बढ़ता खतरा और घुसपैठ रोकने की चुनौती
पूरे देश में घुसपैठ की समस्या विकराल होती जा रही है लेकिन इसका हल दिखायी नहीं दे रहा है। अभी हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने देश में बढ़ते जनसांख्यिकीय असंतुलन के लिए घुसपैठ को बड़ा कारण माना, जो बिलकुल सही भी है। उन्होंने इसके लिए आंकड़े देते हुए बताया कि स्वतंत्रता के चार किस प्रकार एक और हिंदुओं की जनसंख्या लगातार घट रही है तो दूसरी और मुस्लिम जनसंख्या बढ़ रही है। आजादी के बाद हुई जनगणनाओं में 1951 में हिए 84 प्रतिशत, मुस्लिम 9.8 प्रतिशत, 1971 में हिंदू 82 प्रतिशत, मुस्लिम 11 प्रतिशत, 1991 में हिंदू 81 प्रतिशत, मुस्लिम 12.21 प्रतिशत और 2011 में हिंदू 79 प्रतिशत, मुस्लिम 14.2 प्रतिशत थे। जब अगली जनगणना के आंकड़े आएंगे तो भारत में मुसलमानों का प्रतिशत कहीं अधिक हो गया होगा और हिंदू कहीं अधिक घट गए होंगे। आंकड़े चताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी 24.6 प्रतिशत बड़ी, जबकि हिंदू आबादी में मात्र 16.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
असम में 2011 की जनगणना में मुस्लिमों की आबादी की दशकीय वृद्धि दर 29.6 प्रतिशत थी। पश्चिम बंगाल के कई जिलों में यह वृद्धि दर 40 प्रतिशत है और कई सीमावर्ती क्षेत्रों में 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह मुसलमानों के अधिक बच्चे पैदा करने के साथ साथ उनकी बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से घुसपैठ का परिणाम है। नेपाल की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश और बिहार के विलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम घुसपैठिए अपना अड्डा स्थायी रूप से जमा चुके हैं। झारखंड में तो बांग्लादेशी आदिवासी महिलाओं से विवाह करके उनकी जमीन हड़पने में लगे हैं। भोलभाले आदिवासी इनके चंगुल में आसानी से फंस भी जाते हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने एक रिपोर्ट में दावा किया है कि झारखंड के संथालपरगना क्षेत्र में तेजी से बांग्लादेशी घुसपैठ ही रही है और इस कारण से क्षेत्र की जनसांख्यिकी में काफी बदलाव आया है। देवभूमि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में इन्हीं घुसपैठियों के चलते मुस्लिम जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है।
सच तो यह है कि देश में घुसपैठियों को संख्या अब लाखों में नाहीं बल्कि करोड़ों में पहुंच चुकी है। सबसे बड़ी चिन्ता की बात इनकी पहचान न हो पाना हैं। घुसपैठ करते ही इनके लिए एक व्यवस्थित तंत्र काम करना आरंभ कर देता है। रोहिंग्या हीं गा बांग्लोवेशी शतप्रतिशत घुसपैठिए मुसलमान ही हैं। मस्जिदों से तय होता है कि कौन सा घुसपैठिया कहां जाएगा और यहां पर कौन लोग इनकी मदद करेंगे। इसके बाद भ्रष्ट सरकारी तंत्र का लाभ उठाकर उसका राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर कार्ड तक बनवा दिया जाता है। कई बार चुनाव के बीच यह मुद्दा बनता है लेकिन चार में फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। गैर भाजपा दलों ने ती घुसपैठ में अपना चोट बैंक देखना शुरू कर दिया है और इसीलिए ये घुसपैठियों को आश्रय देने में लगे रहते हैं। इसलिए निर्वाचन आयोग जब भी अपात्र मतदाताओं को बाहर करने के लिए अभियान चलाता है तो ये दल शोर मचाने लगते हैं। इन घुसपैतियों की संख्या इतनी बढ़ गयी है कि देश की एकता अखंडता, सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुके हैं। ये भारत भूमि पर अवैध कब्जा कर रहे हैं और भारतीय नागरिकों का रोजगार भी छीन रहे हैं। गरीब मजूवरों की रोजी-रोटी छीन रहे हैं और आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। पिछले दिनों लखनऊ नगर निगम के कर्मचारियों पर इन्हीं तत्वों ने हमला करके बता दिया था कि इनका दुस्साहस कितना व्यह गया है।
इसी प्रकार मुंचाई में फिल्म अभिनेता सैफ अली खान पर हमला करने वाला आरोपी शरीफुल इस्लाम शहजाद बांग्लादेशी घुसपैठिया निकला, जो विजाँय यास नाम से मुंबई में काम करता रहा। कईबांग्लादेशी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, त्रिपुरा और देश के कई राज्यों से पकड़े जा चुके हैं, जिन्होंने भारत में हिंदू छया नाम से स्वयं को छिपा लिया है। इनका सबसे बड़ा सहायक कट्टरपंथी मुसलमानों का एक बड़ा बर्ग है जो भारत को इस्लामी देश में बदलना चाहता है। इसके लिए एक और मुसलमानों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है तो दूसरी ओर पड़ोसी देशों से मुसलमानों की घुसपैठ करायी जा रही है। बोट और पैसे के लालच में हिन्दुओं का एक भ्रष्ट वर्ग भी इन घुसपैठियों का सहायक बनता है। दिल्ली में जब आम आदमी पार्टी की सरकार थी तो रोहिग्गा घुसपैठिगों को सभी सुविधाएं देने के साथ आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। इतना ही नहीं अनुच्छेद 370 हटने के पहले जम्मू कश्मीर की राज्य सरकारों ने रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठियों को हिन्दू बहुल जम्मू में बड़ी संख्या में बसाया, जिनको आज तक निकाला नाहीं जा सका है। जब इनके विरुद्ध सख्ती की जाती है तो मानवाधिकारों के नाम पर कई वकील सर्वोच्च न्यायालय तकपहुंच जाते हैं और इनके पक्ष में आदेश कराने में सफल भी हो जाते हैं। इससे पता चलता कि नीचे से ऊपर तक पूरा तंत्र इनके लिए पूरी गंभीरता से लगा हुआ है।
भारत में घुसपैठियों की वास्तविक संख्या कितनी है, इसकी वास्तबिक जानकारी किसी के पास नहीं है। फिर भी समय-समय पर सरकारों ने अपने स्रोतों के आधार बताया है। 2016 में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि भारत में लगभग दो करोड़ बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी के बराबर हैं। इससे पहले मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने 2004 में संसग में लगभग 1.2 करोड़ घुसपैठियों का आंकड़ा दिया था। वैसे एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में भारत में घुसपैठियों की संख्या कम से कम पांच करोड़ के आसपास होगी। सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर जोगिंदर सिंह ने 2014 में ही पांच करोड़ घुसपैठियों की बात कही थी। कहने का अर्थ यह कि कई देशों की नितनी कुल जनसंख्ता नहीं है,उससे कहीं अधिक घुसपैठिए भारत में रह रहे हैं। आज देश का शायद ही कोई ऐसा बड़ा शहर हो जहां ये घुसपैठिए न हो। घुसपैठियों को भारत में बखाने और उनके लिए सरकारी प्रपत्र तैयार करने का कार्य देशभर में संगठित गिरोह कर रहे हैं। इन्हीं के चलते पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक हर जगह से डेरा जगा लिए हैं और आम लोगों के चीच घुलमिल गए हैं। ज्यादातर बांग्लादेशी मजदूरी, फल-सब्नी कारोबार, सफाईकर्मी और फेरी लगाने के व्यबसाय में खप जाते हैं। भीख मांगने वाले रैकेट में बांग्लादेशी महिलाएं शामिल होती हैं।
बांग्लादेशी महिलाएं महानगरों में घरों में भी काम करने लगी हैं। देश की अधिकांश झुग्गियां इन्हीं लोगों की हैं जिन्होंने रेलवे से लेकर सेना तक की जमीन पर कब्जा कर रखा है। यदि राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल में सबसे ज्याच घुसपैठिए हैं। चूंकि राज्य की 2272 किलोमीटर लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है, इसलिए बड़ी आसानी से पहां घुसपैठ होती रही है। पहले कांग्रेस सरकार, फिर बामपंथी सरकार और अब ममतासरकार के लिए में घुसपैठिए वोट बैंक हैं। इसीलिए इन सरकारों ने घुसपैठ को बढ़ावा दिया। यहां ऐसे लोगों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा बताई जा रही है। पश्चिम बंगाल का मालया, दिनेशपुर, छपली नववादगंज, मुर्शिदाबाद और 24 परगना घुसपैठ के लिए बदनाम है। इसके अलावा हुगली नदी और जंगल के रास्ते से घुसपैठ होती है। पश्चिम बंगाल में कई ऐसे चांग्लादेशियों की पहचान की गई, जो चिकित्लस और पर्यटन वीजा पर भारत आए, फिर यहीं रह गए। इसके चाय असम का स्थान है, जहां अवैध घुसपैठियों की संख्या ३० लाख से अधिक अनुमानित है। इस कारण असम की तो पूरी जनसांख्यिकी ही बयात गयी हैं। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के अनुसार आज असम में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत हो गयी है, इनमें से बड़ी संख्या बांग्लादेशी मुस्लिमों की है। 1971 में जब पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश बना, उस समय भी बड़ी संख्या में मुस्लिम घुसपैठिए असम में आकर चस गए थे जिन्हें तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन था।
असम के 33 जिलों में से नौ धुवरी, गोलपारा, वरांग, नौगांव, बारपेटा, धुबरी, करीमगंज, यारंग, मोरीगांव बोंगाईगांव, और लाकांडी में मुस्लिम जनसंख्या 50 से 80 प्रतिशत तक अनुमानित है। राज्य में 45 विधानसभा सीट पूरी तरह से मुस्लिम वोटरों के कब्जे में है, जिनमें अधिकतर बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। राज्य के नलबाड़ी, कतार और कामरूप में भी धार्मिक जनसंख्या में बदलाव हुआ है। पिछले चार दशकों में बिहार के सीमांचल के चार जिले किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में मुस्लिम आबाची अप्रत्याशित तौर से बड़ी है। किशनगंग में मुस्लिम आबादी 68 प्रतिशत और हिंदू आचादी 31 प्रतिशत है। विधानसभा चुनावों में इस पर खूत्र होहल्ला मचा था।
यह देश का दुर्भाग्य है कि गैर भाजपा दलों के लिए घुसपैठ कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि लगभग शतप्रतिशत घुसपैठिए मुसलमान हैं जो उनका वोट बैंक हो जातेहैं। इसके विपरीत यही दल पाकिस्तान और अफगानिस्तान में उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आए हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता दिए जाने का विरोध करते हैं। इन दलों को करोड़ों पुसपैठियों से प्यार है लेकिन कुछ हजार शरणार्थियों से नफरत है। इसीलिए युपैठियों के समर्थक राजनीतिक दल मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विरोध करते हैं। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर नहीं बनने देना चाहते।
सबसे अधिक चिंतनीय बात यह है कि केंद्र में पिछले 11 साल से अधिक समय से भाजपा नेतृत्व वाली सरकार है लेकिन घुसपैठ पर पूरी तरह लगाम नहीं लग सकी है। पिछले 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से जनस ख्यिकीय परिवर्तन पर अध्ययन के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त मिशन के गठन की घोषणा की थी। यह मिशन घुसपैठियों के फारण होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करेगा। साथ ही, यह धार्मिक और सामाजिक जीवन पर पड़ रहे प्रभावों का अध्ययन करेगा, जनस ख्यिकीय परिवर्तनों के संभावित कारणों का विश्लेषण करेगा, असामान्य बसावट के पैटर्न और समाज पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन करेगा तथा सीमा प्रबंधन पर पड़ने वाले बोझ का भी विशेषण करके भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। यह उपाय कितना कारगर होगा बह तो समय ही बताएगा क्योंकि इसमें बहुत समय लगेगा। होना यह चाहिए कि न केवल सरकार के स्तर पर बल्कि समाज के स्तर पर भी घुसपैठियों के विरुद्ध अभियान चलाया जाए। पहले इनकी पहचान की जाए और फिर बल पूर्वक इन्हें इनके देश वापस भेज दिया जाए। साथ ही जहां तक हो सके सीमा पर बाड़चंदी भी की जानी चाहिए। यह महंगा कार्य हो सकता है लेकिन घुसपैठ यदि रुक जाती है तो देश हित के लिए यह कीमत बहुत कम होगी।

