नक्सलवादः असंभव मान ली गई समस्या का समाधान बने अमित शाह

नक्सलवादः असंभव मान ली गई समस्या का समाधान बने अमित शाह


अब वैचारिक संघर्ष के मोर्चे पर भी दिखानी होगी प्रतिबद्धता

लाल आतंक पराभव की ओर है। वर्ष 2025 को माओवाद के सशस्त्र संघर्ष के अंत के रूप में याद किया जाएगा। भारत में लाल आतंक का अंत असंभव मान लिया गया था। एक पूर्व प्रधानमंत्री ने हताशा प्रकट कर दी थी। कह दिया था यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बडी चुनौती है। लेकिन, आत्मविश्वास से लवरेज और संकल्पबद्ध गृहमंत्री अमित शाह ने इस असंभव को संभव बना दिया है। गृहमंत्री शाह ने घोषणा कर दी है कि 31 मार्च 2026 तक “नक्सलवाद मुक्त भारत” होगा। इसकी कल्पना भी एक दशक पहले नहीं थी कि कोई इतने आत्मविश्वास के साथ संकल्प दिवस की घोषणा कर देगा। तारीख बता कर नक्सलवाद का अंत करेगा। लेकिन, ऐसा होता दिखायी दे रहा है। क्योंकि चार दिन में यानि कि 14 से 17 अक्टूबर के बीच शीर्ष नक्सल कमाण्डरों के नेतृत्व में तीन सौ से अधिक नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। हाथों में एसएलआर, एके 47 और इंसास राइफलें संभालने वाले नक्सवादी इन तीन दिनों के भीतर हाथों में गुलाव और संविधान की प्रतियां लेकर पुलिस और प्रशासन के सामने आ गए। लेकिन, सशस्त्र संघर्ष को परास्त करने के बाद भी वैचारिक मोर्चे पर समर शेष है।


नक्सलवाद के इतिहास का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण


डेढ करोड़ के ईनामी नक्सलवादी कमाण्डर और वैचारिक प्रेरक की भूमिका निभाने वाले भूपति ने 15 अक्टूबर को गढ़चिरोली में हथियार डाल दिये। समर्पण करने वाले नक्सलवादियों की संख्या 60 थी। इसके एक दिन बाद ही छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 210 नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण किया। यहां दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी सदस्य भास्कर उर्फ राजमन मंडावी, कमेटी प्रवक्ता रूपेश उर्फ विकल्प, रनीता, राजू सलाम के नेतृत्व में समर्पण हुआ। इसके साथ ही बस्तर में बीएसएफ के सामने नक्सलवादियों ने हथियार डाले। आंतरिक सुरक्षा की सबसे बडी चुनौती का सामना करके भारत सफलता के एकदम निकट है। यह चुनौती लगभग छह दशक से भारत की आंतरिक सुरक्षा चिंता की केन्द्र बिन्दु बनी हुई थी। लेकिन, चार दिन में तीन सौ से अधिक नक्सलवादियों के आत्मसमर्पण से यह उम्मीद बंधी है कि अब भारत ने इस चुनौती का सफलता से सामना कर लिया है। ये आत्मसमर्पण छत्तीसगढ और महाराष्ट्र में शीर्ष माओवादी कमाण्डरों के नेतृत्व में हुए।


माओवादी विचार से प्रेरित नक्सलवाद की अब कमर टूट चुकी है। भूपति के आत्मसर्पण और उसके द्वारा अन्य साथियों को लिखे गए पत्रों से स्प्ष्ट है कि इनके वैचारिक प्रेरक ने तात्कालिक परिस्थियों को समझते हुए ही समर्पण का निर्णय लिया है। उसने अन्य साथियों को भी लिखा है कि अब सशस्त्र संघर्ष का समय नहीं है, परिस्थितियां अनुकूल नहीं है। इसलिए अहिंसा का रास्ता अपना कर सामान्य जनजीवन में लौटना ही सही निर्णय होगा।


नक्सल आतंक के भयावह परिदृश्य का दशक 2003-2013


इस आतंक को संप्रग सरकार के कार्यकाल में 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की सुरक्षा के लिए सबसे बडी चुनौती करार दिया था। किन्तु संयुक्त प्रगतिशील सरकार ने इसे जितनी बड़ी चुनौती बताया। उसके अनुपात में योजनाएं और अभियान पर्याप्त नहीं थे। बल्कि नक्सलवादियों के साथ आन्ध्र प्रदेश में वार्ता के लिए 2004 में एक तरफा कार्रवाई रोकने की नीति ने स्थिति को और अधिक भयावह बना दिया था। इसी का परिणाम था कि नक्सलवादियों ने कई जघन्य आतंकी घटनाओँ को अंजाम दिया। इन घटनाओं से यह लगने लगा था कि लाल आतंक देश में बेलगाम है। वर्ष 2003 से 2013 का यह वही दौर था जब उन्होंने सुरक्षा बलों के काफिलों पर बड़े हमले किये थे। नक्सल आतंक 2013 में सबसे ज्यादा जिलों में व्याप्त था। उस समय देश के 126 जिले माओवादी हिंसा की घटनाओं से प्रभावित थे। अब 2025 की शुरुआत में यह संख्या घटकर 18 रह गई। मौजूदा समय में यह 11 जिलों तक सीमित है। इनमें भी सिर्फ तीन जिले ही अति प्रभावित की श्रेणी में हैं।
कांग्रेस नेताओं पर घात लगाकर हमले किये गए थे। वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ के दरभा घाटी में घात लगाए बैठे नक्सलवादियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला कर दिया था। इसमें 24 कांग्रेस नेता मारे गए थे। तेलुगू देशम पार्टी के नेता चन्द्रबाबू नायडु पर 2003 में जान लेवा हमला किया गया था। दंतेवाडा में सीआरपीएफ के कैम्प पर 2010 में हमला किया गया। इसमें 76 जवान शहीद हुए थे। नक्सलवादियों का यह सबसे बडा हमला था। उत्तर प्रदेश के चंदौली में नौगढ क्षेत्र में 20 नवम्बर 2004 को पीएसी की गाड़ी को बारुदी सुरंग से उड़ा दिया गया था, इसमें 17 जवान शहीद हो गए थे। इसमें 12 जवान पीएसी के तथा 5 नागरिक पुलिस के थे।


नक्सलवाद से निर्णायक मुकाबले की योजना


गृह मंत्री अमित शाह ने आत्मविश्वास और सटीक योजना के साथ यह दृढ़ संकल्प व्यक्त किया है कि 31 मार्च 2026 तक देश नकस्लवाद मुक्त हो जाएगा तो इस पर कोई संदेह नहीं होता। इसका कारण है कि जिस तेजी से नक्सली हथियार डाल रहे हैं। लाल गुलाब के फूल और संविधान हाथ में लेकर बाहर और रहे हैं। उससे यह विश्वास होता है कि गृह मंत्री इस संकल्प को समय सीमा में या उससे भी पहले पूरा कर लेंगे। नक्सलवाद की चुनौती के मोर्चे पर जिस कुशलता और सुदृढ़ रणनीति के साथ केन्द्र सरकार ने इस मोर्चे पर सफलता अर्जित की है वह अमित शाह की दूरदर्शिता, कुशल रणनीतिक सूझबूझ और दृढ संकल्प को दर्शाता है। भारत की यह ऐसी उपलब्धि है जिसे सुरक्षा की दृष्टि से तीन दशक की सबसे बड़ी घटना के रूप में देखा जा सकता है। यह लड़ाई किसी युद्ध से कम नहीं थी। इसमे जो जानें गईं, सरकारी सम्पत्तियों को जो नुक्सान हुआ, सरकारी धन का जो व्यय हुआ वह किसी भी बाहरी युद्ध से कम नहीं था। इतना ही नहीं नक्सलवाद ने पूर्वोत्तर और दक्षिण पूर्व के कई राज्यों में विकास को बाधित कर दिया था। निजी कंपनियों ने इन क्षेत्रों में जाने से इनकार कर दिया था। सडके स्कूल, अस्पतालों का निर्माण अवरुद्ध था। रेल यातायात प्रभावित था। ट्रेनों को विशेष सुरक्षा में पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश तक लाया जाता था।


जिस लाल आतंक की समाप्ति को असंभव मान लिया गया था, उसे संभव बनाने का संकल्प अमित शाह ने लिया। असंभव शब्द उनकी डिक्सनरी में है ही नहीं। छत्तीससगढ में वर्ष 2023 के दिसम्बर में भाजपा सरकार बनने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने 21 जनवरी 2024 को रायपुर में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक अभियान शुरु करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों के साथ बैठक की। उन्होंने यहीं माओवाद मुक्त भारत के संकल्प को व्यक्त किया और सुरक्षा एजेसियों को प्रभावी अभियान शुरु करने के लिए हरी झण्डी दिखायी। उन्होंने गृह मंत्रालय के अधीन व्यापक कार्ययोजना बनायी। अर्द्ध सैन्य बलों ओर स्थानीय नागरिक पुलिस के साथ तालमेल और समन्वय को बेहतर किया। सुरक्षा चोकियो की स्थापना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में घुसकर स्थापित की गईं। खुफिया एजेंसियों की सूचनाओं को एकीकृत करके रणनीति बनायी गई। इसमें स्थानीय अभिसूचना के साथ केन्द्रीय सूचना तंत्र को शामिल किया गया। सभी राज्यो के खुफिया तंत्रों में समन्वय बनाया गया, सूचनाओं को समयबद्ध और सटीक कार्रवाई के लिए साझा किया गया। इतना ही नहीं माओवादियों के आर्थिक स्रोतों को प्रतिबंधित करने के लिए ईडी और एनआईए का भी सहयोग लिया गया। इसके अलावा सुरक्षा बलों को अपनी चौकियों के पांच किमी के क्षेत्र में सामुदायिक विकास और प्रगति के कार्यों में लगाया गया। सुरक्षा बलों के जवानों स्थानीय युवाओं का ब्रेनवाश किया।

उन्हें शांति का महत्व समझाया और अच्छी शिक्षा, प्रतियोगी परिक्षाओं में तैयारी के लिए संसाधन उपलब्ध कराये। स्वास्थ्य सेवाओं और विकास योजनाओं पर राज्यों को ध्यान केन्द्रित करने के लिए केन्द्र ने कड़े निर्देश जारी किये। इससे नक्सलवादियों को भी सामान्य जनजीवन में लौटने का मानस तैयार करने में सफलता मिली।


कांग्रेस की आन्ध्र प्रदेश सरकार के अदूरदर्शी फैसले से बिगडी स्थिति


वर्ष 2004 की 14 अक्टूबर को जब कम्यूनिस्ट विचार के दो ग्रुपों माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) और पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) ने मिलकर नया संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) (सीपीआई एम) बनाया तो इनके हौसले चरम पर थे। ये लोग काठमांडू से कन्याकुमारी तक लाल गलियारा स्थापित करने के सपने देख रहे थे। वर्ष 2004 में अक्टूबर और नवम्बर का महीना नक्सलवादी घटनाओँ के लिए भयावह परिदृश्य लेकर आया था। 14 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक तीन बड़ी घटनाएँ घटित हुई थीं। जिन्होंने लाल आतंक के पंजे को देश में फैलाना शुरु किया। इसमें प्रमुख रूप से दो नक्सल विचार के ग्रुपों का 14 अक्टूबर को विलय और माओवाद के नाम पर नई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना। इसी संगठन के एक ग्रुप के महासचिव का 15 अक्टूबर को बंगलादेश दौरा, जहां उन्होंने उल्फा नेता परेश बरुआ से मुलाकात की और उनसे हथियार, गोला बारूद प्राप्त करने का आश्वासन लिया। तीसरी केन्द्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के निर्देश पर आन्ध्र प्रदेश की सरकार ने नक्सलवादियों के नेताओं को बुलाकर 16 अक्टूबर को समझौता वार्ता की। आन्ध्र प्रदेश के गृह मंत्री जना रेड्डी के नेतृत्व में सरकारी अधिकारियों के साथ 12 लाख के ईनामी रामकृष्ण के साथ वार्ता हुई। लेकिन समझौते का प्रयास विफल रहा। इस वार्ता के पहले ही सरकार ने एक तरफा कार्रवाई रोकने का फैसला कर लिया था। इस बैठक के लिए जंगलों में भटकने वाले शीर्ष माओवादी नेता सरकारी गेस्ट हाउस में तीन दिन सरकार के मेहमान रहे। लेकिन, इस विफल वार्ता ने लाल आतंक को तो नहीं रोका बल्कि उससे इनके हौसले और बुलंद हो गए। क्योंकि सरकार ने इनके खिलाफ पुलिस द्वारा चलाये जा रहे अभियान भी रोक दिये थे।


लाल आतंक का पराभव तीन दशक की सबसे बड़ी घटनाओं में एक


अब जब यह युद्द समाप्ति की ओर है तो देश यह अनुभव करने लगा है कि अमित शाह जैसा गृह मंत्री काश इस देश को दो दशक पहले ही मिल गया होता तो सैकड़ों नहीं हजारों जाने बचायी जा सकती थीं। देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता का समग्र मूल्यांकन जब इतिहास करेगा तो यह जरूर लिखा जाएगा कि जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने और नक्सलवाद के अंत को असंभव मान लेने वाले भारतीय जनमानस के सामने एक गृहमंत्री ने इसे करके दिखा दिया। 21वीं शताब्दी में अभी तक हम अगर भारत की आंतरिक घटनाओं में किन्ही तीन का उल्लेख करें तो श्रीराम मन्दिर निर्माण, धारा 370 की समाप्ति के साथ नक्सलवाद का पराभव सबसे बडी घटनाएँ गिनी जाएंगीं। लाल आतंक की यह चुनौती भारत में नक्सलवाद के रूप में 1967 में उभरी थी। तब से केन्द्र और राज्य सरकारें इससे जुझ रही हैं, अद्धसैनिक बल, पुलिस के जवान नक्सलियों से निपटने के लिए दिन रात छह दशक से जूझते रहे, जान गंवाते रहे, शहादत देते रहे। निर्दोष नागरिकों की जानें लाल आतंक के क्रूर हाथों में समाती रहीं। इस आतंक के नक्सल और माओवादी स्वरूप ने छह दशक में करीब 14 से 15 हजार लोगों की जिंदगियों को समाप्त कर दिया।


वैचारिक मोर्चे पर लड़ाई शेष


माओवाद के नाम पर हथियार उठाने वाले नकस्ली समूह के अंत के बाद भी एक लड़ाई शेष रह जाएगी। यह वैचारिक धरातल पर है। इस विचार का पोषण और प्रचार प्रसार करने अरबन नक्सल और कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को उसी वैचारिक धरातल पर उत्तर देना होगा। इसे भी योजनाबद्ध ढंग से पराजित करके माओवाद के खोखलेपन को समाज के सामने उजागर करना। ये समूह बडी संख्या में विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और मीडिया में प्रमुख भूमिका में हैं। इन्होंने सशस्त्र संघर्ष करने वाले समूहों को लम्बे समय तक वैचारिक “कवर” प्रदान किया है। मीडिया में उन्हें क्रांतिकारी के रूप में पेश करने से लेकर शासन, पुलिस में पैरवी और अदालतों में कानूनी सहयोग का दायित्व निभाया है। इस वैचारिक लड़ाई को लड़ने का काम केवल सरकार और सुरक्षा एजेंसियां नहीं कर सकती हैं। इसके लिये राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले स्वयंसेवी संगठनों, स्वतंत्र मीडिया संस्थानों, वैचारिक प्रभाव रखने वाले समूहों को संवाद कार्यक्रमों से शेष संघर्ष को पूर्णता प्रदान करनी होगी।

सर्वेश सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

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