राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख श्री स्वांत रंजन जी कार्यक्रम को सम्‍बोधित करते हुये।

अंग्रेजों ने भारतीय समाज को भ्रमित करने के लिए एक नई परिभाषा गढ़ दी कि, आर्य बाहर से आए। भारत में द्रविड़ लोग रहते थे। आर्यों ने द्रविड़ों को परास्त कर दक्षिण में भेज दिया और अपना आधिपत्य जमा लिया।

लखनऊ। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डॉक्टर श्यामसुंदर पाठक द्वारा सम्पादित तथा यूनिवर्सल बुक द्वारा प्रकाशित का टेबल साइज भारतीय पंचांग के लोकार्पण में मुख्यवक्ता के रूप में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख श्री स्वांतरंजन जी ने कहा, आर्य-द्रविड़ संघर्ष की झूठी कहानी अंग्रेजों ने रची थी।

उन्‍होंने कहा कि यदि विचारों को भ्रमित कर दिया जाए तो पूरा समाज ही दिग्भ्रमित हो जाता है। अंग्रेजों के शासनकाल में यह कार्य तेजी से हुआ। किसी देश पर लम्बे समय तक शासन करना है तो उस समाज को ही दिग्रभ्रमित कर दो अर्थात उसके मन में यह भाव न जगने पाए कि यह हमारा राष्ट्र है, हमारा समाज है और इसके लिए हमें कुछ करना है। अंग्रेजों ने भारतीय समाज को भ्रमित करने के लिए एक नई परिभाषा गढ़ दी कि, आर्य बाहर से आए। भारत में द्रविड़ लोग रहते थे। आर्यों ने द्रविड़ों को परास्त कर दक्षिण में भेज दिया और अपना आधिपत्य जमा लिया। उनका उद्देश्य आर्यों को बाहरी सिद्ध करना था। इसी से आदिवासी और मूलवासी जैसे शब्द प्रचलित हुये। उन्होंने इस बात को ठीक से स्थापित करने का प्रयास किया की आर्य, मुगल, पठान ये सब बाहर से आए हैं। इनका भारत में कोई मूल स्थान नहीं है।

इसके अगो उन्‍होंने कहा कि उन्होंने नैरेटिव चलाया की इंडिया मल्टीनेशन्स वाला था, अंग्रेजों ने इसे आकर के एक देश बनाया। आगे बोलते हुए स्वांतरंजन जी ने कहा कि, भारतीय इतिहास में महाभारत का युद्ध एक मील का पत्थर है। भारत के अनेक मनीषियों ने अपने अध्ययन के आधार पर महाभारत के कालखंड का निर्धारण किया है। आर्यभट्ट और भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया है कि कलियुग का आगमन ईसा के जन्म से 3120 वर्ष पहले हुआ और महाभारत का युद्ध कलयुग आगमन से 37 वर्ष पूर्व हुआ था अर्थात आर्यभट्ट और भास्कराचार्य दोनों ने ही महाभारत के युद्ध का कालखंड 3139 वर्ष ईसा पूर्व बताया है। जबकि 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड के एक आर्क विशप ने ओल्ड टेस्टामेंट का अध्ययन कर एक क्रोनोलॉजी बनायी। उसने कहा कि, सृष्टि का की रचना 23 अक्टूबर 4004 ईसा पूर्व को हुई है और यही मान्यता ईसाई जगत में प्रचलित हुई।

उन्‍होंने बताया कि भारतीय वांग्मय बहुत पुराना है और इस 4004 वर्ष ईसा पूर्व के कालखंड में इसे समाहित तो किया नहीं जा सकता था। अतः षडयंत्र पूर्वक अंग्रेजों ने भारतीय ज्ञान व पुराणों को माइथॉलजी बता दिया। कहा कि, यह कपोल कल्पना है। वे भारत के इतिहास को सिकंदर के आक्रमण से गिनते हैं अर्थात 323 वर्ष ईसा पूर्व मात्र। अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख जी ने कहा , भारत की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है भगवान महात्मा बुद्ध का जन्म और उनका निर्माण अजातशत्रु के राज्याभिषेक (1806 ईसा पूर्व) के 8 वर्ष बाद बुद्ध जी का निर्वाण कुशीनगर में हुआ था। गौतम बुद्ध का जीवन काल 80 वर्ष रहा अर्थात 1886 से 1806 ईसा पूर्व गौतम बुद्ध का जीवनकाल रहा लेकिन अंग्रेज उनके जीवन को 483 ईसा पूर्व ही मानते हैं। स्वांत जी ने बताया कि हमें गलत इतिहास को जैसा-तैसा स्वीकार नहीं करना है क्योंकि अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए आर्य और द्रविडों के संघर्ष की एक भी घटना भारत में नहीं मिलती। डॉ. भीमराव आंबेडकर भी मानते हैं कि भारतीय ग्रंथों और वेदों में यहां की नदियों, पर्वतों के बारे में जितना आत्मीयपूर्ण संबोधन है, वह बाहर से आया हुआ समाज कर ही नहीं सकता। आर्य एक गुण है एक विशेषण है- तभी तो सीता जी भगवान राम को कई बार आर्य नाम से संबोधित करती हैं। समाज को भ्रमित करने वाली बातें आज ठीक करनी हैं। हिंदू समाज भारतीय पंचांग पर पूरा विश्वास करता है।

महाकुम्भ के आयोजन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पंचांग के अनुसार ही महाकुंभ में बड़ी संख्या में भारतीय समाज पहुंचता है। आज भी पारंपरिक पंचांग के अनुसार ही पूरे नेपाल राष्ट्र में लोक व्यवहार चलता है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज भारत की नई पीढ़ी में से अधिकाधिक को हिंदी के 12 महीने और 6 ऋतुओं के नाम तक नहीं पता हैं। पंचांग में कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष की वैज्ञानिकता को समझने की जरूरत है। आज हमें अपने ज्ञान की थाती को जानने और समझने की जरूरत है।

कार्यक्रम में पद्मश्री मालिनी अवस्थी, पंचाग के सम्पादक डा. श्याम सुन्दर पाठक जी, पायोनियर स्कूल ग्रुप्स के प्रबंधक ब्रजेन्द्र सिंह समेत अन्य महानुभाव उपस्थित रहे।

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