“बताया हुआ काम करना चाहिए पर उसका ढोल पीटने की आवश्यकता नहीं"
“बताया हुआ काम करना चाहिए पर उसका ढोल पीटने की आवश्यकता नहीं"

“बताया हुआ काम करना चाहिए पर उसका ढोल पीटने की आवश्यकता नहीं”

डॉक्टर जी अपनी बैठक में यह बार-बार बताते थे कि “बताया हुआ काम करना चाहिए पर उसका ढोल पीटने की आवश्यकता नहीं” तथा “यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि यदि अकेले हमने काम से जी चुराया तो कौन-सा बड़ा बिगड़नेवाला है। यह काम की सही पद्धति नहीं है।”

अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वे एक घटना का उदाहरण देते थे। राजा लक्ष्मणराव भोंसले के यहाँ एक समारोह में पानदान का चूना समाप्त हो गया। उसी समय चूना लाने का आदेश हुआ। एक के बाद एक ‘चूना लाओ’, ‘चूना लाओ’ जोर-जोर से दूसरों से कहने लगे; परन्तु चूना नहीं आया। डॉक्टर जी घर से परिचित थे। अतः वे अन्दर जाकर चूना ले आये। पर उसके बाद भी काफी देर तक ‘चूना लाओ’ का हुकुम एक नौकर से दूसरे नौकर पर चल रहा था।

इसी प्रकार वे एक दूसरी कथा बताते थे। एक बार किसी राजा ने प्रातः सूर्योदय के पहले मन्दिर के कुण्ड में एक लोटा दूध डालने का आदेश अपनी सब जनता को दिया। प्रातः अंधेरे में राजाज्ञा का पालन करने के लिए निकलनेवाला प्रत्येक व्यक्ति सोचने लगा कि “सब तो दूध डालेंगे। यदि मैंने अकेले एक लोटा पानी डाल दिया तो क्या बिगड़ता है।” प्रत्येक ने ऐसा सोचकर एक-एक लोटा पानी डाल दिया। सूर्योदय के बाद देखा तो कुण्ड में पानी-ही-पानी था। दूध का कहीं नामोनिशान भी नहीं था।

इस प्रकार वे स्वयंसेवक के मन पर यह अंकित करते थे कि एक व्यक्ति के ठीक काम न करने का क्या परिणाम होता है।

डॉ. हेगेवार चरित

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