महर्षि दयानन्द सरस्वती: वैदिक नवजागरण के अग्रदूत
जिस समय केशवचन्द्र सेन ब्रह्मसमाज के प्रचार में संलग्न थे उसी समय मथुरा स्थित दण्डी स्वामी विरजानन्द की कुटी से एक तेजस्वी संन्यासी निकला, जिसने विद्वानों का समाज को वेदार्थ और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा यह संन्यासी स्वामी दयानन्द सरस्वती थे।
उनका जन्म मूल नक्षत्र में होने के कारण नाम मूलशंकर रखा गया। अत्यन्त मेधावी मूलशंकर ने 14 वर्ष की आयु में ही रुद्री, यजुर्वेद और अन्य वेदों के अंश कंठस्थ कर लिये थे तथा व्याकरण के अच्छे ज्ञाता बन गये थे। उनके पिता करशनजी लालजी तिवारी बहुत बड़े शिवभक्त थे इसलिए बाल्यकाल से ही मूलशंकर भी शिवभक्ति करने लगे। पिता की आज्ञा पर मूलशंकर ने शिवरात्रि का व्रत रखा लेकिन उसी रात शिवलिंग पर चूहे को नैवेद्य खाते देख उनका मूर्तिपूजा से विश्वास उठ गया। बहन की मृत्यु ने उन्हें वैराग्य की ओर प्रेरित किया। पिता ने इसका आभास होते ही इनके विवाह की तैयारियाँ प्रारम्भ कर दीं। विवाह की तैयारियों के बीच 21 वर्ष की आयु में मूलशंकर घर छोड़कर संन्यास मार्ग पर निकल पड़े।
घर त्यागने के बाद लगभग 18 वर्षों तक उन्होंने देशभर में भ्रमण कर विभिन्न आचार्यों से शिक्षा ली। प्रारम्भ में दयानन्द सरस्वती वेदान्त और अद्वैत मत से प्रभावित हुए तथा ‘शुद्ध चैतन्य’ नाम पाया। बाद में संन्यास की दीक्षा लेकर ‘दयानन्द सरस्वती’ कहलाए। योग और सांख्य दर्शन को अपनाते हुए उन्होंने वेदान्त के सिद्धान्तों का त्याग किया और वैदिक धर्म की ओर उन्मुख हुए। सच्चे ज्ञान की खोज उन्हें मथुरा ले गई, जहाँ प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द से उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया। विद्या पूर्ण होने पर गुरु ने आदेश दिया— “संसार में जाकर ज्ञान की ज्योति फैलाओ।” इस आज्ञा को शिरोधार्य कर उन्होंने जीवन वैदिक धर्म के प्रचार में समर्पित कर दिया। हरिद्वार में ‘पाखण्डखण्डिनी पताका’ फहराकर मूर्तिपूजा, छूआ-छूत, अन्धविश्वास और मिथ्याडम्बर का विरोध किया। उन्होंने नारी शिक्षा, विधवा-विवाह और सामाजिक सुधार का समर्थन किया तथा शास्त्रार्थों के माध्यम से अपने विचारों का प्रचार किया। एक बार एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए दयानन्द जी ने कहा कि – आपके पूर्वज जंगलों में बसे अशिक्षित नहीं थे अपितु संसार को जागृत करने वाले महापुरुष थे। आपका इतिहास विश्वविजेताओं की गौरवगाथा है। यहाँ की वैदिक ऋचाएँ ग्वालों के गीत नहीं श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसी महान आत्माओं को साकार करने वाले महासत्य हैं। उत्तिष्ठत-जाग्रत अपने उज्जवल इतिहास पर गर्व करो। वर्तमान को सँवारने हेतु अपने गौरवमयी इतिहास से प्रेरणा लो। अपने पूर्वजों के प्रति तिरस्कार की भावना जगाने वाली आधुनिक शिक्षा को धिक्कार है।
1863 से 1875 तक उन्होंने व्यापक भ्रमण किया। स्वामी दयानन्द जी चाहते थे कि उनके सामाजिक सुधारों का कार्य उनके बाद भी चलता रहे इसीलिए 10 अप्रैल 1875 को बम्बई में उन्होंने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। स्वामी जी एकेश्वरवाद के समर्थक थे और जातिवाद, बाल-विवाह जैसी कुरीतियों के विरोधी। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रव्यापी भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का आह्वान किया। डॉ. भगवान दास ने उन्हें हिन्दू पुनर्जागरण का निर्माता कहा, एनी बेसेन्ट ने ‘आर्यावर्त आर्यावर्तियों के लिए’ की घोषणा का श्रेय दिया और सरदार पटेल ने उन्हें भारत की स्वतन्त्रता की नींव रखने वाला बताया।
उनकी प्रमुख रचनाओं में से एक ‘सत्यार्थप्रकाश’ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुई। इस महान में 15 अध्याय है। ‘ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका’, ‘ऋग्वेद भाष्य’, ‘पाखण्ड खण्डन’, ‘अद्वैतमत का खण्डन’ और ‘पंचमहायज्ञ विधि’ उल्लेखनीय हैं। विचारों के कारण उन्हें विरोध और आक्रमण का सामना करना पड़ा। एक बार अजमेर में एक षड़यन्त्र के तहत स्वामी जी के भोजन में काँच पीसकर खिलाने से इनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन उन्होंने अपने शिष्यों को अपने पास बुलाकर संध्या के समय गायत्री मन्त्रों के उच्चारों के साथ आँखें मूँदकर समाधि ले ली। उनका जीवन पौराणिक हिन्दुत्व से दार्शनिक यात्रा करते हुए वैदिक धर्म की आधारशिला तक पहुँचने का प्रेरक उदाहरण है।
