विभाजन से पहले दिल्ली में संघ का गुप्त अभियान: दुर्लभ संस्मरण
प्रस्तावना: दिल्ली का गुप्त अभियान
दिल्ली का गुप्त अभियान भारत विभाजन से पहले की पुरानी दिल्ली से जुड़ा एक चर्चित संस्मरण है। उस समय राजधानी के अनेक क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव का वातावरण था और सामान्य नागरिकों का जीवन भी इससे प्रभावित हो रहा था। विशेष रूप से जामा मस्जिद, दरीबा कलां और आसपास के इलाकों का उल्लेख उस दौर की अनेक स्मृतियों और संस्मरणों में मिलता है।
प्रस्तुत विवरण विभाजनकालीन भारत के साक्षी नामक पुस्तक में प्रकाशित एक साक्षात्कार पर आधारित है। इसमें वर्णन किया गया है कि किस प्रकार कुछ स्वयंसेवकों ने एक पूर्व-नियोजित योजना के अंतर्गत सीमित समय के लिए कार्रवाई की। यह विवरण उस समय की परिस्थितियों को समझने का एक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है और इसे उसी ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।
भारत विभाजन से जुड़ी घटनाओं के अनेक संस्मरण उपलब्ध हैं, जिनमें अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुभव और दृष्टिकोण दर्ज किए हैं। इसलिए ऐसे विवरणों को उनके स्रोत और संदर्भ के साथ पढ़ना आवश्यक है। यह लेख भी उसी क्रम में एक ऐतिहासिक संस्मरण प्रस्तुत करता है, जिससे उस समय के सामाजिक वातावरण और तत्कालीन परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया जा सकता है।
दिल्ली का गुप्त अभियान और जामा मस्जिद क्षेत्र की परिस्थितियाँ
उन दिनों शाम को सात बजे के बाद जामा मस्जिदए काला महल आदि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की तरफ हिन्दू महिलाओं का जाना असम्भव होता था। मुसलमान उन्हें छेड़ने से बाज नहीं आते थे और हिन्दू आमतौर पर दब कर रहते थे। इस स्थिति को बदलने के जिए मुसलमानों के दिलों में डर बिठाने के लिए योजना बनाई गई।
दिल्ली का गुप्त अभियान: गुप्त योजना और पहला अभियान
इसके अन्तर्गत एक दिन रात को 8:30 बजे जामा मस्जिद से लेकर दरीबा कलाँ और वहाँ से फतेहपुरी चौक तक कुछ स्वयंसेवक थोडे-थोड़े अन्तर पर खड़े हो गए। सबके हाथ में गुपती थी। सब एक वेष में थे सफेद पैंट, सफेद कमीज, सफेद जूते, सफेद जुराब और सिर पर सफेद हैट। सबकी मूँछे बिल्कुल साफ।
उन दिनों रात को नौ बजे घण्टा घर का हूटर बजता था। जैसे ही वह हूटर बजा, इन स्वयंसेवकों ने जो-जो भी सामने मुसलमान दिखे, उनकी पिटाई शुरू कर दी। पूर्व-योजनानुसार पाँच मिनट बाद सीटी बजी, सीटी बजते ही ये सभी स्वयंसेवक वहाँ से गायब हो गए।
पीटने वाले कौन थे, कहाँ से आए, कहाँ चले गए, किसी को कुछ पता नहीं चला। मुसलमान थाने रिपोर्ट करने गए। पुलिस के यह पूछने पर कि कौन थे वे लोग, वे कुछ भी नहीं बता सके। केवल इतना ही बता सके कि सफेद हैट वाले थे। नाम-धाम किसी का कुछ पता नहीं।
दिल्ली का गुप्त अभियान: दूसरा अभियान और बदला हुआ वेष
अगले महीने फिर इसी प्रकार किया गया, लेकिन वेष दूसरा धारण करके। इस बार का वेष था सफेद कुर्ता, सफेद धोती, लालाओं वाली काली गोल टोपी। यानी लालाजी बनकर। बाकी सब क्रियाएँ पिछली बार जैसी ही थीं। वही समय। वैसी ही पिटाई। कुल पाँच मिनट का कार्यक्रम।
दिल्ली का गुप्त अभियान: तीसरा अभियान और स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी
तीसरी बार फिर यही किया। इस बार का वेष था पी.टी.शू, नीली जुराब, सफेद कमीज, खाकी निकर और उसके ऊपर संघ गणवेष वाली पेटी। बाकी सब पिछली योजना जैसा ही। लेकिन इस बार के वेष के कारण पहचान लिए गए कि ये संघ वाले हैं। अतः लगभग 150 स्वयंसेवकों को घरों से ही पकड़ लिया गया।
दिल्ली का गुप्त अभियान में लाला हरिचन्द की भूमिका
तब दिल्ली के संघचालक थे लाला हरिचन्द जी। वे बड़े ही प्रभावशाली व्यक्ति थे। सभी नेताओं और सभी सरकारी अधिकारियों के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे। उनकी सात्विकता, सरलता, बुद्धिमत्ता, निर्भीकता और निस्वार्थता के कारण सभी उनका बहुत सम्मान करते थे। लाला हरिचन्द जी ने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर रामेश्वर दास को इन स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बारे में बताया।
पुलिस कमिश्नर को जब पता लगा कि ये सब संघ के स्वयंसेवक हैं तो उसने तुरन्त ही उन्हें छोड़ने का आदेश दे दिया, क्योंकि मुसलमानों की गुण्डागर्दी से पुलिस भी काफी परेशान थी।
स्रोत
अनिल गुप्ता
ए-125, प्रीत विहार, दिल्ली
साक्षात्कार दि. 11-5-2015
कृष्णानन्द सागर
विभाजनकालीं भारत के साक्षी
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