मराठी से संस्कृत भाषा में संघ-प्रार्थना के बदलने की कहानी

मराठी से संस्कृत भाषा में संघ-प्रार्थना के बदलने की कहानी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने साथियों के साथ मिलकर संघ की नियमित शाखाओं में जन्मभूमि को नमन करती हुई एक प्रार्थना तैयार की क्योंकि, उन दिनों नागपुर में मराठी और हिन्दी भाषा मिश्रित रुप से बोली जाती थी। इसलिए संघ की प्रार्थना भी हिन्दी के कुछ शब्दों के साथ मूल रूप से मराठी भाषा में ही बनकर तैयार हुई और साल 1939 तक यही प्रार्थना संघ गीत के तौर पर गायी जाती रही।


“नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी

नमो आर्यभूमि जिथे वाढलो मी,

नमो धर्मभूमि जियेच्याच कामी

पड़ो देह माझा, सदा ती नमी मी.”

यद्यपि, कुछ समय बाद ही संस्कृत भाषा की छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मोहर से बदलाव की प्रेरणा मिली और क्योंकि, देश-भर में संस्कृत ही ऐसी भाषा थी जो तमाम विदेशी आक्रांताओं द्वारा अपनी भाषाओं के थोपे जाने के बावजूद ना केवल भारत की प्राचीन सांस्कृतिक कड़ी थी, बल्कि देशभर में जानी जाती थी। इसलिए 1939 में नागपुर से 50 किमी दूर सिंदी में संघ के वरिष्ठ अधिकारी नाना साहेब तलातुले के आवास पर हुई एक बैठक में ये तय किया गया कि आज से संघ की प्रार्थना समेत संघ के प्रशिक्षण या शाखाओं में दिए जाने वाले निर्देशों की भाषा भी संस्कृत होगी बल्कि प्रशिक्षण या शाखा निर्देशों में जो भी मराठी या अंग्रेजी शब्द हैं उनको संस्कृत शब्दों से बदला जाएगा।

डॉक्टर हेडगेवार जी ने साथियों के साथ संघ की प्रार्थना खुद तैयार करवाई। दिलचस्प बात ये थी कि इस बैठक में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार जी, श्री गुरु गोलवलकर जी और देवरस साहब जी के अलावा अप्पाजी जोशी, विट्ठल राव पटकी, तात्याराव तेलंग, बाबाजी सालोडकर और कृष्णराव मोहरिल जैसे वरिष्ठ संघ अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे। इस बैठक में मराठी प्रार्थना को संस्कृत भाषा में बदलने का निर्णय लिया गया। हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी के निर्देश के अनुसार मराठी प्रार्थना के संस्कृत अनुवाद की जिम्मेदारी मोहिते का बाड़ा की शाखा के कार्यवाह और संस्कृत के विद्वान नरहरि नारायणराव भिड़े जी को सौंपी गयी।

नारायण राव भिड़े जी ने प्रार्थना “नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी” को संस्कृत भाषा में बदलकर “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि.” कर दिया। इस प्रार्थना को संघ प्रचारक अनन्त राव काले ने सबसे पहले पुणे शिविर में डॉ. हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी के सामने गाया था। इस शिविर में डॉ अम्बेडकर भी आए थे। इसके बाद संघ से जुड़े स्रोतों में सार्वजनिक रूप से नागपुर के वर्ग में 18 मई 1940 को संघ के प्रचारक यादव राव जोशी जी ने इसे पहली बार सार्वजनिक मंच पर गाया था। तब से लेकर 85 साल बाद भी आज तक कोई बदलाव नहीं किया गया। देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर की हजारों शाखाओं में इसे रोजाना गाया जाता है।

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

त्वया हिन्दुभूमे सुखवं वर्धितोऽहम्।

महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता

इमे सादरं त्वां नमामो वयम्

त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्

शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम्

सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्

श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्णमार्गम्

स्वयं स्वीकृतं नः सुगंकारयेत्॥२॥

समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम्

परं साधनं नाम वीरव्रतम्

तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा

हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्

विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्

समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥३॥

॥भारत माता की जय॥

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