्य भरपूर करेगी, सरकार भी अब बासठ वाली नहीं है। परन्तु लोहा जब नहीं बचता तब भी उसको खा चुकी उसकी जंग बची रह जाती है। भारत अभी इस जंग से सर्वथा मुक्त नहीं हो सका है।

सबसे आग्रह है, किसी दोहरेपन में न पड़ें। जहाँ जंग दिखे, जी भर रगड़ें। स्वैरिणी तर्कशीलता बौद्धिक जारवृत्ति का पोषण करती है। इसकी माया से मोहित न हों।

देश नहीं होगा, उसकी सम्प्रभुता नहीं होगी तो समुद्र-पर्वत-जंगल समेत 19.7 करोड़ वर्गमील क्षेत्रफल वाली धरती पर आपके कहीं खड़े होने की भी जगह नहीं होगी।

जो हिन्दुस्थान की धरती पर हिन्दू कहकर किसी को मार डालता है, ऐसा एक भी शरीरधारी इस धरती पर न रहे यही हमारी समेकित प्रतिज्ञा होनी चाहिए..आत्मानं सततं रक्षेत्।

राष्ट्र प्रथम है। यही हमारे सामाजिक जीवन का यथार्थ है, जिन्होंने इसे नहीं पहचाना उनका अस्तित्व सुरक्षित नहीं रहेगा। इजरायल उदाहरण है। एक राष्ट्र के रूप में अपने को न परिभाषित कर सकने की स्थिति में यहूदियों ने जो कुछ सहा, वह कल्पनातीत है। पर जब वे इजरायल के रूप में संगठित हुए तो उन्होंने अपने शत्रुओं को रौंदने का कीर्तिमान रच दिया। हमें स्वयं को एक राष्ट्र के रूप में पहचानना और स्वीकारना ही होगा। राष्ट्र, जो संस्कृति से परिभाषित होता है और संस्कृति, जो धर्म से जन्म लेती है।

पहलगाम में मारे गये निर्दोष जन कोई और नहीं हमीं-आप हैं। किसी नैरेटिव में मत पड़िए, यह छापामार युद्ध है। वो सेना से भिड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे तो नागरिकों को मार रहे हैं। उनके साथी कहीं भी हो सकते हैं। कठोर दण्ड की ओर देश को चलना ही होगा। आपको इसकी आवश्यकता और सार्थकता समझनी होगी। इसके साथ खड़े होना होगा। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य का निहितार्थ समझना होगा और हमें हतोत्साहित करने वालों का कपट उजागर करना होगा। यही समय की माँग है।

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