जनसाधारण के माध्यम से परिवर्तन की प्रक्रिया है ‘संघ – सुनील आंबेकर जी

जनसाधारण के माध्यम से परिवर्तन की प्रक्रिया है ‘संघ – सुनील आंबेकर जी

पुणे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने कहा कि “हिन्दू समाज में व्याप्त दोषों के परिपूर्ण उपाय के रूप में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ यद्यपि व्यापक सामाजिक परिवर्तन के लिए कार्यरत है, फिर भी यह प्रक्रिया अत्यंत स्वाभाविक और साधारण है। वास्तव में जनसाधारण के माध्यम से परिवर्तन की प्रक्रिया ही ‘संघ है”।

भारतीय विचार साधना (भाविसा) के ‘नाना थिटे सभागार’ में आयोजित ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ पुस्तक विमोचन समारोह में वरिष्ठ विचारक पद्मश्री गिरीश प्रभुणे, लेखक अरुण करमरकर, ‘भाविसा’ के अध्यक्ष डॉ. गिरीश आफले, कार्यवाह काशिनाथ देवधर आदि उपस्थित रहे। लेखक दिलीप क्षीरसागर, अरुण करमरकर और दिलीप करंबलेकर ने पुस्तक का लेखन किया है।

सुनील आंबेकर जी ने कहा, “डॉ. हेडगेवार को यदि केवल राजनैतिक असहमति व्यक्त करनी होती, तो उन्होंने अलग राजनैतिक दल स्थापित किया होता। लेकिन उन्हें व्यक्ति निर्माण द्वारा आदर्श समाज खड़ा करना था। इसलिए चारित्र्यवान लोगों का निर्माण करके पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनका संगठन करना आवश्यक था। इसीलिए संघ का आरंभ हुआ। संघ को समझने के लिए बड़े वैचारिक भाषणों की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आम स्वयंसेवकों के आचरण से ही उसे समझा जाता है”।

पद्मश्री गिरीश प्रभुणे ने कहा, “भारत की विखंडित समाज प्रणाली को पाटने का कार्य संघ ने किया है। सभी क्षेत्रों में अराष्ट्रीय विचार और वैचारिक असमंजस की स्थिति संघ के कारण दूर हुई है। अब यह सबको पता चला है कि हिन्दुत्व सबको साधने वाला विचार है।” संघ केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है।

लेखक अरुण करमरकर ने ‘स्वयंसेवक’ शब्द की मीमांसा को उजागर किया। करमरकर ने कहा, “शताब्दी के उपलक्ष्य में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’, इन तीन शब्दों की मीमांसा करने का काम हमने किया है। मेरे हिस्से में ‘स्वयंसेवक’ शब्द की मीमांसा आई। मेरे अध्ययन द्वारा मैं अभी भी ‘स्वयंसेवक’ बनने के मार्ग पर हूं।”

डॉ. आफले ने प्रस्तावना रखी, जबकि काशिनाथ देवधर ने आभार प्रकट किया।

‘रिलिजन‘ के कारण धर्म पर अन्याय!

सुनील आंबेकर जी ने कहा, “पश्चिम में ‘रिलिजन’ के माध्यम से मूलतत्ववाद का जन्म हुआ और चर्च ने सीधे राजकाज हाथ में ले लिया। इसलिए वहां के विचारकों ने सामाजिक परिवर्तन के लिए रिलिजन को नकारा। दुर्भाग्य से उसी अनुभव को भारत पर थोपने का प्रयास हुआ और ‘धर्म’ की संकल्पना को रिलिजन के समान अर्थ में मानकर दूर किया गया। भारत में ‘धर्म’ का अर्थ कर्तव्य और कल्याण है। राजकाज, शिक्षा, प्रशासन में धर्म नहीं चाहिए, इस विचार के चलते ये क्षेत्र चरित्रहीन हो गए हैं। आज लोग फिर से जीवन के हर क्षेत्र में धर्म की (कर्तव्य) मांग कर रहे हैं”।

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