ध्वस्त होता संघ के विरुद्ध झूठा नैरेटिव
ध्वस्त होता संघ के विरुद्ध झूठा नैरेटिव

ध्वस्त होता संघ के विरुद्ध झूठा नैरेटिव

देश में एक सुनियोजित नैरेटिव के जरिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो निशाने पर रहा, लेकिन कम्युनिस्टों की कारगुजारियों को व्यापक रूप से अनदेखा किया गया। यह भी एक संयोग है कि, संघ की स्थापना और कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में ही हुआ था। जहां संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनकर निरंतर मजबूत हो रहा है, वहीं कम्युनिस्ट खेमा अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। कहा जा सकता है कि, भारत का जनमानस जैसे-जैसे परिपक्व हो रहा है वैसे-वैसे जनता राष्ट्रहित सोचने वालों के साथ होती जा रही है।

समाचार चैनलों पर चलने वाली पर यह पूछते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंक संघ का स्वार्धनात अलिन से ज्या संबंध ? फिर स्वर्यही नियात्मक उतर देते हैं कि संघ का स्वर्धनता मॉडेलन में में तो कोई गइन र न ही संबंध। यह नैरेंटष वर्षों से चलाया जा या है। हर कालखंड में कई सीन इसकी नादा करने के उपक्रम में जुटे हते हैं। अब पी हैं। ऐस करके वे जनमानस में अमक अवधारणा का रेप कसरी चलते हैं। जब तटस्थ मिलेषक उसने लगते हैं तो इनकी दबाने का प्रयास किया जा है। अर्धसत्य की सामने सकर उनको चुप कराने का प्रयास किय जाग है। कहा भी गया है कि अगर एक झूठ की बार-बार कहेंगे तो दसको सच नहीं तो सच के करीब ती मान ही लिया जाएगा। तब देख अऔर भी संधव से जात है जब कठे हुए को पुस्तकों के मन में पुष्ट किया जा रहा हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संध और स्वाधीनता में देख ही होता आ रहा है। ऐस बहने बाले कुछ तथ्यों को दबा देते हैं। वे ये नहीं बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक की स्थापना 1925 में हुई थी और देश 1947 में आजाद हो गय। उस समय संघ को ताकत कितने ही होगे, एक संगठन के गैर पर संघ का कितना विस्तार का होय, संघ से कितने कार्यकर्ता जुड़े हैं, इसकी बगैर बताए निर्णय हो जाता है। जैसे-जैसी संघ पर विस्तार होता गया ये कैंटिव जेर-पैर से चलाया जाने लगा। बंद सहा वर्ष में इस विन्नों को और गाढ़ा करने का उपक्रम हो रहा है, बल्कि कह सकते हैं कि संगठित होकर किया जा रहा है।

असल में राष्ट्रीय स्थवेसेवक संघ के सरबंधचालक ८. मौहन भाग की ये अक्सरों पर सुनने का अवसर मिला। एक पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम था। दूसरा संप शताब्दी वर्ष पर दिल्ली में तीन ने पहले कार्यक्रम में बताय कि अंग्रेज अफसर नागपुर और उसके आसवस पतने बाती शाहनों की न सिर्फ

देश में एक सुनियोजित नैरेटिव के जरिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो निशाने पर रहा, लेकिन कम्युनिस्टों की कारगुजारियों को व्यापक रूप से अनदेखा किया गया। यह भी एक संयोग है कि संघ की स्थापना और कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में ही हुआ था। जहां संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनकर निरंतर मजबूत हो रहा है, वहीं कम्युनिस्ट खेमा अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। कहा जा सकता है कि भारत का जनमानस जैसे-जैसे परिपक्व हो रहा है वैसे-वैसे जनता राष्ट्रहित सोचने वालों के साथ होती जा रही है

निगरानी करते थे, बल्कि हर शत्र से फिरलेषण भी करते थे। वे कित रहते थे कि अगर सभी का सिर गया तो अंग्रेजों के लिए दिक्कत खड़ी हो ने बकराष्ट्रीय के प्रथम संचालक हेडगेवार स्वाधीनता दल में बसेसर सक्रिय थे। नगर के स्कूलों में 19 06 में बंदे मातरम् ऑईलन हुआ था। इसमें मेल करने से माफी मांगने से इन्कार कर दिया था। उनकी स्कूल से निष्कासित कर दिय गया था। बाद में हेडगेवार टरी की पढ़ाई करने तक (अब तकता) गर। पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन हजार रुपये कि को ठुकराकर डा. हेडगेवर ने देशसे को ठानी। वे अनुशेलन समिति में भी शमिल हुए थे। 1920 में जन पर देशात का मुकदमा चला। कोर्ट में अपने बचाव में उन्होंने स्वयं दलील पेश की थी। उद्देश्य था कि पत्रचार आदि केस सुनने आ‌गे ती उनके विचार जनता तक पहुंच जाएंगे। न्यायालय का जब निषेक आया तो जज ने तिच्या निषों के कारप इन पर यह आरोप लग है, इनका बचाव का धषण उन भाषणों से अधिक सेटिशियस है। उनसे एक वर्ष सथम

निकलने के बाद दिनेबर ने 1925 में राष्ट्र संघ की स्थापना की। 1930 में गलत उन्ने पलक का दो सजा हुई। सजा काटकर जपस आने पर का कार्यभार संभाला। इस न सुभाष बीस लोकमान्य तिलकराजाने के संपर्क में थी आए। राजगुरु को तो उन्होंने महाराष्ट्र में अंडरग्राउंड सखने में मदद की। नानपुर में थे स्खा। बाद में उनकी अकोला भेजने की भी की। इनके अलया भी उसे जुड़े कार्य एक लंबी सूची है तरीकদ लेकिन विष के लोगे रेइन तथ्यों की आम जनता से दूर रखा और भ्रमक बाते करते रहे।

जिस युद्धको विरुद्ध कहते थे बस पर हमले लगे। इसके बाद न इस आंदोलन की महाभागांसदि। फिल अने जसू की थे। था। 1946 में तेल के खिलाफ बादधारात सरका कोंकि ये स्वाधीन सट्टाको राष्ट्रीय के कम्युनिस्ट ने बात की। उस किय बाजूः नहीं लगाई। परबाद कम्यु

रिट के खेत को इस तरह से है। हिस्टालिनका क अठोलन का विरोध किय, ग्रेनेंच साथ दिया, सुभाष बाबू को जाजन और जर्मनी के हाथों से काले बा हुए कहा। इसको नहीं होती है, बल्कि इस तथ्य की दवा दिए जाता है। इस खेल में दिक्स्ट तब आया जब हिटलर ने किया

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