सहज सकोची
जहाँ तक स्मरण आता है, मैंने पहले-पहल श्री गुरुजी को सन 1936 में पटना स्टेशन पर देखा था। गया में संघ शाखा प्रारम्भ हो चुकी थी। उन दिनों संघ में कार्यकर्ताओं को डॉक्टर हेडगेवार जी के बाद में जिन तीन व्यक्तियों का नाम बताया जाता था, उनमें श्री गुरुजी बाबासाहव आप्टे तथा दादाराव परमार्थ थे।
अभी ठंढ शुरू नहीं हुई थी। बरसात का अन्त था, उसी समय कहीं से श्रीगुरुजी रात की गाडी से कोलकाता जा रहे थे। स्टेशन पर थोड़ा प्रयास करने के बाद उनको ढूंढ लिया। दाढी-बालों वाला चेहर सहज ही पहचान में आ गया। तब से लेकर अन्त तक उनसे मेरा घनिष्ठ सम्पर्क रहा।
वे स्वभाव से बड़े ही सकोची थे। बडे-बडे कार्यक्रमों में शामित होने, वहाँ भाषण देने, बैठकों में खुलकर बोलनेवाले नित्य के व्यवहार में संकोच से काम लेते थे। सन् 1942 का ही प्रसंग लें। जेल से रिहा होने के बाद सावरकर जी मेरे घर पर ठहरे हुए थे। उसी मंजिल पर दूसरे कमरे में श्री गुरुजी भी ठहरे हुए थे। उस समय तक आवाजी उनके साथ नहीं रहते थे। सावरकर जी को प्रात मेल से जाना था। श्री गुरुजी उनके कमरे में जाकर उन्हें नमस्कार करना चाहते थे। सावरकर जी के कमरे में रोशनी जल रही थी। वे प्रवास पर जाने की तैयारी में होंगे। श्री गुरुजी उनके कमरे में न जाकर तब तक बाहर खड़े रहे, जब तक वे स्वयं बाहर न निकल आए।
उनका मुक्त हास्य स्वयसेवकों को सदा स्मरण रहेगा। मैं भी उनकी हँसी में थोडा बहुत साथ देता रहा हूँ। सन् 1941 में हिदू महासभा के अखिल भारतीय अधिवेशन पर बिहार सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। महासभा ने प्रतिबंध तोड़कर सम्मेलन करने का निश्चय किया। सारे भारत से आए कार्यकर्ता गिरफ्तार दे रहे थे। सावरकर जी का भाषण पढने के कारण मुझे भी गिरफ्तार किया गया। उस समय श्री गुरुजी मुझसे मिलने जेल आए थे। मुझे देखते ही जोर से ठहाका लगाते हुए कहा- ‘Let me have your laugh’ (अपनी मुक्त हँसी का आनन्द तो लेने दीजिए)।
फिजूलखर्ची उन्हें विल्कुल पसंद नहीं थी। नागपुर में प्रतिनिधि सभा की बैठक के लिए गया था। बैठक रेशमबाग में थी। प्रातः पाँच बजे देखता क्या हूँ कि बरामदे में हल्के पावर के कई बल्ब जल रहे थे, उन सबको उन्होंने स्वयं जाकर बुझाया।
भोजन सम्बन्धी किसी विशिष्ट पदार्थ को बनाने के लिए उन्होने कभी नहीं कहा। मैं ही इस बात का ध्यान रखने का प्रयत्न करता कि उन्हें उनकी रुचि का भोजन मिल सके। वे बडे साफ-सुथरे और अच्छे ढंग से रहते थे, लेकिन उनमें पूरी सादगी थी। नागपुर में उनके बैठक कक्ष में दरी के अलावा कभी गद्दा नहीं देखा। प्रारम्भ में तो उनको कई बार साइकिल पर चलते देखा है।
वे सच्चे साधु थे। उनका जीवन पूरी तरह एक सन्यासी की तरह का था, पर उन्होंने कभी साधु का वस्त्र नहीं पहना। वे जनसाधारण की तरह ही रहते थे। इसीलिए हमें प्रभावित करते थे, हमारे अपने लगते थे।
श्री बबुआजी, क्षेत्र सघचालक बिहार
श्रीगुरुजी समग्र खण्ड 12

